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ड्रग्स से कमाई कर अफ़ग़ानिस्तान जीतने वाला तालिबान अब नशा मुक्ति अभियान में जुटा
- Author, यल्दा हकीम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
''मैं एक पुल के नीचे खड़ा था. मैं कुछ ड्रग्स हासिल करने की ताक में था. तभी मुझे लगा कि पीछे से किसी हाथ ने मुझे जकड़ लिया है. ये तालिबान के लोग थे. वे हमें यहां से कहीं दूर ले जाने के लिए आए थे.''
मोहम्मद उमर उस वक़्त को याद कर रहे हैं जब तालिबान लड़ाके पश्चिमी काबुल के पुल-ए-सुख्ता ब्रिज पर उनके सामने अचानक आ खड़े हुए थे.
2021 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की दोबारा वापसी से पहले ये इलाका ड्रग्स लेने वालों की सक्रियता के लिए कुख्यात था.
हाल के दिनों में तालिबान के लोग पूरी राजधानी में सैकड़ों लोगों को पुल, पार्कों और पहाड़ियों की चोटियों से पकड़ कर ला रहे हैं.
इनमें से ज़्यादातर लोगों को अमेरिकी सेना की ओर खाली किए जा चुके एक मिलिट्री बेस में ले जाया जाता है. अब इसे नशेड़ियों के अस्थायी पुनर्वास केंद्र में बदल दिया गया है.
अफगानिस्तान में ड्रग्स की लत चरम पर है. ड्रग्स इस्तेमाल के मामले में इसे दुनिया की राजधानी माना जाता है.
ब्यूरो ऑफ इंटरनेशनल नारकोटिक्स एंड लॉ एनफोर्समेंट के मुताबिक़ देश की चार करोड़ लोगों की आबादी में कम से कम 35 लाख लोग ड्रग्स के आदी हैं.
कूड़े का ढेर और नशेड़ियों का अड्डा
अगर आप पुल-ए-सुख्ता ब्रिज की तरफ जाएंगे तो आपको सैकड़ों पुरुष उकड़ू बैठे मिलेंगे. गंदगी और कूड़े-करकट के बीच कूबड़ों की तरह बैठे लोगों को हुजूम दिखेगा.
सीरिंज, मल-मूत्र से से इलाका भरा रहता है. और वहां आपको कूड़े के ढेर में लाशें भी मिल जाएंगीं. ये ऐसे लोगों की होती हैं, जो ड्रग्स ओवरडोज से मर चुके होते हैं.
लोगों का पसंदीदा ड्रग्स हेरोइन और मेथैम्फेटमिन होता है.
पुल के नीचे पसरी दुर्गंध असहनीय है. कुत्ते गंदगी के ढेर में घूमते रहते हैं. यहां पड़ी लाशों में वो खाना ढूंढते फिरते हैं. पुल के ऊपर ट्रैफिक का रेला दिखता है. फेरीवाले गलियों में सामान बेचते दिख जाएंगे और बस पकड़ने के लिए स्थानीय बस डिपो की ओर भागते हुए.
उमर कहते हैं, ''मैं वहां अपने दोस्तों से मिलने और उनसे कुछ ड्रग्स लेने के लिए जाया करता था. मुझे मरने से डर नहीं लगता था. मौत तो वैसे भी ख़ुदा के हाथ में होती है.''
पिछली सरकार में नशे के आदी लोगों को पकड़ कर अलग-अलग सेंटर्स में भेज दिया जाता था. ड्रग्स के आदत के शिकार जो लोग कभी इसे अपना घर कहा करते थे, उन्हें अब भुलाया जा चुका है.
लेकिन जब 2021 में तालिबान की सरकार दोबार यहां आई तो उसने इन लोगों को गलियों से हटाने के लिए और आक्रामक अभियान शुरू किया.
उमर कहते हैं, '' तालिबान के लोग हमें पाइप से कोड़े बना कर मारते थे. इसी तरह के एक अभियान में मेरी उंगली टूट गई थी. मैं इस जगह को छोड़ना नहीं चाहता था इसलिए मुझे मार पड़ी. मैंने विरोध किया फिर भी उन्होंने मुझे बाहर निकलने पर मजबूर किया''
इसी तरह कई लोगों के साथ उमर को बस में ठूंस दिया गया.
बाद में तालिबान सरकार ने जो फुटेज जारी किया उसमें दिखाया गया था कि उसके सैनिक ड्रग्स ओवरडोज की वजह से मर चुके लोगों की लाशें उठा रहे हैं. जो लोग जिंदा थे उन्हें स्ट्रेचर लाद कर ले जाया जा रहा था क्योंकि वे बेहोश थे.
पुनर्वास केंद्र में जगह कम मरीज ज्यादा
उमर को जिस ड्रग्स पुनर्वास केंद्र में ले जाया गया उसमें 1000 बिस्तर हैं. वहां अभी लगभग 3000 ऐसी मरीजों का इलाज हो रहा है. माहौल बेहद गंदा है. लोगों को इस सेंटर में लगभग 45 दिनों तक रखा जाता है. वहां उनका सघन नशा मुक्ति सेशन के दौरान इलाज होता है. इसके बाद उन्हें छोड़ दिया जाता है.
हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि इस सेशन से सारे मरीजों के नशे की आदत खत्म हो जाएगी. वे दोबारा ड्रग्स के चंगुल में फंस सकते हैं.
जिन लोगों को गलियों से हटा कर पुनर्वास केंद्रों में ले जाया जाता है, उनमें सबसे अधिक पुरुष हैं. लेकिन कुछ महिलाओं और बच्चों को भी इन सेंटरों में ले जाया गया है.
ड्रग्स लेने के आदी दूसरे लोगों की तरह काबुल के एक सेंटर के रूम में बंद उमर काफी कमजोर दिख रहे हैं. यहां उन्हें भूरे रंग के जो कपड़े दिए गए हैं वे भी उनके शरीर से झूल रहे हैं.
एक बिस्तर के कोने में बैठे उमर उन दिनों का हाल सुनाते हैं.
वो बताते हैं, ''एक दिन मैं दुबई में होता था, दूसरे दिन तुर्की और कभी-कभी ईरान में. कैम एयर के फ्लाइट अटेंडेंट के तौर पर मैंने पूरी दुनिया की यात्रा की थी. हमारे साथ विमान में कभी-कभी पूर्व राष्ट्रपति जैसे वीआईपी मेहमान भी हुआ करते थे.''
लेकिन काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद उनकी नौकरी चली गई. आर्थिक दिक्कतों और अनिश्चित भविष्य को दबाव में वो ड्रग्स की शरण में चले गए.
तालिबान ने 1990 के देश में अफीम खत्म करने के लिए अफीम की खेती पर बैन लगा दिया था.
लेकिन तालिबान की ओर से 20 साल के विद्रोह दौरान ड्रग्स का कारोबार उसकी आय का प्रमुख स्रोत बना रहा.
लेकिन अब तालिबान का कहना है कि उसने अफीम के कारोबार पर पाबंदी लगा दी है. लेकिन यूएन के मुताबिक़ 2021 की तुलना में 2022 में अफीम के खेती 32 फीसदी बढ़ गई.
ध्वस्त अर्थव्यवस्था ने बढ़ाईं मुश्किलें
इस बीच, अफ़गानिस्तान की अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच गई है. अंतरराष्ट्रीय सहायता भी कम हो गई है. सुरक्षा चुनौती, जलवायु परिवर्तन और खाद्य महंगाई बढ़ने से अफ़गानिस्तान की हालत और खराब हो गई है.
पुनर्वास केंद्र में आने के बाद से उमर ने तय किया है वह ठीक होकर दम लेंगे.
वो कहते हैं,''मैं शादी करना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि मैं परिवार के साथ सामान्य जिंदगी बिताऊं. यहां के डॉक्टर बड़े दयालु हैं. वे मुझे ठीक करने के लिए काफी मेहनत कर रहे हैं.''
सेंटर के डॉक्टरों के लिए यहां का काम कठिन होता जा रहा है. तालिबान लगातार यहां और लोगों को ला रहा है स्टाफ उनके लिए जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है.
एक डॉक्टर ने मुझसे कहा,''हमें मदद चाहिए. अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियां यहां से चली गई हैं और उन्होंने मदद बंद कर दी है. लेकिन हमारी दिक्कतें नहीं गई हैं. ''
इस डॉक्टर ने कहा, ''यहां आए लोगों में कई प्रोफेशनल लोग हैं. स्मार्ट और अच्छे पढ़े-लिखे. पहले वो एक अच्छी जिंदगी बिताते थे. लेकिन हमारे समाज में गरीबी और नौकरियों की वजह से परेशानियां बढ़ गई है. वे अब इससे निजात पाना चाहते हैं.
बहरहाल मरीजों की बढ़ती भीड़ और संसाधनों की कमी के बावजूद डॉक्टर ड्रग्स के आदी इन मरीजों की मदद के लिए प्रतिबद्ध दिखते हैं. वो इन मरीजों की मदद के लिए जो कुछ कर सकते हैं कर रहे हैं.
हालांकि उन्होंने कहा, ''फिर इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यहां से जाने के बाद वे दोबारा ड्रग्स के चंगुल में नहीं फंसेंगे. लेकिन हमें तो कोशिश करते रहना होगा. हमें उनके भविष्य के लिए उनकी मदद करनी ही होगी. लेकिन फिलहाल उनके उन्हें ऐसी कोई उम्मीद नहीं दिखती. ''
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