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अफ़ग़ानिस्तान से भागी 'बालिका वधू' यूरोप में कैसे बन गई बॉडीबिल्डिंग चैंपियन
- Author, महजूबा नौरोज़ी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ , अफ़ग़ान
मंच पर खड़ी महिला चमचमाते क्रिस्टल-जड़ी बिकिनी में दमक रही है.
उसकी सुनहरी, धूप में निखरी त्वचा पर उभरी हुई हर मांसपेशी की रेखा यह बता रही है कि उसने जिम में घंटों मेहनत की है.
रोया करीमी का बख़ूबी किया गया मेकअप और सुनहरे रंग में रंगे बाल ऐसे लगते हैं जैसे वह मिस यूनिवर्स फ़ाइनल में हिस्सा लेने आई हों.
यह कल्पना करना मुश्किल है कि सिर्फ़ 15 साल पहले वो अफ़ग़ानिस्तान में एक किशोर उम्र की मां थीं, जिन्हें बाल विवाह करना पड़ा था. लेकिन उन्होंने वहां से भागकर अपनी ज़िंदगी को फिर से गढ़ा.
अब 30 वर्ष की उम्र में, वह यूरोप की टॉप बॉडीबिल्डर्स में से एक हैं. अब वो इस हफ़्ते वर्ल्ड बॉडीबिल्डिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेने जा रही हैं.
उनका सफ़र कल्पना से परे है. उन्होंने एक पेशेवर खिलाड़ी के तौर पर बॉडीबिल्डिंग स्पोर्ट्स को दो साल पहले शुरू किया था.
लेकिन जब उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान से अपनी मां और छोटे बेटे के साथ भागकर नॉर्वे में शरण ली थी तब ऐसा सोचना मुश्किल था.
नॉर्वे में उन्होंने अपनी नई ज़िंदगी शुरू की. उन्होंने यहां अपनी पढ़ाई जारी रखी और नर्स बनीं. यहीं वो अपने दूसरे पति से मिलीं जो खुद भी बॉडीबिल्डर हैं.
रोया कहती हैं कि बॉडीबिल्डिंग ने उन्हें मानसिक और सामाजिक बंधनों से मुक्त किया. वो बंधन जो सालों तक उन पर थोपे गए थे.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ अफ़ग़ान को बताया, "जब भी मैं जिम जाती हूं, मुझे याद आता है कि अफ़ग़ानिस्तान में एक समय ऐसा था जब मुझे खुलकर एक्सरसाइज़ करने की इजाज़त नहीं थी.
रोया की ज़िंदगी की कहानी परंपराओं की बंदिशों के ख़िलाफ़ संघर्ष करने और अपनी पहचान दोबारा गढ़ने की है.
उनकी कहानी अपने देश की उन महिलाओं को प्रेरित करने की है, जो आज भी कड़े प्रतिबंधों में जी रही हैं.
इनमें से कुछ पाबंदियां तब भी थीं जब रोया अफ़ग़ानिस्तान में रहती थीं.
लेकिन 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद हालात और भी बदतर हो गए.
अब अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के 12 साल की उम्र के बाद स्कूल जाने पर रोक है.
ज़्यादातर नौकरियों से उन्हें वंचित रखा गया है और वो बिना किसी पुरुष संरक्षक के लंबी यात्रा नहीं कर सकतीं.
उन्हें सार्वजनिक रूप से ऊंची आवाज़ में बोलने की अनुमति नहीं है.
रोया कहती हैं, "मैं खुशकिस्मत हूं कि उस माहौल से निकल पाई, लेकिन बहुत-सी महिलाएं आज भी शिक्षा जैसे अपने बुनियादी इंसानी हक़ से वंचित हैं. यह बहुत दुखद और दिल तोड़ने वाला है."
एक नए भविष्य की तलाश
तालिबान के दोबारा सत्ता में आने से कई साल पहले ही रोया ने तय कर लिया था कि वह ऐसी ज़िंदगी नहीं चाहतीं.
2011 में अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने और अपने पहले पति को पीछे छोड़ आने का उनका फै़सला बहुत जोखिम भरा था.
ख़ासकर एक पारंपरिक अफ़ग़ान समाज में रहने वाली महिला के लिए.
उस दौर की बातें वो अब याद नहीं करना चाहतीं और न ही इस पर बोलना पसंद करती हैं.
नॉर्वे पहुंचने के बाद उन्हें एक बिल्कुल अलग माहौल में खुद को ढालना पड़ा. एक ज़्यादा आधुनिक समाज से उन्हें तालमेल बिठाना था.
उन्हें खुद और अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए नौकरी करनी थी. साथ ही नॉर्वे की भाषा भी सीखनी थी.
शुरुआती दिन बेहद मुश्किल थे. लेकिन धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई.
रोया ने नर्सिंग की पढ़ाई की और राजधानी ओस्लो के एक अस्पताल में काम करने लगीं.
बॉडीबिल्डिंग से ज़िंदगी में नया मोड़
जिम जाना और बॉडीबिल्डिंग करना उनके जीवन का अगला मोड़ साबित हुआ.
ये सिर्फ़ शारीरिक कसरत नहीं थी बल्कि खुद पर विश्वास और अपनी पहचान दोबारा बनाने का ज़रिया बन गया.
यहीं उनकी मुलाकात एक और अफ़ग़ान, कमाल जलालुद्दीन से हुई. वो खुद लंबे समय से बॉडीबिल्डिंग से जुड़े थे और आज रोया के सबसे बड़े समर्थकों में से एक हैं.
रोया बताती हैं, "कमाल से मिलने से पहले मैं एक स्पोर्ट के तौर पर बॉडीबिल्डिंग करती थी लेकिन प्रोफ़ेशनल तौर पर नहीं. उनके सहयोग ने मुझे हिम्मत दी कि मैं महिलाओं के लिए वर्जित समझे जाने वाले रास्ते को चुनूं. मेरा मानना है कि अगर एक पुरुष किसी महिला का साथ दे तो बहुत बड़ी चीज़ें भी करना मुमकिन हो सकता है.''
धमकियां और आलोचनाएं
करीब 18 महीने पहले, रोया ने नर्स की नौकरी छोड़ दी और पेशेवर तौर पर बॉडीबिल्डिंग में उतर आईं.
यह एक जोख़िम भरा फैसला था. लेकिन उनके लिए असली चुनौती नौकरी बदलना नहीं, बल्कि उन आज़ादियों को अपनाना था जिनसे वह अफ़ग़ानिस्तान में वंचित रही थीं.
रोया कहती हैं, "हमारी सबसे बड़ी चुनौती उन सीमाओं और नियमों को तोड़ना था जो दूसरों ने हमारे लिए बना दिए थे. परंपरा, संस्कृति, धर्म या किसी और नाम पर. लेकिन अगर आप कुछ नया करना चाहते हैं तो पहले आपको उन सीमाओं से बाहर निकलना होता है.''
लेकिन रोया को इस सफ़र में मुश्किलें भी कम नहीं आईं.
स्टेज पर उनका बिकिनी पहना हुआ रूप, खुले बाल और मेकअप अफ़ग़ान समाज के मानकों और आज के सरकारी प्रतिबंधों से बिल्कुल उलट हैं.
इसलिए यह हैरानी की बात नहीं कि सोशल मीडिया पर उन्हें आलोचनाओं, गालियों और यहां तक कि जान से मारने की धमकियों का सामना करना पड़ा.
लेकिन वो इन आलोचनाओं को ख़ारिज कर देती हैं.
वो कहती हैं "लोग सिर्फ़ मेरा बाहरी रूप देखते हैं- मेरा बिकिनी लुक. मेरी सालों की पीड़ा, मेहनत और धैर्य को नहीं देखते. ये सफलताएं आसानी से नहीं मिली हैं."
फिर भी सोशल मीडिया के प्रति रोया का रवैया नकारात्मक नहीं है. यह उनके लिए अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं तक अपनी आवाज़ पहुंचाने का माध्यम है. जहां वह शारीरिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और खुद को बनाने की अहमियत पर बात करती हैं.
इतिहास रचने की तैयारी
अब रोया वर्ल्ड बॉडीबिल्डिंग चैंपियनशिप की तैयारी कर रही हैं, जो इस हफ़्ते बार्सिलोना में शुरू हो रही है.
वह इस साल की अपनी पहले की सफलताओं को आगे बढ़ाना चाहती हैं.
अप्रैल में उन्होंने स्टोपेरिएट ओपन बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिता में वेलनेस कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीता था. इस कैटेगरी में मांसपेशियों के बजाय स्वाभाविक फिटनेस, हेल्दी लुक और सादगी भरे सौंदर्य को प्राथमिकता दी जाती है.
इसके तुरंत बाद उन्होंने नॉर्वे क्लासिक 2025 में जीत हासिल की. इसमें पूरे स्कैंडिनेविया के एथलीटों का जमावड़ा होता है.
इसके बाद उन्होंने यूरोपियन चैंपियनशिप में हिस्सा लिया. और फिर वहीं से वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए क्वालिफाई किया.
रोया कहती हैं, "मुझे बेहद खुशी और गर्व महसूस हो रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे मेरा सम्मान बढ़ा है. यह साल काफ़ी मुश्किल रहा लेकिन मैंने एक-एक कदम आगे बढ़ते हुए गोल्ड मेडल जीते."
बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिताओं में दर्शकों के बीच बैठे उनके पति और बेटा हमेशा उनका उत्साह बढ़ाते हैं.
रोया के पति कमाल कहते हैं, "रोया को स्टेज पर देखना हमारे उस सपने का पूरा होना था, जिसे हमने साथ मिलकर बुना था.''
लेकिन रोया के लिए यह प्रतियोगिता सिर्फ़ खुद के लिए नहीं है.
वो कहती हैं, "मैं मानसिक रूप से बहुत मजबूत महसूस कर रही हूं और अपनी पूरी ताक़त झोंकने को तैयार हूं. ताकि अफ़ग़ान लड़कियों और महिलाओं के नाम पर इतिहास रच सकूं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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