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अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं को यूनिवर्सिटी जाने से रोकने पर मुस्लिम देश क्यों हैं ख़फ़ा
अफ़ग़ानिस्तान महिलाओं को यूनिवर्सिटी जाने पर रोक लगाने के फ़ैसले की मुस्लिम देशों समेत पूरी दुनिया में निंदा के बावजूद तालिबान प्रशासन अपना फ़ैसला बदलने को तैयार नहीं दिखता.
महिलाओं को विश्वविद्यालयों में जाने से प्रतिबंधित कर दिया है जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा हो रही है और देश में युवा इससे निराश हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के अुम टेलिविज़न के मुताबिक तालिबान के उच्च शिक्षा मंत्री ने कहा है कि अफ़गा़निस्तान पर भले ही प्रतिबंध लगाएं जाएं या एटम बम गिराए जाए उनकी सरकार महिलाओं को यूनिवर्सिटी से दूर रखने के नियमों को लागू करके के रहेगी.
तालिबान ने पिछले सप्ताह ये कह कर महिलाओं को यूनिवर्सिटी में आने से रोक दिया था कि वे यहां पुरुषों से खुलेआम मिलती-जुलती हैं. इसके अलावा विश्वविद्यालयों में जो विषय पढ़ाए जाते हैं, वो इस्लाम के ख़िलाफ़ हैं.
महिलाओं पर सख़्त नज़र
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सख्ती बढ़ती जा रही हैं. पिछले दिनों तालिबान सरकार ने उन महिलाओं के नौकरी करने पर पाबंदी लगा दी थी, जो अफ़ग़ानिस्तान में काम कर रहे शीर्ष अंतरराष्ट्रीय एनजीओ के लिए काम कर रही थीं.
इस पाबंदी के बाद पांच गैर सरकारी संगठनों ने अफ़ग़ानिस्तान में अपना काम बंद कर दिया है.
जिन गैर-सरकारी संगठनों ने वहां अपना काम रोक दिया है उनमें 'केयर इंटरनेशनल', 'नॉर्वेजियन रिफ्य़ूजी काउंसिल' और 'सेव द चिल्ड्रन' जैसे संगठन शामिल हैं.
इन संगठनों का कहना है चूंकि उनके पास कोई भी महिला कर्मचारी नहीं रह गई थीं. इसलिए उन्हें अपना काम रोकना पड़ा.
एक और एनजीओ इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी ने अपना काम रोकने का ऐलान किया है. वहीं इस्लामिक रिलीफ़ ने भी सूचना दी है कि वह अपना अधिकतर काम अब समेट रहा है.
तालिबान के आर्थिक मामलों के मंत्रालय के प्रवक्ता अब्देल रहमान हबीब ने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय विदेशी सहायता प्राप्त एजेंसियों में काम करने वाली महिलाएं इस्लामी ड्रेस कोड का उल्लंघन कर रही हैं. वे हिजाब नहीं पहन रही हैं.
तालिबान ने उन संगठनों के लाइसेंस रद्द करने की चेतावनी दी थी जिन्होंने इन प्रतिबंधों के मुताबिक चलने का फैसला नहीं किया था.
फ़ैसले से मुस्लिम देश भी नाराज़
तालिबान के प्रतिबंधों के बावजूद कई संगठनों ने उनसे अपील की थी कि महिलाओं को काम करने दिया जाए
'केयर', 'एनआरसी' और 'सेव द चिल्ड्रेन' के प्रमुखों ने एक संयुक्त बयान में कहा है कि अगर ये महिलाएं इनके लिए काम नहीं कर रही होतीं तो अगस्त 2021 से काम कर रहे ये संगठन लाखों अफ़ग़ान महिलाओं और बच्चों की मदद नहीं कर पाते.
महिलाओं के ख़िलाफ़ उठाए जा रहे इन कदमों का मुस्लिम देशों में भी विरोध हो रहा है.
मिस्र में इस्लामी शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र अल-अज़हर के सबसे बड़े इमाम अहमद अल-तैयब ने अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं को यूनिवर्सिटी शिक्षा से रोकना शरीयत के ख़िलाफ़ है.
उन्होंने तालिबान से इस फैसले पर पुनर्विचार करने और इसे वापस लेने की अपील की है.
उन्होंने कहा है, ''मैं अफ़ग़ानिस्तान सत्ता से बैठे लोगों से अपील करता हूं कि वो इस फैसले पर पुनर्विचार करें ताकि सच्चाई पर चला जा सके. ''
उन्होंने कहा है कि महिलाओं को यूनिवर्सिटी शिक्षा से रोकना शरीयत का विरोधाभासी कदम है. यह फैसला इस्लाम की उस अपील की खिलाफ है,जो महिलाओं और पुरुषों को कब्र से भी ज्ञान हासिल करने का हक देता है.
कतर ने तालिबान के इस फैसले पर गहरी चिंता जताई है. कतर ने कहा है कि इस तरह के नकारात्मक कदम का मानवाधिकार, विकास और अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था पर काफी बड़ा असर होगा.
कतर सरकार तालिबान से ये अपील करती है कि वह इस फ़ैसले पर पुनर्विचार करे और महिलाओं के अधिकारों के मामले में इस्लाम के सिद्धांतों के मुताबिक फैसले ले. सऊदी अरब ने तालिबान के फैसले पर अचरज जताया है.
सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि इस फैसले को तुरंत बदला जाना चाहिए. यह इस्लामी देशों के आश्चर्यजनक बात है. यह कदम अफगान महिलाओं के अधिकार के खिलाफ है.
संयुक्त राष्ट्र में संयुक्त अरब अमीरात की दूत लाना नुसाबेह ने कहा कि तालिबान ने लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के खि़लाफ़ जो फैसला किया है, उससे तालिबान के साथ काम करने के अंतरराष्ट्रीय समुदाय की कोशिशें खतरे में पड़ गई हैं.
महिलाओं के अधिकारों पर तालिबान कैसे पलटा?
पिछले लगभग डेढ़ साल पहले जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने जब दोबारा कब़्ज़ा किया था तो उसने कई वादे किए थे. तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने महिलाओं को काम करने और पढ़ने की इजाज़त देने का वादा भी किया था.
उन्होंने कहा था 'हम महिलाओं को काम करने और पढ़ने देने की इजाज़त देने जा रहे हैं. महिलाएं बेहद सक्रिय होने जा रही हैं लेकिन इस्लाम के दायरे के भीतर रह कर."
तालिबान की पिछली हुकूमत ने 1990 के दशक में महिलाओं की आज़ादी पर कई तरह की पाबंदियां लगाई थीं. लेकिन डेढ़ साल पहले तालिबान की सत्ता में वापसी हुई तो अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं पर कई प्रतिबंध फिर से लगा दिए गए.
मार्च के महीने में जब नए अकादमिक सत्र के लिए स्कूल फिर से खुले तो तालिबान प्रशासन अपने पिछले वादे से मुकर गया और हाई स्कूलों में लड़कियों के जाने पर रोक लगा दी गई.
इसके लिए तालिबान ने महिला शिक्षकों की कमी और स्कूलों में लड़के-लड़कियों के लिए अलग से इंतज़ाम करने की सुविधाओं की कमी का हवाला दिया.
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, तालिबान के इस फ़ैसले का असर 11 लाख बच्चों पर पड़ा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी व्यापक आलोचना हुई है.अफ़ग़ानिस्तान के प्राइमरी स्कूलों में लड़कियों को पढ़ने की इजाजत दी गई है.
तालिबान ने घर की चहारदीवारी के बाहर महिलाओं की गतिविधियों पर जिस तरह से रोक लगानी शुरू की है, उससे साल 2021 में देश में कामकाजी महिलाओं की संख्या 15 फ़ीसदी कम हो गई.
अब पिछले सप्ताह तालिबान ने ऐलान किया कि महिलाएं यूनिवर्सिटी नहीं जा सकतीं. वहां वे पुरुषों से खुल कर मिलती हैं और इस्लामी ड्रेस कोड का पालन नहीं करतीं. ये इस्लाम के सिद्धांतों के खि़लाफ़ है.
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