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तालिबान ने पढ़ाई के लिए विदेश जाने वाली लड़कियों का सपना कैसे तोड़ा
- Author, नूर गुल शफ़क
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की ओर से महिलाओं के लिए विश्वविद्यालयों को बंद करने के बाद मेरे पास सिर्फ एक उम्मीद बच गई थी. मैं चाहती थी कि मुझे किसी तरह स्कॉलरशिप मिल जाए और इसके भरोसे पढ़ने के लिए विदेश चली जाऊं."
बीस साल की अफ़ग़ान छात्रा नतकई अपनी दर्द भरी दास्तान सुना रही थीं. ये उनका असली नाम नहीं है. पहचान छिपाने के लिए उनका नाम बदल दिया गया है.
नतकई का कहना है अपने देश में यूनिवर्सिटी में पढ़ने की बहुत थोड़ी उम्मीद बचे होने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी.
इस पढ़ाई के बूते उन्हें दुबई यूनिवर्सिटी की स्कॉलरशिप मिल गई. ये स्कॉलरशिप संयुक्त अरब अमीरात के दिग्गज कारोबारी शेख ख़लफ अहमद अल हब्तूर ने शुरू की है.
तालिबान की ओर से अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के लिए यूनिवर्सिटी एडमिशन बंद किए जाने के बाद दिसंबर, 2022 में ये स्कॉलरशिप शुरू की गई थी. बीबीसी के हिसाब से करीब 100 महिलाएं ये स्कॉलरशिप हासिल करने में सफल रही हैं. विदेश में रह रही कुछ अफ़ग़ान स्टूडेंट्स इस स्कॉलरशिप पर पढ़ाई करने के लिए दुबई पहुंच भी चुके हैं.
देश से बाहर जाने पर रोक
बुधवार को नतकई अपने परिवार से विदाई लेकर एयरपोर्ट की ओर से चल पड़ी थीं. लेकिन वहां पहुंचते ही उनकी उम्मीदें धूल में मिल गईं.
रुआंसी आवाज़ में उन्होंने मुझसे कहा, "तालिबान ने जैसे ही हमारा टिकट और स्टूडेंट वीज़ा देखा वैसे ही कहा कि छात्राओं को स्टूडेंट वीज़ा पर अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जाने की इजाज़त नहीं है."
नतकई उन 60 लड़कियों में शामिल हैं, जिन्हें एयरपोर्ट से लौटा दिया गया. बीबीसी ने जो तस्वीरें देखी हैं उनमें युवा लड़कियां काला हिजाब और अबाया पहन कर अपने सामान के साथ खड़ी हैं. वो पूरी तरह हताश और निराश दिख रही हैं.
तालिबान ने महिलाओं को अकेले यात्रा करने पर रोक लगा दी है. वो अपने पति या भाई, चाचा या पिता जैसे रिश्तेदारों के साथ ही विदेश जा सकती हैं. महिलाओं के साथ जाने वाले इन रिश्तेदारों को महरम कहा जाता है.
लेकिन महरम के बावजूद कई महिलाओं को विदेश जाने से रोक दिया गया. नतकई ने बताया, "प्लेन के अंदर तीन महिलाएं थीं, जिनके साथ महरम थे लेकिन लेकिन तालिबान शासन के दुराचार और सदाचार मंत्रालय के लोगों ने उन्हें प्लेन से उतार दिया."
विदेश मंत्रालय
बाकी छात्राएं इतनी डरी हुई थीं कि उन्होंने मीडिया से कोई बात नहीं की.
शम्स अहमद (बदला हुआ नाम) नाम के एक शख्स अपनी बहन के साथ एयरपोर्ट पर मौजूद थे. उन्होंने हमें अपनी दिक्कतों के बारे में बताया
वो कहते हैं, "महिलाओं के लिए यूनिवर्सिटी बंद होने के बाद स्कॉलरशिप ही एक मात्र उम्मीद के तौर पर बची हुई थी. लेकिन वो उम्मीद के साथ घर से निकली और आंसुओं के साथ वापस लौटी. उनके सारे हक छीन लिए गए हैं."
अहमद ने बताया कि कुछ महिलाओं ने अपने साथ एक पुरुष साथी के वीज़ा इंतजाम करने के लिए उधार पर पैसे लिए थे. फिर भी वो विदेश नहीं जा पाईं.
उन्होंने कहा, "इनमें से कुछ लड़कियां लाचार और गरीब हैं. उनके पास विदेश मंत्रालय की ओर मांगे जाने वाले 400 अफ़ग़ान (अफ़ग़ानिस्तान की मुद्रा) भी नहीं है. ये फीस उनके दस्तावेजों की जांच के लिए ली जाती है."
'मुझे पता नहीं कि क्या करूं...'
दुबई यूनिवर्सिटी और अल हब्तूर ने इस बात की पुष्टि की है कि लड़कियों को रोका गया.
अल हब्तूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉकॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो मैसेज पोस्ट किया. इसमें वो तालिबान अधिकारियों की आलोचना करते हुए दिख रहे हैं. वो कह रहे हैं इस्लाम में पुरुष और महिलाएं बराबर हैं.
वीडियो में एक अफ़ग़ान लड़की का अंग्रेजी में वॉयस नोट भी है. इस लड़की को हवाई अड्डे पर रोका गया था.
लड़की इस वॉयस नोट में कह रही है, "हम अभी एयरपोर्ट पर हैं लेकिन दुर्भाग्य से सरकार हमें दुबई जाने की अनुमति नहीं दे रही है. यहां तक कि ये उन लोगों को भी इजाज़त नहीं दे रहे हैं जिनके साथ महरम हैं. मुझे पता नहीं कि क्या करूं. प्लीज़ हमारी मदद कीजिए."
ह्यूमन राइट्स वॉच की हीथर बर्र कहती हैं, "तालिबान लड़कियों और महिलाओं को शिक्षा से पहले ही रोक चुका है. अब लड़कियों को बाहर जाने पर पाबंदी लगा कर इसने क्रूरता के चरम को पार कर लिया है.ये बेहद चिंताजनक है. तालिबान का ये कदम दूसरों को उन्हें मदद करने से रोक रहा है."
तालिबान की ओर से सफ़ाई नहीं...
अफ़ग़ानिस्तान से संयुक्त राष्ट्र की पूर्व युवा प्रतिनिधि शकुला जादरान ने एक मैसेज पोस्ट कर दुबई यूनिवर्सिटी से आग्रह किया है कि वो लड़कियों के मामलों को न छोड़ें.
तालिबान ने अभी तक इस मामले में कोई बयान या सफ़ाई नहीं दी है.
तालिबान शासन के दुराचार और सदाचार मंत्रालय के प्रवक्ता मोहम्मद सादिक़ आकिफ़ मुहाजिर ने बीबीसी को बताया कि उन्हें इस घटना की जानकारी नहीं है.
तालिबान के एक वरिष्ठ प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने भी इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और कहा कि वो सफ़र कर रहे हैं. उनके पास कोई जानकारी नहीं है.
'इस देश में लड़की होना अपराध है...'
नतकई निराशा की हालत में हैं. नतकई ने ग्रैजुएशन की डिग्री ली है.
15 अगस्त, 2021 को तालिबान के सत्ता में आने के वक्त से वो यूनिवर्सिटी एंट्रेस की तैयारी कर रही थीं.
स्कॉलरशिप मिलने बाद नतकई ने सोचा कि उसे अपना सपना पूरा करने के लिए एक नया रास्ता मिल गया है.
लेकिन अब वो कहती हैं कि उन्हें तालिबान से कुछ नहीं कहना है क्योंकि "वो न तो महिलाओं को अपनाते हैं और न उनका सम्मान करते हैं."
वो पूरी दुनिया से अपील करती हैं अफ़ग़ान लड़कियों को और उनकी शिक्षा के मामले को न छोड़ें.
उन्होंने कहा, "मैंने एक मौका खोया है. क्योंकि इस देश में लड़की होना अपराध है. मैं बेहद ग़मज़दा हूं. मुझे पता नहीं कि मैं क्या करूं. मैं नहीं जानती कि आगे जाकर मेरे साथ क्या होगा."
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