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इक़रा: तालिबान के खिलाफ कैसे विरोध का हथियार बन गया अल्लाह का ये शब्द
- Author, नूर गुल शफ़ाक़
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
''मुझे डर नहीं लगता क्योंकि मुझे पता है कि मेरी मांग जायज है.''
ये बयान है, 18 साल की उस हिम्मती अफ़गान महिला का जो यूनिवर्सिटी में पढ़ना चाहती है, लेकिन तालिबान ने महिलाओं के लिए यूनिवर्सिटी के दरवाज़े बंद कर दिए हैं और इस फ़ैसले से उनके सपने को झटका लगा है.
आदिला (बदला हुआ नाम) नाम की इस महिला को अपना भविष्य खत्म होता दिख रहा है. लिहाजा उनके अंदर गुस्सा है.
आदिला ने अपना गुस्सा काबुल यूनिवर्सिटी के सामने अकेले प्रदर्शन कर ज़ाहिर किया. उस दौरान उन्होंने कुरान में लिखे शब्द का इस्तेमाल किया.
रविवार, 25 दिसंबर को आदिला एक बोर्ड लेकर यूनिवर्सिटी के प्रवेश द्वार पर खड़ी हुईं. इस पर एक बड़ा ही दमदार शब्द लिखा था. ये अरबी शब्द था - 'इक़रा' यानी पढ़ो. अल्लाह ने पैग़ंबर को जो पहला शब्द कहा था वो इक़रा ही था.
बीबीसी अफ़गान सर्विस से बात करते हुए आदिला ने कहा, ''अल्लाह ने हमें शिक्षा का अधिकार दिया है. हमें अल्लाह से डरना चाहिए ना कि तालिबान से, जो हमारे हक छीन लेना चाहते हैं.''
''मुझे पता था कि वे विरोध करने वालों से बेहद बुरी तरह पेश आते हैं. उन्हें मारते-पीटते हैं. उनके ख़िलाफ़ हथियार का इस्तेमाल करते हैं. उन्होंने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ बिजली के करंट और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया है. फिर भी मैं उनके सामने खड़ी हूं.''
वे कहती हैं, ''शुरू में उन्होंने हमें गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन बाद में एक बंदूकधारी शख्स ने मुझसे वहां से जाने को कहा.''
छीन ली तख्ती
शुरू में आदिला ने वहां से जाने से इनकार कर दिया. वो वहीं खड़ी रहीं.
इसके बाद आदिला जिस तख्ती को लेकर वहां खड़ी थीं, उस पर लिखे शब्द ने हथियार लेकर खड़े गार्डों का ध्यान खींचना शुरू किया.
तख्ती हाथ में लिए वो तालिबान के सदस्य से बातचीत करने लगीं.
आदिला कहती हैं, ''मैंने उनसे पूछा, क्या इस पर जो लिखा है उसे तुम पढ़ नहीं पा रहे हो.''
''उसने कुछ नहीं कहा. इसके बाद भी उन्होंने कहा, क्या तुम अल्लाह के कहे शब्द भी नहीं पढ़ सकते.''
''इससे वो नाराज हो गया और उसने मुझे धमकी दी''
आदिला से उनकी तख्ती छीन ली गई. पंद्रह मिनट बाद उन्हें वहां से जाने पर मजबूर किया गया.
विरोध प्रदर्शन पर तालिबान की सख्ती
जिस वक़्त आदिला विरोध जता रही थीं उसी वक्त उनकी बड़ी बहन टैक्सी में बैठ कर इस घटना की तस्वीर खींच रही थीं और वीडियो बना रही थीं.
आदिला ने कहा, "टैक्सी ड्राइवर तालिबान से काफी डरे हुए थे. वो मेरी बहन से लगातार कह रहे थे कि वीडियो बनाना बंद कर दीजिए. तालिबान के डर से उन्होंने हमें गाड़ी से तुरंत उतरने को कहा."
पहले तालिबान ने लड़कियों को सेकेंडरी स्कूल जाने से रोक दिया. इसके बाद सितंबर में उन्होंने लड़कियों को कुछ खास विषय पढ़ने से रोक दिया. फिर कहा कि वो अपने प्रांत की यूनिवर्सिटी में ही जा सकती हैं.
और फिर 20 दिसंबर को उन्होंने महिलाओं के लिए यूनिवर्सिटी शिक्षा ही बंद कर दी. दुनिया भर में तालिबान के इस कदम की निंदा हो रही है. इसके कुछ दिन बाद तालिबान ने महिलाओं को स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों मे काम करने से रोक दिया.
महिलाएं खासकर यूनिवर्सिटी की छात्राएं इसका विरोध कर रही हैं. कुछ महिलाएं, ज़िंदगी और आज़ादी का नारा लगा रही हैं . ईरान में हिजाब का विरोध करने वाली महिलाएं भी ये नारा लगा रही हैं.
काबुल यूनिवर्सिटी में अभी सिर्फ चार महिला टीचर हैं. यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि अब इन टीचर्स को यूनिवर्सिटी कैंपस में आने नहीं दिया जा रहा है.
तालिबान के फ़ैसले का कैसे हो रहा है विरोध
आदिला जैसी महिलाओं के लिए तालिबान का विरोध आसान नहीं है. वे चाहती हैं कि पुरुष भी ऐसा साहस दिखाए, लेकिन उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
आदिला बताती हैं, "मेरे प्रदर्शन के दौरान एक युवक मेरा वीडियो बनाना चाह रहा था. लेकिन तालिबान ने उसे बुरी तरह मारा."
हाल में एक पुरुष प्रोफेसर ने अपना शैक्षणिक डिप्लोमा लाइव टीवी शो पर फाड़ दिया. उन्होंने अपने अंदाज में तालिबान की ओर से महिलाओं की शिक्षा बंद करने पर विरोध जताया.
सूत्रों ने बताया कि तालिबान के इस कदम के ख़िलाफ़ अब तक यूनिवर्सिटी के 50 से अधिक शिक्षकों ने इस्तीफा दे दिया है.
इस्तीफा दे चुके एक प्रोफेसर ने बताया कि तालिबान ने उनकी पिटाई की. इसके बाद उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया.
लेकिन आदिला का मानना है कि पुरुषों का इस संघर्ष में हिस्सा लेना बेहद जरूरी है.
वे कहती हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में बहुत कम पुरुष हमारे साथ खड़े हैं. जबकि ईरान में वहां के पुरुष महिलाओं के साथ खड़े हैं. वहां के लोग अपनी बहनों के साथ खड़े हैं और महिलाओं की आज़ादी के समर्थन में नारे लगा रहे हैं."
"अगर हम महिलाओं की शिक्षा के अधिकार के लिए मिल कर खड़े हों तो सौ फीसदी सफलता मिलेगी."
'रेंग कर चलूंगी लेकिन...'
महिलाओं को यूनिवर्सिटी शिक्षा से रोकने के फ़ैसले के बाद तालिबान पर बाहरी दबाव भी पड़ रहा है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने मंगलवार को कहा कि महिलाओं को शिक्षा से रोका जाना बताता है कि मानवाधिकार और बुनियादी आज़ादी के प्रति सम्मान में कमी आ रही है.
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद महिलाओं के अधिकारों में भारी कटौती हुई है, लेकिन तालिबान को अंतरराष्ट्रीय निंदा से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है.
'गार्ज़ियन' अख़बार में तालिबान के शिक्षा मंत्री के हवाले से कहा गया है कि अफ़ग़ानिस्तान में एटम बम गिरा दिया जाए तो भी सरकार अपना फैसला नहीं बदलेगी.
आदिला अपने विरोध पर डटी हुई हैं. वो कहती हैं, "अगर मैं उड़ नहीं पाई तो दौड़ूंगी, अगर दौड़ नहीं सकी तो छोटे-छोटे कदमों से चलूंगी. अगर मैं ये नहीं कर पाई तो रेंग कर चलूंगी. लेकिन मैं अपना संघर्ष, अपना प्रतिरोध नहीं छोड़ूंगी."
आदिला के दोस्त उनका समर्थन कर रहे हैं. उन्हें तारीफ़ मिल रही है.
वो कहती हैं कि महिलाएं अफगानिस्तान में अपनी पहले की पीढ़ियों की तुलना में इस जंग को जीतने के लिए अच्छी स्थिति में हैं.
वो कहती हैं, "हम 20 साल पहले के अंधकार युग में नहीं लौट सकते. हम उस दौर की महिलाओं की तुलना में ज़्यादा बहादुर हैं. क्योंकि हम ज्यादा शिक्षित हैं और अपने अधिकारों के बारे में उनसे ज्यादा समझती हैं."
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