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अफ़ग़ानिस्तान की ज़ाकिरा कैसे तुर्की में सबकी उम्मीद बनकर उभरीं
- Author, महजूबा नौरोज़ी
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
एक युवा लड़की के तौर पर ज़ाकिरा हिकमत को तालिबान शासित अफ़ग़ानिस्तान में शिक्षा पाने के लिए संघर्ष करना पड़ा.
लेकिन डॉक्टर बनने के लिए उन्होंने बड़ी चुनौतियों को पार किया.
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की महजूबा नौरोज़ी ने तुर्की जाकर डॉ. ज़ाकिरा हिकमत से बात की और शरणार्थियों की मदद के लिए बनाए गए उनके संगठन के बारे में जाना.
इस काम के लिए ज़ाकिरा को व्हाइट हाउस में अंतरराष्ट्रीय सम्मान (इंटरनेशनल वुमेन ऑफ़ करेज अवॉर्ड) से सम्मानित भी किया गया.
जैसे ही साउंड सिस्टम में संगीत बजता है, वैसे ही पारंपरिक पोशाक में महिलाएं और लड़कियां डांस शुरू कर देती हैं.
दर्शक उत्सुकता से ताली बजाते हैं और उनमें से कई दर्शक वीडियो बनाने के लिए अपने मोबाइल को भी निकाल लेते हैं.
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ज़ाकिरा का मक़सद बदला
अफ़ग़ानिस्तान में डांस करना या इस तरह की गतिविधियां प्रतिबंधित हैं, लेकिन मध्य तुर्की के शहर कायसेरी में अफ़ग़ान शरणार्थी एकजुटता संघ (अफ़ग़ान रिफ़्यूज़ी सॉलिडैरिटी एसोसिएशन) के इस कार्यक्रम में लोग अपनी बात कहने के लिए आज़ाद हैं.
डॉ. ज़ाकिरा हिकमत ने साल 2014 में इस चैरिटी संगठन की स्थापना की थी.
उन्होंने कहा, "नृत्य और संगीत हमेशा हमारे साथ रहेंगे. यह शरणार्थियों के लिए थेरेपी है, जो अलग-अलग समुदाय से आते हैं और जिनकी अलग-अलग समस्याएं हैं."
यहाँ तुर्की में एक लाख से भी ज़्यादा अफ़ग़ान शरणार्थी हैं और उनमें से हज़ारों लोग बिना किसी उचित दस्तावेज़ के हैं.
इनमें से ज़्यादातर लोग और अलग-अलग देशों के लाखों अन्य लोग- बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. किसी दूसरे देश में बिना वहां की भाषा बोले खाने से लेकर रहने के लिए किसी ठिकाने तक के लिए जूझ रहे हैं. इनकी पहुंच चंद सुविधाओं तक ही होती है.
डॉ. ज़ाकिरा ने तालिबान के दौर में कैसे जारी रखी पढ़ाई
ज़ाकिरा को भी हज़ारों दूसरी लड़कियों की तरह साल 1996 में तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद स्कूल जाना बंद करना पड़ा था. यह अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी शासन का पहला दौर था.
लेकिन देश के दक्षिण पूर्वी प्रांत ग़ज़नी में ज़ाकिरा अपनी शिक्षा को जारी रखने के लिए डटी हुई थीं.
ज़ाकिरा कहती हैं, "मैंने इस अंधकारमय समय से बाहर निकलने और अज्ञानता से बचने के लिए अपने शिक्षकों और परिवार की मदद से चोरी-छिपे पढ़ाई करने की कोशिश जारी रखी."
"मैं एक ग़रीब परिवार में पैदा हुई थी. उनके पास नोटबुक और पेन के लिए पैसे नहीं थे. मेरी मां ने मेरे और मेरे भाई-बहनों के लिए स्कूल के सामान ख़रीदने के लिए अपने कपड़े भी बेच दिए थे."
ज़ाकिरा ने कहा, "जब उन्होंने सुना कि तालिबान आ रहा है तो उन्हें भागकर छिपना पड़ा."
ऐसी असंभव परिस्थितियों के बावजूद ज़ाकिरा अपनी पढ़ाई जारी रखने में क़ामयाब रहीं और तालिबान के सत्ता से हटने के बाद तुर्की में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए तीन स्कॉलरशिप भी जीतने में सफल रहीं.
लेकिन ज़ाकिरा का नाम स्कॉलरशिप की लिस्ट से हटा दिया जाता था क्योंकि वह एक महिला थीं.
ज़ाकिरा बताती हैं, "बहुत आग्रह करने के बाद तुर्की दूतावास ने मुझे परीक्षा की कॉपी दिखाई. मैंने काफ़ी अच्छे नंबर हासिल किए थे. लेकिन अफ़ग़ान अधिकारियों ने मेरा और गज़नी प्रांत की पाँच अन्य लड़कियों के नाम लिस्ट से हटा दिए थे और उन्होंने टर्किश दूतावास से कहा था कि लड़कियों को अकेले विदेश यात्रा नहीं करनी चाहिए."
आख़िरकार अधिकारियों ने नरमी दिखाई और ज़किरा को सपने पूरा करने के लिए तुर्की जाने की मंज़ूरी दे दी.
ज़ाकिरा साल 2008 में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए तुर्की गई थीं. लेकिन संयोग से हुई एक मुलाक़ात ने उनकी दिशा को बदल कर रख दिया.
किस घटना ने बदली डॉ. ज़ाकिरा के सोचने की दिशा
ज़ाकिरा फोन पर फ़ारसी भाषा में बात कर रहीं थीं. तभी एक रोती हुई महिला उनके पास दौड़ते हुए आई और गले लगाने लगी.
महिला ने ज़ाकिरा से पूछा, "आप कहां से हैं, क्योंकि आप फ़ारसी बोल रही हैं."
महिला ने ज़ाकिरा को बताया कि वह अपने परिवार के साथ चार दिन और चार रातों तक बस टर्मिनल पर फंसी रहीं. वह टर्किश भाषा नहीं बोल पाती थीं और उनको नहीं पता था कि आगे क्या करना है?
ज़ाकिरा ने उन प्रवासियों को इमिग्रेशन ऑफ़िस पहुंचाने और अधिकारियों से मदद दिलाने में सहायता की.
इस अनुभव ने उनको यह एहसास दिलाया कि सिर्फ़ दवा के ज़रिए ही नहीं बल्कि दूसरे तरीकों से भी वह लोगों की मदद करना चाहती हैं.
इसी वजह से ज़ाकिरा ने एएसआरए की स्थापना की, जो ना केवल अफ़ग़ान बल्कि तुर्की में सीरियाई, इराक़ी और ईरानी प्रवासियों की मदद भी करता है.
यह संगठन 62 शहरों में 130,000 से ज़्यादा लोगों की मदद कर चुका है. इस संगठन में 30 कर्मचारी हैं और 300 से भी ज़्यादा स्वयंसेवी या वॉलन्टियर्स हैं.
दवा नाकाफ़ी
एक ईरानी महिला ने बताया, "एक दिन पुलिस हमारे घर आई और हम सभी को एक शिविर में लेकर गई. हमारे आठ रिश्तेदारों को हिरासत में लिया गया था क्योंकि उनके पास अभी तक आधिकारिक दस्तावेज़ नहीं थे."
हालांकि उन्होंने अपना नाम इस्तेमाल ना करने की इच्छा जताई.
उन्होंने बताया, "वह एक सामान्य यूरोपीय शरणार्थी शिविर की तरह नहीं था. असल में एक जेल की तरह था."
43 वर्षीय ईरानी महिला ने बताया कि शरणार्थी शिविर में खाने के लिए पर्याप्त खाना भी नहीं था और वहां स्वास्थ्य सुविधाओं का कोई नामो-निशान तक नहीं था.
43 वर्षीय ईरानी महिला ने कहा, "जब उन्होंने हमें किसी से संपर्क करने की इजाज़त दी तो मैंने डॉ. ज़ाकिरा हिकमत को कॉल किया और यह एक चमत्कार की तरह था. एएसआरए ने हमें शिविर से रिहा करवाया."
हालांकि बचपन से ही ज़ाकिरा का सपना डॉक्टर बनने का रहा है लेकिन उन्होंने पाया कि एएसआरए चलाने का फ़ैसला उनके लिए स्वाभाविक था.
डॉ. ज़ाकिरा कहती हैं, "चार साल से भी ज़्यादा वक़्त तक मैं एक सरकारी अस्पताल के शरणार्थी विभाग की सीनियर डॉक्टर थी."
"रिफ़्यूजी हमारे पास बहुत सी समस्याएं लेकर आते थे और मैंने महसूस किया कि उन सभी समस्याओं का इलाज केवल दवा से मुमकिन नहीं है."
तालिबान और महिलाएं
तीन महीने पहले चार बच्चों के पिता, फ़रायदून तलाई को तुर्की में रहने के लिए दस्तावेजों की अवधि बढ़ाने से मना कर दिया गया.
अफ़ग़ानिस्तान के पंजशीर प्रांत के शरणार्थी फ़रायदून तलाई ने बताया, ''ज़ाकिरा ने मुझे एक वकील दिया. मैं अनपढ़ हूं तो उन्होंने मेरी अपील भी लिखी और मैंने इसे अदालत में पेश किया."
एएसआरए ने फ़रायदून की मदद ना केवल क़ानूनी समस्याओं में की बल्कि उनकी निजी समस्याओं में भी सहायता उपलब्ध करवाई.
फ़रायदून ने बताया, "मेरा बेटा तीन साल तक अस्पताल में रहा और ज़ाकिरा ने दस्तावेजों के अनुवाद में मेरी सहायता की."
उन्होंने रोते हुए कहा, "जब मेरे बेटे की मृत्यु हुई तो डॉ. ज़ाकिरा ने अंतिम संस्कार में भी सहायता की."
जहाँ मैं फ़रायदून से बात कर रही थी, वहाँ से कुछ मीटर की दूरी पर चैरिटी की एक कक्षा में पढ़ाई जारी थी.
जब शिक्षक बोर्ड पर लिखे हुए वाक्यों को पढ़ रहे थे, उस समय बच्चे शोर मचाते हुए गाना गा रहे थे. वहीं पीछे बैठी बड़ी उम्र की महिलाओं का समूह अभ्यास पुस्तिकाओं में नोट्स बना रहा था.
डॉ. ज़ाकिरा ने कहा, "जब तालिबान सत्ता में आया था, उस वक़्त एक 12 साल की लड़की स्कूल भी नहीं जा सकती थी. लेकिन अब वह दो बच्चों की मां है और अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है."
डॉ. ज़ाकिरा को उम्मीद है कि एएसआरए के काम के ज़रिए वह तुर्की में बड़ी तादाद में अफ़ग़ान प्रवासियों की मदद करना जारी रख पाएंगी ताकि वह अपने और अपने बच्चों को लिए बेहतर जीवन जी सकें.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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