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तालिबान के मंत्री ख़लील हक़्कानी की आत्मघाती हमले में मौत, अमेरिका ने रखा था 50 लाख डॉलर का इनाम
तालिबान सरकार के शरणार्थी मामलों के मंत्री ख़लील-उर-रहमान हक़्क़ानी की बुधवार को काबुल में मंत्रालय की इमारत पर हुए आत्मघाती हमले में मौत हो गई है.
इस हमले में अन्य लोगों के मारे जाने की भी ख़बर है लेकिन हताहतों की संख्या पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है.
तालिबान सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी पश्तो से हुई बातचीत में इसकी पुष्टि की है.
हक़्क़ानी की मौत की पुष्टि के बाद तालिबान सरकार के सूचना मंत्रालय के प्रवक्ता ने मीडिया से उनकी मौत के अलावा कुछ और नहीं कहा है.
अभी तक किसी भी समूह ने हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने हक़्क़ानी की मौत पर दुख जताया है.
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ताक़तवर हक़्क़ानी परिवार के सदस्य
ख़लील-उर-रहमान हक़्क़ानी तालिबान सरकार के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक़्क़ानी के चाचा और अफ़ग़ान तालिबान के हक़्क़ानी नेटवर्क के संस्थापक जलालुदीन हक़्क़ानी के भाई थे.
उन्हें हक़्क़ानी नेटवर्क की प्रमुख हस्तियों में से एक माना जाता था.
अगस्त 2021 में दोबारा तालिबान के सत्ता में आने के बाद से इस समूह पर ये तीसरा बड़ा हमला है.
मार्च 2023 में बल्ख़ प्रांत के गवर्नर मोहम्मद दाऊद वफ़ा मुज़ामिल पर हमला हुआ था. उस हमले में मोहम्मद दाऊद समेत तीन लोग मारे गए थे.
कथित इस्लामिक स्टेट आतंकवादी समूह ने उस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी.
इससे पहले अक्टूबर 2022 में काबुल में तालिबान के गृह मंत्रालय परिसर में एक मस्जिद में हुए विस्फोट में चार लोगों की मौत हो गई थी और 20 घायल हो गए थे.
कौन थे ख़लील-उर-हक़्क़ानी?
ख़लील-उर-रहमान हक़्क़ानी का जन्म साल 1966 में अफ़ग़ानिस्तान के पक्तिया प्रांत के गार्द-ए-रावा ज़िले के कांडू गांव में हुआ था.
वह अफ़ग़ानिस्तान के शक्तिशाली गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक़्क़ानी के चाचा थे और तालिबान की हक़्क़ानी शाखा की प्रमुख हस्तियों में से एक थे.
ख़लील, हक़्क़ानी नेटवर्क के संस्थापक जलालुद्दीन हक़्क़ानी के भाई थे जो 1980 के दशक में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ मुजाहिदीन के शीर्ष कमांडरों में से एक थे.
खलील-उर-रहमान ने स्वयं सोवियत संघ के विरुद्ध चले युद्ध में हिस्सा लिया था.
अगस्त 2021 में तालिबान सरकार की स्थापना की शुरुआत में ही उन्हें शरणार्थियों और बाहर के मुल्कों से वतन लौटने वाले अफ़ग़ानिस्तान के लोगों का ज़िम्मा सौंपा गया था.
इस दौरान कई तालिबान मंत्रियों के विभाग बदले गए लेकिन ख़लील-उर-रहमान हक़्क़ानी अपनी मौत तक शरणार्थी मामलों के मंत्री ही रहे.
बीते दो सालों में पाकिस्तान और ईरान ने अफ़ग़ानिस्तान के शरणार्थियों को वापस अपने मुल्क भेजने का अभियान चलाया है. तभी से वो वतन लौटने वालों के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद जुटाने का प्रयास कर रहे थे.
50 लाख डॉलर का इनाम
अमेरिका ने ख़लील हक़्क़ानी के बारे में जानकारी देने पर 50 लाख डॉलर (क़रीब 42.4 करोड़ रुपए) का इनाम तय किया था.
हक़्क़ानी नेटवर्क अमेरिका में 'विदेशी आतंकवादी संगठन' के रूप में सूचीबद्ध है.
अमेरिकी सरकार की रिवॉर्ड्स फॉर जस्टिस वेबसाइट में कहा गया है कि ख़लील-उर-रहमान हक़्क़ानी "2010 से अफ़ग़ानिस्तान के लोगर प्रांत में तालिबान का नेतृत्व कर रहा है."
2001 में एक इंटरव्यू में हक़्क़ानी ने कहा था कि अमेरिका ने उनके घर पर बमबारी की थी, जिसमें कई लोग मारे गए थे, लेकिन वह काबुल से भागने में सफल रहे थे.
उस इंटरव्यू में ख़लील हक़्क़ानी ने बताया था उन्हें अमेरिका और पाकिस्तान के एक संयुक्त ऑपरेशन में गिरफ़्तार किया गया था.
उन्होंने कहा, "मुझे एक साल तक एक कमरे में बंद रखा गया. मेरे हाथ-पैर बंधे रहते थे और आंखें पर पट्टी रहती थी."
ख़लील-उर-रहमान हक़्क़ानी को चार साल की क़ैद के बाद 350 पाकिस्तानी सैनिकों के बदले में रिहा किया गया था. क़ैदियों की ये अदला-बदली वज़रिस्तान में हुई थी.
ख़लील-उर-हक़्क़ानी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के लीडर बैतुल्लाह महसूद ने उन्हें जेल से निकालने के लिए ये सारा ऑपरेशन किया था.
उस साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, "हमें वो लोग 48 घंटों में वाना ले गए. हमें एक दूसरे से बात न करने की सख़्त हिदायत थी. जब हम वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने हमारी आँखों से पट्टी हटाई. फिर हमें एक पुल पर ले जाया गया. वहाँ हम 32 लोगों को सैनिकों की रिहाई के बदले छोड़ दिया गया."
साल 2021 में काबुल में तालिबान सरकार के सत्ता में आने तक, हक़्क़ानी नेटवर्क अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान के सरहदी इलाक़ों में सक्रिय था.
जब अमेरिकी सेना अफ़ग़ानिस्तान से हटी तो ख़लील हक़्क़ानी काबुल में प्रवेश करने वाले बड़े तालिबान लीडरों में से एक थे.
हक़्क़ानी नेटवर्क
ख़लील हक़्क़ानी अफ़ग़ानिस्तान के सियासी रसूख़ रखने वाले परिवार से आते थे.
उनके बड़े भाई जलालुद्दीन हक़्क़ानी ने अपना एक ताक़तवर हथियारबंद गुट बनाया था जो बाद में तालिबान का हिस्सा बना लेकिन इस समूह की अलग पहचान कायम रही.
अफ़ग़ानिस्तान का पाक्तिया प्रांत अपनी ख़ूबसूरती से ज़्यादा दुनिया के मोस्ट वॉन्टेड चरमपंथियों में शुमार रहे जलालुद्दीन हक़्क़ानी की वजह से पहचाना जाता रहा .
जदरान क़बीले से संबंध रखने वाले जलालुद्दीन हक़्क़ानी एक समय अमरीका और उसके सहयोगी देशों के लिए हीरो थे, मगर बाद में विलेन बन गए.
1979 में जब सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया, तब हक्क़ानी एक ऐसे मुजाहिदीन के तौर पर उभरे जिन्होंने सोवियत सेनाओं की नाक में दम कर दिया.
अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए उस दौर में पाकिस्तानी सेना के जरिए जलालुद्दीन हक़्क़ानी और उनके जैसे मुजाहिदीनों को आर्थिक और सामरिक मदद दे रही थी.
आईएसआई की मदद से हक़्क़ानी नेटवर्क अफ़ग़ानिस्तान में अनुभवी और दक्ष लड़ाकों का एक समूह बन गया था.
मगर 1990 के दशक की शुरुआत में जब सोवियत संघ का विघटन और अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का उदय हुआ, अमेरिका और उसके सहयोगियों ने हक़्क़ानी से दूरी बना ली.
अफ़ग़ानिस्तान में जब एक तरफ़ तालिबान था और दूसरी तरफ अल-क़ायदा, तब भी हक़्क़ानी नेटवर्क का अपना अलग अस्तित्व रहा. यहां तक कि वह तालिबान की सरकार में मंत्री भी रहे मगर अपने संगठन को अलग बनाए रखा.
हाल के दिनों में हक़्क़ानी नेटवर्क और तालिबान के बीच संबंधों में तनाव की ख़बरें भी आई हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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