अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान में 20 सालों में क्या हासिल हुआ?- प्रेस रिव्यू

अक्टूबर 2001 के बाद अफ़ग़ानिस्तान में अब कोई अमेरिकी सैनिक नहीं है.

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का बचाव करते हुए राष्ट्रपति जो बाइडन ने मंगलवार को कहा था कि फ़रवरी 2020 में ट्रंप प्रशासन ने तालिबान के साथ सैनिकों की वापसी को लेकर समझौता किया था.

इस समझौते के बाद उनके पास दो विकल्प थे- या तो इस समझौते को माना जाए या युद्ध जारी रखने के लिए और सैनिक भेजे जाएं.

बाइडन ने कहा था कि वो एक अंतहीन लड़ाई को जारी नहीं रखना चाहते थे और न ही वहाँ से निकलने की योजना को हमेशा आगे बढ़ाते रह सकते थे.

अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में अपना अभियान ख़त्म कर दिया लेकिन उससे हासिल क्या हुआ? अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने इसी पर एक न्यूज़ विश्लेषण छापा है कि अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में पिछले 20 सालों में क्या हासिल किया?

अख़बार ने अपने विश्लेषण में लिखा है, ''बाइडन ने मंगलवार को कहा था कि अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला इसलिए नहीं किया था कि वहाँ तालिबान का शासन था बल्कि इसलिए किया था कि 11 सितंबर का हमला अफ़ग़ानिस्तान से हुआ था.''

''जुलाई महीने की शुरुआत में बाइडन ने कहा था कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्र निर्माण के लिए नहीं गया था. अमेरिका का प्रारंभिक उद्देश्य अल-क़ायदा को नष्ट करना और ओसामा बिन-लादेन को पकड़ना या मारना था. बाइडन का तर्क यह था कि तालिबान अमेरिका का मुख्य दुश्मन नहीं था और उसे हराना भी कोई प्राथमिकता नहीं थी.''

अख़बार के विश्लेषण के अनुसार, ''यह सही है कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में 9/11 के हमले के कारण गया था. लेकिन बाइडन ने तालिबान को लेकर जो कुछ कहा है, ऐसा उनके पूर्ववर्ती नहीं सोचते थे. दिसंबर 2001 में तालिबान ने बिना किसी शर्त के आत्मसमर्पण का प्रस्ताव रखा था, लेकिन जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया था.''

''अमेरिका तालिबान शासन के नष्ट होने के बाद भी अफ़ग़ानिस्तान से नहीं गया. 2011 में ओसामा बिन-लादेन को मारने के बाद भी अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान नहीं छोड़ा. इस्लामिक गणतंत्र को बचाता रहा क्योंकि अमेरिकी नेताओं का मानना था कि तालिबान की वापसी से आतंकवाद के ख़िलाफ़ वैश्विक लड़ाई कमज़ोर पड़ेगी.''

द हिन्दू ने अपने विश्लेषण में लिखा है, ''इस पर अब भी विवाद है कि पिछले 20 सालों में तालिबान बदला है या नहीं. लेकिन अमेरिकी विदेश नीति इन 20 सालों में स्पष्ट रूप से बदली है. अगर अमेरिका देखता है कि जिस तालिबान ने अल-क़ायदा को अपने यहाँ रखा, उसे सत्ता से बेदख़ल करना आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में अहम उद्देश्य था, लेकिन 2021 में तालिबान की जीत के बाद अमेरिका ख़ुद वहाँ से निकल गया. बाइडन डॉक्ट्रिन के अनुसार तालिबान अब अफ़ग़ान नागरिकों के लिए समस्या हैं न कि अमेरिकी नागरिकों के लिए.''

आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई

अख़बार ने अपने विश्लेषण में लिखा है, ''अमेरिका ने जब अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया था तो बुश ने इसे आतंकवाद के ख़िलाफ़ वैश्विक लड़ाई कहा था. अब यह वैश्विक लड़ाई कहाँ गई? 2001 में अल-क़ायदा अफ़ग़ानिस्तान में इकट्ठा था. अमेरिकी हमले और तालिबान के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद अल-क़ायदा विकेंद्रित हुआ. आतंकवादी धड़ा भूमिगत संचालित हो रहा है लेकिन हारा या नष्ट नहीं हुआ है.''

''इन सालों में दुनिया भर के देशों में अल-क़ायदा के नए धड़े और संगठन बने. 2003 में इराक़ में अमेरिकी हमले के बाद अबु मुसाब अल-ज़रक़ावी के नेतृत्व में अल-क़ायदा यहाँ क़हर बनकर टूटा. 2006 में जॉर्डन में जन्मे इस आतंकवादी को 2006 की एयरस्ट्राइक में अमेरिका ने मार दिया, लेकिन अल-क़ायदा इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक़ बनकर सामने आया और बाद में यही इस्लामिक स्टेट बना. 2014 में इसने इराक़ और सीरिया में अपने इस्लामिक स्टेट की घोषणा कर दी.''

''आईएस के ठिकानों को अमेरिका, ईरान, इराक़, कुर्दिश, शिया मिलिशिया, सीरिया और रूस ने मिलकर ध्वस्त ज़रूर किया. लेकिन इराक़ और सीरिया में इस्लामिक स्टेट अब भी मज़बूत है. इस्लामिक स्टेट ने अलग-अलग इलाक़ों में अपना नया धड़ा बनाया- जैसे आईएस वेस्ट अफ़्रीका प्रोविंस और अफ़ग़ानिस्तान में आईएस ख़ोरासान (ISKP) प्रोविंस. ISKP ने ही 26 अगस्त को काबुल एयरपोर्ट पर हमले की ज़िम्मेदारी ली है.''

इस हमले में 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी. अल-क़ायदा की अफ़्रीका में भी मज़बूत मौजूदगी है. ख़ास करके साहेल इलाक़े में. हाल के वर्षों में इन इलाक़ों में अल-क़ायदा ने कई जानलेवा हमले किए हैं. 2001 में अल-क़ायदा अफ़ग़ानिस्तान तक सीमित था तो अब पूरी दुनिया में फैल चुका है.''

''द हिन्दू ने अपने विश्लेषण में लिखा है, ''अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में अल-क़ायदा के नेटवर्क को तोड़ने और ओसामा बिन-लादेन को मारने का श्रेय ले सकता है. लेकिन अमेरिका को अब भी इस सवाल का जबाव देना है कि क्या इसके लिए अफ़ग़ानिस्तान में 20 साल रहने, दो ट्रिलियन डॉलर खर्च करने और 2,300 सैनिकों की जान गँवाने की ज़रूरत थी?'' दो ट्रिलियन की रक़म भारत की पूरी अर्थव्यवस्था से कुछ ही कम है.

पीएम के साथ बैठक एक फ़्रेम में फ़ोटो खिंचवाने के लिए थी- महबूबा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से मुलाक़ात के दो महीने बाद पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा है कि उस बैठक का कोई असर नहीं हुआ है.

महबूबा ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा कि वह केवल एक फ़्रेम में फ़ोटो क्लिक करवाने के लिए बैठक बुलाई गई थी.

महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि उन्हें पीएम मोदी के साथ बैठक को लेकर बहुत उम्मीद भी नहीं थी. महबूबा ने कहा, ''मुझे लगा था कि कम से कम लोगों में भरोसा बढ़ाने के लिए कुछ तो करेंगे. जैसे- क़ैदियों को रिहा करना, जिनकी सेहत ठीक नहीं है, उन्हें शिफ़्ट करना और हर दिन नए फ़रमान जारी होने से रोकना. बिना किसी जाँच के लोगों को नौकरियों से निकाला जा रहा है. वेरिफ़िकेशन को लेकर परेशान किया जा रहा है और पासपोर्ट के लिए भी पापड़ बेलने पड़ रहे हैं. मुझे लगा था कि कम से कम इतना तो करेंगे कि लोग खुलकर साँस ले सकें.''

महबूबा ने कहा, ''अब तक कुछ भी नहीं हुआ है. कम से कम कुछ क़ैदियों को रिहा कर देते. गृह मंत्री ने एक रिव्यू कमिटी बनाने की बात कही थी ताकि क़ैदियों को लेकर कोई फ़ैसला हो सके. पर अब तक कुछ भी नहीं हुआ है. प्रधानमंत्री के साथ बैठक में जो बात हुई, उसे लेकर फिर कोई बात नहीं हुई. इसके बाद ही परिसीमन आयोग से नहीं मिलने का फ़ैसला किया था क्योंकि इसका कोई मतलब नहीं है. 370 हटाने के बाद इनका अगला एजेंडा परिसीमन है. परिसीमन के ज़रिए ये लोगों को और कमज़ोर करना चाहते हैं. इसलिए हमने इसका बहिष्कार किया.''

दिल्ली में एक सितंबर को रिकॉर्ड बारिश

दिल्ली में पिछले 19 सालों में सितबंर महीने में एक दिन में बुधवार को रिकॉर्ड बारिश हुई है. भारी बारिश से दिल्ली के कई इलाक़ों में जलजमाव हो गया है. पूरे शहर में ट्रैफ़िक की हालत बदतर है.

सफदरजंग दिल्ली के लिए बेस स्टेशन है और बुधवार सुबह 8.30 बजे तक 112.1 एमएम बारिश दर्ज की गई. इससे पहले 13 सितंबर, 2002 को 126.8 एमएम बारिश हुई थी. दिल्ली में मूसलाधार बारिश की ख़बर यहाँ से प्रकाशित होने वाले लगभग सभी अख़बारों में छपी है. दिल्ली में आज भी सुबह से ही बारिश हो रही है.

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