तालिबान के नेतृत्व में दरार: कहानी काबुल बनाम कंधार और अखुंदज़ादा के भीतरी कुनबे की

    • Author, बीबीसी अफ़ग़ान

बीबीसी को मिले ऑडियो क्लिप से पता चला है कि तालिबान के नेता किस बात से सबसे ज़्यादा चिंतित हैं.

ये कोई बाहरी ख़तरा नहीं. ये अफ़ग़ानिस्तान के भीतर से पैदा होने वाला ख़तरा है.

वही अफ़ग़ानिस्तान, जिस पर तालिबान ने 2021 में उस समय कब्ज़ा किया था, जब पिछली सरकार गिर गई थी और अमेरिका वापस चला गया था.

तालिबान के सर्वोच्च नेता ने इस ऑडियो में चेतावनी दी कि इस्लामिक अमीरात (तालिबान) की सरकार के भीतर ही लोग एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हैं.

ये वो सरकार है, जिसे तालिबान ने देश चलाने के लिए बनाया है.

लीक हुई रिकॉर्डिंग में सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा को यह कहते सुना जा सकता है कि आपसी मतभेद आख़िरकार सभी को ले डूबेंगे.

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उन्होंने कहा, "इस विभाजन से अमीरात ढह जाएगा और इसका ख़ात्मा हो जाएगा."

यह भाषण जनवरी 2025 में दक्षिणी शहर कंधार की एक मदरसे में तालिबान सदस्यों को दिया गया था.

इससे उन अफ़वाहों को और हवा मिल गई थी, जो कई महीनों से चल रही थीं. यानी तालिबान के शीर्ष नेतृत्व में मतभेद की अफ़वाहें.

तालिबान नेतृत्व हमेशा ऐसे किसी भी मतभेद या विभाजन से इनकार करता रहा है.

यहाँ तक कि बीबीसी से इस बारे में किए गए सवाल में भी उन्होंने शीर्ष नेतृत्व में किसी विभाजन से इनकार किया है.

लेकिन इन अफ़वाहों के बाद बीबीसी की अफ़गान सेवा ने इस बेहद गोपनीय संगठन की एक साल लंबी जाँच शुरू की.

इस दौरान मौजूदा और पूर्व तालिबान सदस्यों, स्थानीय सूत्रों, विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों से 100 से ज़्यादा इंटरव्यू किए गए.

इस रिपोर्टिंग की संवेदनशीलता को देखते हुए, बीबीसी ने उनकी सुरक्षा को देखते हुए किसी की पहचान उजागर न करने पर सहमति जताई.

काबुल बनाम कंधार

अब पहली बार ये स्पष्ट हुआ है कि तालिबान के शीर्ष स्तर पर दो अलग-अलग गुट मौजूद हैं, जो अफ़ग़ानिस्तान के लिए अलग-अलग सोच रखते हैं.

पहला गुट पूरी तरह अखुंदज़ादा के प्रति वफ़ादार है. वह कंधार में अपने ठिकाने से देश को एक सख़्त इस्लामिक अमीरात की ओर ले जा रहे हैं.

ऐसा अमीरात, जो आधुनिक दुनिया से कटा हुआ हो और जहाँ उनके प्रति वफ़ादार धार्मिक नेता समाज के हर पहलू को नियंत्रित करें.

दूसरा गुट ज़्यादातर काबुल में मौजूद ताक़तवर तालिबान नेताओं का है. इसमें तालिबान कैबिनेट के मंत्री, प्रभावशाली लड़ाके और असरदार धार्मिक विद्वान शामिल हैं.

यह गुट ऐसे अफ़ग़ानिस्तान की पैरवी करता है, जो सख़्त इस्लामी ढाँचे के भीतर रहते हुए भी बाहरी दुनिया से जुड़ा रहे. देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करे और लड़कियों और महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दे.

फ़िलहाल लड़कियों को प्राइमरी स्कूल से ज़्यादा पढ़ने नहीं दिया जाता है.

एक अंदरूनी सूत्र ने इसे 'कंधार बनाम काबुल' कहा.

लेकिन सवाल यह था कि क्या काबुल गुट, जिसके पास हज़ारों तालिबान समर्थकों का साथ है, कभी अखुंदज़ादा को किसी ठोस तरीक़े से चुनौती देगा.

ख़ासतौर पर तब, जब तालिबान के मुताबिक़ अखुंदज़ादा सर्वोच्च शासक हैं, जो सिर्फ़ अल्लाह के प्रति जवाबदेह हैं और जिन्हें चुनौती नहीं दी जा सकती.

लेकिन एक फ़ैसला आया, जिसने देश के सबसे ताक़तवर लोगों के बीच चल रही इस नाज़ुक रस्साकशी को खुली टकराव की स्थिति में पहुँचा दिया.

सितंबर के आख़िर में अखुंदज़ादा ने इंटरनेट और फ़ोन सर्विस बंद करने का आदेश दिया, जिससे अफ़ग़ानिस्तान का संपर्क पूरी दुनिया से कट गया.

तीन दिन बाद इंटरनेट फिर से चालू हो गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि क्यों.

अंदरख़ाने जो हुआ, वह बेहद बड़ा घटनाक्रम था. अंदरूनी सूत्रों का यही कहना है.

काबुल गुट ने अखुंदज़ादा के आदेश के ख़िलाफ़ जाकर इंटरनेट दोबारा चालू कर दिया.

तालिबान की स्थापना से उसका अध्ययन कर रहे एक विशेषज्ञ कहते हैं, "तालिबान, दूसरे सभी अफ़ग़ान राजनीतिक दलों या गुटों से अलग है. इसमें कभी कोई विभाजन नहीं हुआ, न ही खुला विरोध दिखाई दिया है. इस आंदोलन की बुनियाद में अपने वरिष्ठों और आख़िरकार अमीर यानी अखुंदज़ादा की आज्ञा मानने का सिद्धांत शामिल है.''

''इसी वजह से उनके स्पष्ट आदेश के ख़िलाफ़ जाकर इंटरनेट चालू करना इतना अप्रत्याशित और इतना अहम था."

तालिबान में काम करने वाले एक अंदरूनी व्यक्ति ने कहा, ''यह किसी बग़ावत से कम नहीं था.''

तालिबान के सर्वोच्च नेता और मतभेद

हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने अपने नेतृत्व की शुरुआत इस तरह नहीं की थी.

सूत्रों के मुताबिक़ 2016 में उन्हें तालिबान का सर्वोच्च नेता आंशिक तौर से इसलिए चुना गया था, क्योंकि वह सहमति बनाकर चलने वाले नेता माने जाते थे.

ख़ुद उनके पास युद्ध का अनुभव नहीं था, इसलिए उन्होंने सिराजुद्दीन हक़्क़ानी को अपना उपनेता बनाया.

हक़्क़ानी एक ख़ौफ़नाक लड़ाका कमांडर थे और उस समय अमेरिका की मोस्ट वॉन्टेड सूची में शामिल थे.

उनके पर एक करोड़ डॉलर का इनाम था.

दूसरे उपनेता याकू़ब मुजाहिद बने, जो तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे हैं.

वह उम्र में भले ही युवा थे, लेकिन अपने साथ तालिबान की विरासत और संगठन को एकजुट करने की क्षमता लेकर आए थे.

यह व्यवस्था अमेरिका के साथ दोहा में हुई बातचीत के दौरान भी बनी रही.

यह बातचीत तालिबान लड़ाकों और अमेरिका के नेतृत्व वाली सेनाओं के बीच 20 साल से चल रहे युद्ध को ख़त्म करने के लिए हो रही थी.

2020 में हुआ समझौता आख़िरकार 2021 में तालिबान के अचानक और नाटकीय तरीक़े से पूरे देश पर फिर से कब्ज़ा करने और अगस्त 2021 में अमेरिकी सेना की अव्यवस्थित वापसी का कारण बना.

बाहरी दुनिया को तालिबान एकजुट नज़र आ रहा था.

लेकिन बीबीसी से बात करने वाले अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक़, अगस्त 2021 में सत्ता में लौटते ही दोनों उपनेताओं को चुपचाप किनारे कर दिया गया और उन्हें केवल मंत्री बना दिया गया.

इसके बाद अखुंदज़ादा अकेले सत्ता के केंद्र बन गए.

यहाँ तक कि तालिबान के शक्तिशाली सह-संस्थापक और अमेरिका के साथ बातचीत का नेतृत्व करने वाले अब्दुल ग़नी बरादर भी प्रधानमंत्री बनने के बजाय उप-प्रधानमंत्री बना दिए गए.

कई लोग उन्हें प्रधानमंत्री बनाए जाने की उम्मीद कर रहे थे.

इसके उलट, अखुंदज़ादा ने राजधानी काबुल में बैठने के बजाय कंधार में ही रहना चुना, जो तालिबान की शक्ति का पारंपरिक केंद्र रहा है.

उन्होंने अपने आसपास भरोसेमंद कट्टर विचारधारा और सख़्त सोच वाले लोगों को इकट्ठा करना शुरू किया.

उनके दूसरे वफ़ादारों को देश की सुरक्षा एजेंसियों, धार्मिक नीतियों और अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्सों को संभालने की ज़िम्मेदारी दे दी गई.

अमेरिका समर्थित अफ़ग़ान सरकार में रहे एक पूर्व तालिबान सदस्य ने बीबीसी से कहा, "अखुंदज़ादा ने शुरू से ही अपना मज़बूत गुट बनाने की कोशिश की. शुरुआत में उनके पास मौक़ा नहीं था, लेकिन सत्ता मिलते ही उन्होंने बेहद कुशलता से ऐसा किया और अपने अधिकार और पद का इस्तेमाल कर अपना दायरा बढ़ाया.''

अब काबुल में बैठे तालिबान मंत्रियों से सलाह लिए बिना फ़रमान जारी होने लगे.

सत्ता में आने से पहले किए गए सार्वजनिक वादों, जैसे लड़कियों को शिक्षा देने जैसे वादों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र की एक निगरानी संस्था ने सुरक्षा परिषद को भेजे पत्र में कहा कि लड़कियों की शिक्षा पर रोक और महिलाओं के काम करने पर पाबंदी दोनों गुटों के बीच ''तनाव के मुख्य कारण'' हैं.

इसी बीच एक अन्य अंदरूनी सूत्र ने बीबीसी को बताया कि 1990 के दशक में तालिबान की शरिया अदालतों में जज के रूप में करियर शुरू करने वाले अखुंदज़ादा अपने धार्मिक विचारों में "और भी ज़्यादा सख़्त" होते जा रहे हैं.

अखुंदज़ादा की सोच इतनी कट्टर थी कि 2017 में उनके बेटे की मौत के बाद दो तालिबान अधिकारियों ने बताया था कि उन्हें अपने बेटे के आत्मघाती हमलावर बनने की जानकारी थी और उन्होंने इसे मंज़ूरी भी दी थी.

बीबीसी को यह भी बताया गया कि अखुंदज़ादा मानते हैं कि कोई भी ग़लत फै़सला उनके मरने के बाद तक असर डाल सकता है.

एक सरकारी अधिकारी ने बताया, "वह हर फ़ैसले के बारे में कहते हैं कि मैं अल्लाह के प्रति जवाबदेह हूँ. क़यामत के दिन मुझसे पूछा जाएगा कि मैंने यह क़दम क्यों नहीं उठाया."

अखुंदज़ादा के साथ बैठकों में शामिल रहे दो लोगों ने बीबीसी को बताया कि वह बहुत कम बोलते हैं और ज़्यादातर इशारों में बात करते हैं.

कमरे में मौजूद बुज़ुर्ग मौलवी उन इशारों की व्याख्या करते हैं.

सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी वह अपना चेहरा छिपाए रखते हैं.

पगड़ी पर डाली गई चादर से वह आँखें ढँक लेते हैं और अक्सर दर्शकों की ओर तिरछे खड़े होते हैं.

अखुंदज़ादा की फोटो या वीडियो बनाना मना है. माना जाता है कि उनकी केवल दो तस्वीरें ही दुनिया में मौजूद हैं.

उनसे मुलाक़ात करना भी अब बेहद मुश्किल हो गया है.

एक तालिबान सदस्य ने बीबीसी को बताया कि पहले अखुंदज़ादा ''नियमित परामर्श बैठकें" करते थे, लेकिन अब "अधिकतर तालिबान मंत्रियों को कई-कई दिन या हफ़्तों तक इंतज़ार करना पड़ता है."

एक अन्य सूत्र के मुताबिक़, काबुल में बैठे मंत्रियों से कहा गया है कि वे "सिर्फ़ आधिकारिक बुलावे पर ही कंधार आएँ."

इसी दौरान अखुंदज़ादा ने कई अहम विभागों को कंधार लाना शुरू कर दिया है.

इनमें हथियारों के वितरण से जुड़ा विभाग भी शामिल है, जो पहले उनके पूर्व उपनेताओं हक़्क़ानी और याकू़ब के नियंत्रण में था.

दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र की निगरानी टीम ने अपने पत्र में लिखा कि अखुंदज़ादा की ओर से सत्ता का केंद्रीकरण "कंधार के सीधे नियंत्रण में सुरक्षा बलों के लगातार विस्तार के साथ जुड़ा हुआ है.''

रिपोर्टों के मुताबिक़, अखुंदज़ादा सीधे स्थानीय पुलिस यूनिट्स तक आदेश भेजते हैं और काबुल के मंत्रियों को दरकिनार कर देते हैं.

एक विश्लेषक का कहना है कि इसका नतीजा यह हुआ है कि "वास्तविक सत्ता कंधार में स्थानांतरित हो गई है."

हालाँकि तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने बीबीसी के साथ बातचीत में इससे इनकार किया.

उन्होंने कहा, "सभी मंत्रियों के पास अपने मंत्रालय के दायरे में पूरी ताक़त है. वे रोज़मर्रा के काम करते हैं और फ़ैसले लेते हैं. उन्हें सारे अधिकार दिए गए हैं.''

लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा, "शरिया के नज़रिए से उनके पास (अखुंदज़ादा) पूरे अधिकार हैं. अल्लाह ने जिस फूट से मना किया है, उससे बचने के लिए उनके फै़सले अंतिम होते हैं."

वो लोग जिन्होंने दुनिया देखी है?

काबुल गुट के भीतर असंतोष बढ़ता जा रहा था और आपसी गठबंधन मज़बूत हो रहे थे.

एक विश्लेषक ने बीबीसी से कहा, "ये वे लोग हैं, जिन्होंने दुनिया देखी है. इसलिए उनका मानना है कि मौजूदा स्वरूप में उनकी सरकार टिक नहीं सकती."

काबुल गुट ऐसा अफ़ग़ानिस्तान चाहता है, जो खाड़ी देशों के मॉडल की ओर बढ़े.

उन्हें कंधार में सत्ता के बहुत ज़्यादा केंद्रीकरण, नैतिकता क़ानूनों की प्रकृति और उनके सख़्त पालन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रिश्तों की चिंता है.

उन्हें महिलाओं की शिक्षा और रोज़गार को लेकर भी चिंता है.

हालाँकि महिलाओं के लिए ज़्यादा अधिकारों की बात करने के बावजूद काबुल गुट को उदार नहीं माना जाता.

अंदरूनी सूत्र उन्हें "व्यावहारिक" बताते हैं.

माना जाता है कि इस गुट का अनौपचारिक नेतृत्व अब्दुल ग़नी बरादर कर रहे हैं, जिनके प्रति आज भी तालिबान के भीतर गहरी वफ़ादारी है.''

उन्हें ही 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान एक बहस में डोनाल्ड ट्रंप ने "तालिबान का मुखिया अब्दुल" कहा था.

असल में वही अमेरिका के साथ तालिबान के मुख्य वार्ताकार थे.

काबुल गुट के बदलते रुख़ पर भी नज़र रखी जा रही है.

एक विश्लेषक ने कहा, "हमें याद है कि यही लोग कभी टीवी तोड़ दिया करते थे, लेकिन अब ख़ुद टीवी पर नज़र आते हैं."

वे सोशल मीडिया की ताक़त को भी समझते हैं.

पूर्व उपनेता याकू़ब के पिता ने पहले तालिबान शासन का नेतृत्व किया था, जिसमें संगीत और टीवी पर प्रतिबंध था.

आज याक़ूब युवा तालिबान सदस्यों और कुछ आम अफ़गानों में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे हैं.

यह टिकटॉक वीडियो और बिकने वाली उन चीज़ों में से साफ़ दिखता है, जिनमें उनकी तस्वीर लगी होती है.

लेकिन ख़ुद को सबसे ज़्यादा नए रूप में पेश करने में उनके साथी पूर्व उपनेता सिराजुद्दीन हक़्क़ानी सबसे आगे रहे हैं.

अफ़ग़ान युद्ध के दौरान अमेरिका के नेतृत्व वाली सेनाओं के ख़िलाफ़ हुए कुछ सबसे घातक और जटिल हमलों के पीछे उनके नेटवर्क का हाथ रहा.

इनमें 2017 में काबुल में जर्मन दूतावास के पास हुआ ट्रक बम धमाका भी शामिल है, जिसमें 90 से ज्यादा लोग मारे गए थे.

इन सबने समर्थकों के बीच उन्हें लगभग एक मिथकीय लगने वाला चेहरा बना दिया.

इस दौरान उनकी केवल एक ही ज्ञात तस्वीर मौजूद थी, जिसे बीबीसी के एक अफ़ग़ान पत्रकार ने खींचा था.

लेकिन अमेरिकी सेना की वापसी के छह महीने बाद हक़्क़ानी काबुल में पुलिस अधिकारियों के दीक्षांत समारोह में दुनिया भर के कैमरों के सामने आए. इस बार उनका चेहरा खुला हुआ था.

यह उनकी नई छवि की पहली झलक थी. अब वह सिर्फ़ एक लड़ाका नहीं, बल्कि एक राजनेता के रूप में सामने आ रहे थे.

2024 में 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने उनसे लंबा इंटरव्यू किया और ये सवाल पूछा था कि क्या वह अफ़ग़ानिस्तान में बदलाव की सबसे बड़ी उम्मीद हैं?

इसके कुछ ही महीनों बाद एफ़बीआई ने चुपचाप उन पर रखा एक करोड़ डॉलर का इनाम हटा लिया.

फिर भी विश्लेषकों और अंदरूनी सूत्रों ने बार-बार बीबीसी को बताया कि सर्वोच्च नेता अखुंदज़ादा के ख़िलाफ़ खुलकर आगे बढ़ना असंभव है.

अब तक उनके फ़रमानों का जो भी विरोध हुआ, वह छोटा और सीमित ही रहा.

जैसे काबुल गुट से जुड़े अधिकारियों के इलाक़ों में दाढ़ी न बनाने जैसे नियमों को सख़्ती से लागू न करना.

लेकिन बड़े पैमाने पर बग़ावत की कल्पना भी नहीं की जाती थी.

एक पूर्व तालिबान सदस्य ने बीबीसी से कहा, "अखुंदज़ादा की आज्ञा मानना अनिवार्य माना जाता है."

ख़ुद हक़्क़ानी ने 'न्यूयॉर्क टाइम्स' को दिए इंटरव्यू में किसी भी खुले विभाजन की संभावना को कम करके पेश किया.

उन्होंने कहा, "इस समय अफ़ग़ानिस्तान के लिए एकता ज़रूरी है, ताकि देश में शांति रह सके."

एक विश्लेषक के मुताबिक़, काबुल गुट दरअसल "अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अफ़ग़ान जनता दोनों को एक संदेश" देना चाहता था.

वह संदेश यह था, ''हमें आपकी शिकायतें और चिंताएँ पता हैं, लेकिन हम क्या कर सकते हैं?"

कम से कम इंटरनेट बंद करने के आदेश से पहले तक यही स्थिति थी.

टकराव कहाँ है?

तालिबान के सर्वोच्च नेता इंटरनेट को लेकर गहरा अविश्वास रखते हैं.

उनका मानना है कि इंटरनेट की सामग्री इस्लामी शिक्षाओं के ख़िलाफ़ है.

उनकी सोच इतनी पक्की है कि वह ख़ुद ख़बरें या सोशल मीडिया नहीं देखते.

एक सहयोगी हर सुबह उन्हें ताज़ा ख़बरें और सोशल मीडिया पोस्ट पढ़कर सुनाता है, यह बात उनके प्रवक्ता ने पहले बीबीसी को बताई थी.

इसके उलट, काबुल गुट का मानना है कि इंटरनेट के बिना कोई आधुनिक देश टिक नहीं सकता.

अखुंदज़ादा का इंटरनेट बंद करने का आदेश पहले उन प्रांतों में लागू हुआ, जो उनके क़रीबी समर्थकों के नियंत्रण में थे.

इसके बाद इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया.

काबुल गुट के क़रीबी और तालिबान सरकार के भीतर मौजूद सूत्रों ने बताया कि इसके बाद जो हुआ, वह तालिबान के इतिहास में लगभग अभूतपूर्व था.

एक सूत्र ने कहा, "इसने आंदोलन के कई सदस्यों को चौंका दिया."

संक्षेप में, काबुल गुट के सबसे ताक़तवर मंत्रियों ने एकजुट होकर काबुल में मौजूद प्रधानमंत्री मुल्ला हसन अखुंद को इंटरनेट फिर से चालू करने का आदेश देने के लिए राज़ी कर लिया.

असल में, इंटरनेट पूरे देश में बंद होने से पहले ही यह गुट अपना असंतोष जता चुका था.

गुट के वास्तविक नेता बरादर कंधार गए थे और अखुंदज़ादा के एक बेहद वफ़ादार गवर्नर को चेतावनी दी थी कि 'उन्हें जगाना होगा ' और सर्वोच्च नेता की 'हाँ में हाँ मिलाने वाला' बनना बंद करना होगा.

कंधार के एक अंदरूनी सूत्र के मुताबिक़, बरादर ने कहा था, ''आप उनसे खुलकर सच नहीं कहते. वह जो कहते हैं, आप बस उसे लागू कर देते हैं."

सूत्र के मुताबिक़, उनकी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

सोमवार, 29 सितंबर को दूरसंचार मंत्रालय को सीधे सर्वोच्च नेता की ओर से आदेश मिला कि सब कुछ बंद कर दिया जाए.

मंत्रालय के एक सूत्र ने बीबीसी को बताया कि "कोई बहाना मंज़ूर " नहीं किया जाएगा.

बुधवार सुबह काबुल गुट के मंत्री- बरादर, हक़्कानी और याक़ूब प्रधानमंत्री कार्यालय में इकट्ठा हुए.

उनके साथ दूरसंचार मंत्री भी थे.

उन्होंने कंधार समर्थक प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वह ज़िम्मेदारी लें और आदेश पलट दें.

एक सूत्र के मुताबिक़, उन्होंने कहा कि इसकी पूरी ज़िम्मेदारी वे ख़ुद लेंगे.

यह कामयाब रहा. इंटरनेट फिर से चालू हो गया.

लेकिन इससे भी ज़्यादा अहम यह था कि उन कुछ दिनों में वही बात सच होती दिखी, जिसकी ओर अखुंदज़ादा ने महीनों पहले अपने भाषण में इशारा किया था.

अंदरूनी लोग तालिबान की एकता को चुनौती देने लगे थे.

लेकिन सवाल यह है कि आख़िर यह आदेश क्यों इतना निर्णायक साबित हुआ?

एक विशेषज्ञ बताते हैं कि तालिबान के सदस्य लड़कियों की शिक्षा जैसे मुद्दों पर असहमति के बावजूद अखुंदज़ादा के आदेश मानते रहे हैं.

इस बीच, जिन्होंने पहले खुलकर उनका विरोध किया, उन्हें इसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ी.

फरवरी 2025 में तत्कालीन उप विदेश मंत्री को देश छोड़कर भागना पड़ा, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि नेतृत्व "अल्लाह के रास्ते से भटक रहा है" और " दो करोड़ लोगों के साथ अन्याय" कर रहा है.

यह इशारा लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध की ओर था.

संयुक्त राष्ट्र के निगरानीकर्ताओं के मुताबिक़, जुलाई और सितंबर 2025 में कम से कम दो और लोगों को लड़कियों की शिक्षा पर अखुंदज़ादा के आदेशों पर सवाल उठाने के बाद गिरफ़्तार किया गया.

इसके बावजूद, ऐसे संकेत भी हैं कि अखुंदज़ादा और उनके सहयोगी हक़्क़ानी जैसे नेताओं को अपने क़रीब बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.

ये इसके बावजूद कि हक़्क़ानी ने सार्वजनिक रूप से सत्ता के केंद्रीकरण की आलोचना की थी.

फिर भी बोलने से आगे जाकर खुले तौर पर आदेश की अवहेलना करना एक अलग स्तर की बात थी.

एक विशेषज्ञ के मुताबिक़, इस बार जोख़िम उठाना उनके लिए फ़ायदेमंद लग रहा था.

उन्होंने कहा, "उनके पदों के साथ ताक़त और पैसे कमाने की क्षमता जुड़ी हुई है. लेकिन दोनों ही अब इंटरनेट पर निर्भर हैं, जो शासन और व्यापार के लिए बेहद ज़रूरी बन चुका है."

वो कहते हैं, "इंटरनेट बंद होने से उनके विशेषाधिकारों पर सीधा ख़तरा पैदा हो गया. जबकि बड़ी उम्र की लड़कियों को शिक्षा से दूर रखने से ऐसा ख़तरा कभी नहीं हुआ,"

इस विशेषज्ञ ने कहा, "शायद इसी वजह से वे उस एक मौक़े पर 'साहसी' बने. इंटरनेट दोबारा चालू होने के बाद अटकलें तेज़ हो गईं कि आगे क्या होगा.''

काबुल गुट के क़रीबी एक सूत्र ने संकेत दिया कि मंत्रियों को धीरे-धीरे हटाया या उनका क़द घटाया जा सकता है.

वहीं कंधार के एक अंदरूनी सूत्र का कहना है कि शायद सर्वोच्च नेता ही पीछे हट गए, "क्योंकि उन्हें इस तरह के विरोध का डर था".

साल के अंत तक सार्वजनिक तौर पर ऐसा लगा कि कुछ भी नहीं बदला है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को भेजे गए पत्र में कहा गया कि कुछ सदस्य देशों ने कंधार और काबुल के नेताओं के बीच मतभेदों को "पारिवारिक झगड़े" जैसा बताकर हल्का कर दिया है, जो यथास्थिति को नहीं बदलेगा.

पत्र में कहा गया कि सभी वरिष्ठ नेता तालिबान शासन की सफलता सुनिश्चित करने में लगे हैं.

तालिबान सरकार के वरिष्ठ प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने किसी भी तरह के विभाजन से साफ़ इनकार किया.

उन्होंने जनवरी 2026 की शुरुआत में बीबीसी से कहा, "हम ख़ुद को कभी बँटने नहीं होने देंगे. सभी अधिकारी और नेता जानते हैं कि बँट गए, तो सभी के लिए नुक़सानदेह होगा. अफ़ग़ानिस्तान के लिए भी. ये धार्मिक रूप से भी मना है और अल्लाह की ओर से भी वर्जित है.''

हालाँकि उन्होंने यह भी माना कि तालिबान के भीतर "अलग-अलग मत या सोच" मौजूद है. लेकिन इसे उन्होंने "परिवार के भीतर मतभेद" जैसा बताया.

दिसंबर 2025 के मध्य में ये "मतभेद" एक बार फिर सामने आते दिखे.

हक़्क़ानी को अपने गृह प्रांत ख़ोस्त में शुक्रवार की नमाज़ के दौरान भीड़ को संबोधित करते हुए फ़िल्माया गया.

उन्होंने चेतावनी दी, "जो व्यक्ति जनता के भरोसे, प्रेम और आस्था से सत्ता में आए और फिर उसी जनता को छोड़ दें या भूल जाएँ, वह सरकार नहीं है."

उसी दिन अखुंदज़ादा के वफ़ादार और उच्च शिक्षा मंत्री नेदा मोहम्मद नदीम ने पड़ोसी प्रांत के एक मदरसे में स्नातक छात्रों को संबोधित किया.

उन्होंने कहा, "सच्ची इस्लामी सरकार वही होती है, जिसमें एक व्यक्ति नेतृत्व करता है और बाक़ी आदेश मानते हैं. अगर बहुत सारे नेता होंगे, तो समस्याएँ पैदा होंगी और जो सरकार हमने हासिल की है, वह बर्बाद हो जाएगी."

इंटरनेट को लेकर हुए टकराव के बाद, इन बयानों को उस लीक ऑडियो से बिल्कुल अलग संदर्भ में देखा जा रहा है, जो 2025 की शुरुआत में सामने आया था.

फिर भी यह सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या 2026 वह साल होगा, जब काबुल गुट अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं और पुरुषों के लिए कोई ठोस बदलाव ला पाएगा.

एक विशेषज्ञ कहते हैं, "हमेशा की तरह सवाल यही है. अमीरात के शीर्ष स्तर पर दिखने वाले मतभेद क्या कभी कार्रवाई में बदलेंगे?"

"अब तक तो ऐसा नहीं हुआ है."

(संपादन और प्रोड्यूसिंग : ज़िया शहरेयार, फ्लोरा ड्रूरी और बीबीसी अफ़ग़ान फॉरेंसिक टीम.

मुख्य तस्वीर में जनवरी 2022 में काबुल को देखते हुए तालिबान के दो सदस्य दिखाए गए हैं.)

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.