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'सब कुछ फ़िल्मी था...' तालिबान के राज में मुसलमान लड़के और यहूदी लड़की की प्रेम कहानी
अगस्त 2021 में जब अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता तालिबान के हाथों में गई, तब अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के लिए हवाई अड्डों पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी.
इस दौरान अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में, सफ़ी रऊफ़ नाम के एक पूर्व नेवी मेडिकल स्टाफ़ ने अफ़ग़ानिस्तान में फंसे अपने दोस्तों को वहां से निकालने का मिशन शुरू किया.
उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनके इस मिशन के दौरान उन्हें उनका प्यार मिलेगा. उन्हें नहीं पता था कि उन्हें अपने धर्म से अलग एक यहूदी महिला से प्यार हो जाएगा.
सफ़ी रऊफ़ उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "मैंने हिचकिचाते हुए पहले एक व्यक्ति की मदद की और मैं ऐसा कर पाया. फिर मैंने दूसरे की, और फिर तीसरे की मदद की. अचानक यह एक बड़ा अभियान बन गया, जिसमें सैकड़ों लोग अफ़ग़ानिस्तान से और हममें से दर्ज़नों अमेरिका से काम कर रहे थे."
सफ़ी का जन्म एक शरणार्थी शिविर में हुआ था. इसके कुछ साल बाद वह अमेरिका आ गए थे. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बाद वह वहां फंसे लोगों को निकालने के लिए चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा बन गए.
इन हालात में उनकी मुलाक़ात न्यूयॉर्क की थिएटर डायरेक्टर सैमी कैनॉल्ड से हुई, जो अपने एक दोस्त के परिवार को अफ़ग़ानिस्तान से निकालने की कोशिश कर रही थीं.
सैमी कहती हैं, "मेरा कोई संपर्क नहीं था. मैंने टीवी पर सफ़ी के ग्रुप के बारे में देखा. मैंने उनसे मदद के लिए संपर्क किया. उन्होंने कहा कि मेरे लिए सबसे अच्छा यही होगा कि मैं वाशिंगटन जाऊं और उनकी टीम के साथ काम करूं."
फिर सैमी ने अपना सामान पैक किया और वॉशिंगटन डीसी जाने वाली ट्रेन में सवार होकर और एक ऑपरेशन सेंटर पहुंचीं, जहां सिर्फ़ पुरुष ही थे.
वह हंसते हुए कहती हैं, "मैं जैज़ हैंड्स थिएटर सर्किल में रहती हूं और यह मेरे लिए सांस्कृतिक झटका था."
सैमी को अफ़ग़ानिस्तान के बारे में कुछ भी नहीं पता था, लेकिन उनका एक कौशल जल्द ही बेहद ज़रूरी साबित हुआ.
"मैं स्प्रेडशीट और कम्यूनिकेशन में माहिर थी. इसलिए, मैंने ऑपरेशन के कम्यूनिकेशन का काम संभाल लिया."
दोनों के बीच कैसे पनपा प्यार?
ऑपरेशन सेंटर की अफ़रा-तफ़री और इमरजेंसी जैसी स्थिति के बीच और भी कुछ हो रहा था.
सैमी कहती हैं, "क्या कोई आकर्षण था? मुझे लगता है, इसका जवाब हां है."
वह यह भी याद करती हैं कि उन्होंने गूगल पर सफ़ी की उम्र पता की थी.
सैमी कहती हैं, "मैंने सफ़ी का नाम और उम्र गूगल पर इसलिए सर्च किया था क्योंकि उस समय वह इतने तनाव में थे कि अब की तुलना में काफ़ी बुज़ुर्ग लग रहे थे."
उनकी पहली लंबी सैर सुबह 3 बजे हुई थी, जब तालिबान चौकियों से लोगों के निकलने का इंतज़ार करते हुए उनकी रात बहुत तनाव में बीती थी. चलते-चलते वे वॉशिंगटन के स्मारकों से होते हुए लिंकन मेमोरियल पहुंचे थे.
सैमी कहती हैं, "सब कुछ बिल्कुल फ़िल्म जैसा लग रहा था. मैंने सोचा: क्या मैं इस लड़के से शादी करूंगी?"
उनकी पहली 'किस' ऑपरेशन सेंटर की बालकनी में हुई थी. उस वक़्त घबराए हुए सफ़ी सैमी से कारों के बारे में बात करने लगे थे. सांस्कृतिक तौर पर अलग-अलग होते हुए भी दोनों का रिश्ता तेज़ी से गहरा होता गया.
सफ़ी कहते हैं, "सैमी मुझसे पूछती थी कि क्या मैं उसे अपने परिवार से मिलवाऊंगा और हमेशा कहती थी कि ऐसा नहीं हो सकता."
सफ़ी के मुस्लिम परिवार को उम्मीद थी कि वह किसी अफ़ग़ान महिला से शादी करेंगे. वहीं, सैमी यहूदी हैं.
फिर भी, उन्होंने इस रिश्ते को आगे बढ़ाने की कोशिश जारी रखी. उनके रिश्ते की पहली परीक्षा तब हुई, जब सैमी ने सफ़ी को अपनी दुनिया से परिचित कराया: म्यूज़िकल थिएटर स्टेज़. सैमी उन्हें म्यूज़िकल 'ले मिज़रेबल्स' दिखाने ले गई थीं.
सैमी कहती हैं, "सफ़ी तो जैसे पागल हो गए थे. उन्हें म्यूज़िकल और ख़ासकर 'ले मिज़रेबल्स' बेहद पसंद आया, जो कि मेरे लिए किसी सपने के सच होने जैसा था."
सफ़ी पर जादू सा छा गया था.
वो कहते हैं "मैं अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए बड़ा हुआ हूं और मुझे मुख्य शो के किरदार मारियस से सचमुच जुड़ाव महसूस हुआ, जो एक विद्रोही है, लेकिन एक प्रेमी भी है."
तालिबान की क़ैद
दिसंबर 2021 में, सफ़ी अपने भाई के साथ लोगों की मदद करने के लिए काबुल लौटे. उन्हें अफ़ग़ानिस्तान नहीं जाने की सलाह दी गई थी, लेकिन सफ़ी कहते हैं कि तालिबान ने उन्हें माफ़ी और सुरक्षा का भरोसा दिया था.
हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में उनके आखिरी दिनों के दौरान तालिबान की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने सफ़ी, उनके भाई और पांच अन्य विदेशी नागरिकों को हिरासत में ले लिया.
शुरुआती कुछ दिनों तक उन्हें एक अंडरग्राउंड कोठरी में रखा गया, जहां बहुत ठंड थी.
सफ़ी कहते हैं, "कमरा छह फ़ीट बाइ छह फ़ीट का था. वहां न खिड़कियां थीं, न बिस्तर था."
वहीं न्यूयॉर्क में सैमी घबरा रही थीं. उन्होंने गूगल मैप्स पर सफ़ी की लोकेशन चेक की. सफ़ी की लोकेशन तालिबान की ख़ुफ़िया मुख्यालय दिख रही थी.
वह कहती हैं, "मुझे काबुल के ठिकानों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन मुझे पता था कि यह ठीक नहीं है."
कई हफ़्तों तक सफ़ी की कोई ख़बर नहीं मिली, जब तक कि उनकी एक असंतुष्ट गार्ड से दोस्ती नहीं हो गई. उस गार्ड को पैसों की ज़रूरत थी, जिसका सफ़ी ने फ़ायदा उठाया.
सफ़ी ने अपने चचेरे भाई की मदद से पैसे और एक मोबाइल फ़ोन का इंतजाम कर लिया.
अंडरग्राउंड कोठरी में मोबाइल फ़ोन पर कोई सिग्नल नहीं था. सिग्नल के लिए अपने भाई के कंधे पर चढ़कर, सफ़ी ने सैमी को एक मैसेज भेजा, "हाय, कैसी हो? मैं तुमसे प्यार करता हूं."
सैमी कहती हैं, "पहला फ़ोन 17 दिन बाद आया. मेरे लिए सिर्फ़ यही जानना काफ़ी था कि वह ज़िंदा हैं. उनकी आवाज़ सुनकर बहुत खुशी हुई, लेकिन साथ ही ये सोचकर बहुत डर भी लगा कि वह किस हालत में होंगे."
कैद में, सफ़ी सिर्फ़ 'ले मिज़रेबल्स' के सहारे रहे.
वह कहते हैं, "पहले 70 दिनों तक, मैंने सूरज नहीं देखा. हम पूरे समय तहखाने में ही रहे. वहां सात और विदेशी बंधक थे और उनमें से एक बहुत बीमार हो गया, और फिर दूसरा बहुत हताश हो गया."
ऐसे हालात में वह धीरे से 'लेस मिज़रेबल्स' के गीत गाते थे. वह कहते हैं, "वह मेरे प्रतिरोध का गीत बन गया था."
इस बीच, सैमी के साथ उनकी बातचीत जारी रही.
वह कहते हैं, "मैं कंबल ओढ़कर फुसफुसा कर बात करता था ताकि गार्ड मुझे न सुन पाए."
"और मेरा भाई भी मुझसे लगभग दो फ़ीट की दूरी पर ही रहता था. ऐसे में सैमी के साथ रोमांटिक बातचीत करना संभव नहीं था."
सफ़ी के माता-पिता से सैमी की मुलाक़ात
तालिबान के साथ बातचीत लंबी खिंचती गई. लेकिन 70वें दिन सफ़ी की रिहाई पर सहमति बन गई.
सैमी बताती हैं कि एक समय तालिबान ने धमकी दी थी कि अगर अमेरिका ने कुछ नहीं किया तो वह उसे मार देंगे.
"यह तय हुआ कि सफ़ी के माता-पिता और मैं क़तर जाएंगे, जहां पूरी प्रक्रिया में तेज़ी लाने के लिए काफ़ी बातचीत चल रही थी."
सैमी कतर गईं, जहां बातचीत चल रही थी और वहीं उनकी मुलाक़ात पहली बार सफ़ी के माता-पिता से हुई.
वो कहती हैं, "उन्हें मेरे बारे में पहले से पता नहीं था और अचानक हम दो हफ़्तों तक साथ रहने लगे."
वह आगे कहती हैं, "चूंकि सफ़ी के माता-पिता बहुत अच्छे से अंग्रेज़ी नहीं बोलते थे, इसलिए यह तय किया गया कि मैं परिवार की प्रतिनिधि बनूं."
रूढ़िवादी अफ़ग़ान मुसलमानों के लिए, अपने बेटे की सीक्रेट यहूदी गर्लफ़्रेंड का पता चलना एक सदमा था. लेकिन, इस संकट ने उन्हें इस बात को स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया.
सैमी कहती हैं, "मैं सफ़ी के माता-पिता को इसका श्रेय देती हूं. उन्होंने मुझे जिस तरह अपनाया, वह अद्भुत था."
105 दिनों के बाद, सफ़ी को रिहा कर दिया गया और वह आखिरकार सैमी से मिले.
यूं हुई दोनों की शादी
अमेरिका में दोबारा मिलने के बाद दोनों साथ रहने लगे.
जल्द ही दोनों ने शादी कर ली. उनकी शादी पर अफ़ग़ान और यहूदी परंपरा का मेल देखा गया.
मेहमानों ने अफ़ग़ान पोशाक पहनी, यहूदी गीत गाए गए और सफ़ी ने अपने दोस्तों के साथ 'फ़िडलर ऑन द रूफ़' का बॉटल डांस भी किया.
एक मार्मिक क्षण में, सैमी ने सफ़ी की कैद के दौरान लिखी अपनी डायरी पढ़ी.
तालिबान की कैद में सफ़ी के 32वें दिन सैमी ने अपनी डायरी में लिखा था, "मेरा सपना है कि एक दिन मैं आपके साथ कहीं बरामदे में बैठकर यह डायरी पढ़ूंगी. प्लीज़, प्लीज़, प्लीज़ वापस आना."
वह डायरी लिखते वक़्त सैमी ने उसे नहीं पढ़ा था.
"यह बहुत दर्द भरा था, लेकिन हमारी शादी पर हमने इसे साथ-साथ पढ़ा."
यहां तक कि उनकी सगाई की अंगूठी के पीछे भी एक कहानी है. सफ़ी ने अपनी जेल के ताले का एक टुकड़ा अंगूठी में जड़वाया था.
वह कहते हैं, "उस अनुभव ने हमारे जीवन की नींव रखी."
प्यार के सबक
पीछे मुड़कर देखने पर, सैमी को लगता है कि उनके इस अनुभव ने उनके रिश्ते को नया रूप दिया.
वह कहती हैं, "मैं जितने भी कपल को जानती हूं, हम उनसे कम झगड़ते हैं क्योंकि जब आप किसी को लगभग खो चुके होते हैं, तो छोटी-छोटी बातें मायने नहीं रखतीं."
सफ़ी बेहद आभारी महसूस करते हैं.
वह कहते हैं, "ज़िंदगी अब हमारे सामने जो भी चुनौती पेश करेगी, वह कभी भी उतनी मुश्किल नहीं होगी जितनी हमने झेली है. यहां होना, टूटा हुआ नहीं होना और प्यार में होना- यह एक चमत्कार है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित