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दिल्ली में अफ़ग़ानिस्तान दूतावास को तालिबान आदेश क्यों नहीं देता
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले साल अगस्त में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति अशरफ़ गनी को सत्ता से हटाया और देश की बागडोर अपने हाथ में ले ली.
लेकिन तालिबान, दुनिया भर में अफ़ग़ानिस्तान के 70 के क़रीब दूतावासों और राजनयिक मिशनों में से अधिकांश पर अपना नियंत्रण करने में असफल रहा है.
दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाक़े में कई देशों के दूतावास हैं. यहीं पर मौजूद अफ़ग़ानिस्तान का दूतावास काबुल की मौजूदा तालिबान सरकार को रिपोर्ट नहीं करता.
भारत ने पिछले साल अगस्त में काबुल में सत्ता में आई तालिबान सरकार को अब तक मान्यता नहीं दी है. भारत अब भी दिल्ली स्थित अफ़ग़ान दूतावास को पुरानी अशरफ़ ग़नी सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर देखता है.
जब 1996 और 2001 के बीच तालिबान पहली बार अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता में आए थे तब भी भारत में अफ़ग़ान दूतावास हटाए गए राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी का प्रतिनिधित्व करता रहा. क्योंकि भारत ने रब्बानी की हटाई गई सरकार को मान्यता जारी रखी थी.
अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत
दिल्ली में अफ़ग़ानिस्तान के दूतावास में अब भी पूर्व राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की तस्वीर दिखाई देती है.
इमारत की पहली मंज़िल पर अफ़ग़ानिस्तान की पुरानी हुकूमत के राजदूत फ़रीद मामुंदज़ई के कार्यालय में काले, लाल और हरे रंग का झंडा फ़ख़्र के साथ लहरा रहा है.
मामुंदज़ई का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत भी तालिबान की हुकूमत से नहीं बल्कि पिछले रिपब्लिक के नुमाइंदे हैं.
वो कहते हैं कि इस्लामिक देशों के संगठन (OIC) के राजदूत और नेटो में अफ़ग़ान प्रतिनिधि की वफ़ादारी भी पुराने गणतंत्र के लिए है.
तालिबान के सिर्फ़ चार राजदूत
फ़रीद मामुंदज़ई कहते हैं कि तालिबान ने केवल चार देशों में अपने राजदूत भेजे हैं. ये देश हैं रूस, पाकिस्तान, चीन और तुर्कमेनिस्तान.
उनके मुताबिक़, अधिकतर देशों में अशरफ़ ग़नी सरकार के ज़माने से नियुक्त राजनयिक ही तैनात हैं. वो कहते हैं, "तालिबान के साथ हमारी बातचीत न के बराबर है."
22 जून को आधी रात के बाद आए भयंकर भूकंप से अफ़ग़ानिस्तान में भारी तबाही हुई है.
दक्षिण पूर्व अफ़ग़ानिस्तान में आए इस भूकंप में 1,000 से अधिक लोग मारे गए हैं.
तालिबान ने कहा था कि इस आपदा में कम से कम 1,500 लोगों के घायल होने का अनुमान है. रिक्टर पैमाने पर 6.1 की तीव्रता से आए इस भूकंप ने मिट्टी और पत्थर से बने घरों को मलबों में तब्दील कर दिया है.
सत्ता में वापस आने के बाद
इस भूकंप की वजह से चाणक्यपुरी में अफ़ग़ान दूतावास उदासी दिखी. कई अफ़ग़ान प्रवासी दूतावास के बाहर लॉन में थे. इनमें से कुछ अपनी काग़ज़ी कार्रवाई करने आए थे और बाक़ी अपने घर की हाल जानने के लिए बेताब थे.
सरकार तालिबान की, राजदूत पिछली हुकूमत के पिछले साल 15 अगस्त को सत्ता में वापस आने के बाद से किसी भी देश ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है.
भारत सहित अधिकांश देशों के तालिबान के साथ कोई औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं. राजदूत फ़रीद मामुंदज़ई के अनुसार, तालिबान के राज को उनके या दुनिया भर में स्थित अधिकतर अफ़ग़ान दूतावासों ने स्वीकार नहीं किया है.
ये सारे दूतावास पुराने रिपब्लिक के नियमों और नीतियों पर चल रहे हैं.
मामुंदज़ई कहते हैं, "हम अभी भी अशरफ़ ग़नी की पुरानी सरकार, अपने पूर्व लोकतंत्र के नुमाइंदे हैं. हम उनके सिद्धांतों का पालन कर रहे हैं. हम तालिबान हुकूमत से कोई आदेश नहीं ले रहे."
वीज़ा और अन्य कांसुलर कार्य
फ़रीद ममुंदज़ई का कहना है कि उनके दूतावास ने पिछली सरकार के नाम पर वीज़ा देना जारी रखा हुआ है. ग़ौरतलब है कि तालिबान की सरकार भी वीज़ा को स्वीकार कर रही है.
अफ़ग़ानिस्तान में आए भयावह भूकंप को कवर करने गए भारतीय पत्रकारों दिल्ली में अफ़ग़ान दूतावास ने ही वीज़ा दिया है.
दिल्ली स्थित दूतावास के अलावा हैदराबाद और मुंबई में वाणिज्य दूतावास के कर्मचारी भी, काबुल में सत्ता परिवर्तन की परवाह किए बग़ैर, अपना काम बददस्तूर जारी रखे हुए हैं.
नए पासपोर्ट जारी करने और पुराने पासपोर्ट का नवीनीकरण भी पिछली हुकूमत के नाम पर किया जा रहा है.
अफ़ग़ान राजदूत ने बीबीसी को बताया, "तालिबान के नेता भी पुराने रिपब्लिक के पासपोर्ट पर यात्रा करते हैं. दुनिया के लगभग सभी देश तालिबान के जारी किए गए पासपोर्ट और अन्य दस्तावेजों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं."
दिलचस्प बात ये है कि काबुल में विदेश मंत्रालय के दूतावास और कांसुलर डिविज़न अफ़ग़ान नागरिकों के विवाह और तलाक प्रमाण पत्र, जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने जैसे कांसुलर कार्य के लिए भी, नियमित रूप से संपर्क में हैं.
अफ़ग़ान दूतावास के अनुमान के मुताबिक लगभग एक लाख अफ़ग़ान नागरिक भारत में रहते हैं.
इनमें से लगभग 30 से 35 हज़ार शरणार्थी हैं और करीबन 15 हज़ार छात्र हैं. इन सभी लोगों को दूतावास और वाणिज्य दूतावासों से कांसुलर सहायता की आवश्यकता पड़ी रहती है.
राजदूत कहते हैं, "काबुल में विदेश मंत्रालय के साथ हमारा नियमित संपर्क है, जहां विदेश मंत्री तालिबान से हैं. हम हर रोज़ संपर्क में हैं."
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