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अफ़ग़ानिस्तान से लगी अपनी सीमा के कारण परेशान हैं कई पड़ोसी देश
अफ़ग़ानिस्तान के कई पड़ोसी देश अपनी सीमा पर बाड़ या दूसरे तरह के अवरोधक लगाकर उसे सुरक्षित बना रहे हैं या बनाने पर विचार कर रहे हैं.
इसका उद्देश्य असुरक्षा की भावना को फैलने से रोकना और अफ़ग़ान प्रवासियों के आने पर पाबंदी लगाना है.
पड़ोसी देशों में होने वाले हमलों में बढ़ोतरी, अफ़ग़ानिस्तान से सक्रिय हज़ारों विदेशी जिहादियों को तालिबान से मिलने वाले समर्थन या उनके प्रति उसकी निष्क्रियता और प्रवासियों की आमद में बढ़ोतरी ने इस इलाक़े में चिंताओं को बढ़ा दिया है. इस वजह से इस इलाक़े में 'सुरक्षा बेल्ट' बनाने की मांग तेज हो रही है.
अफ़ग़ानिस्तान से पश्चिमी देशों की सेनाओं की हुई चरणबद्ध वापसी के साथ ही इलाक़े में आशंकाएं धीरे-धीरे बढ़ने लगी थीं. वहीं अगस्त 2021 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता संभालने के बाद तनाव और बढ़ गया है.
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने अभी हाल में ही 23 पेज की एक रिपोर्ट जारी की थी. इसमें अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान शासकों और अल क़ायदा के बीच घनिष्ठ संबंधों के बारे में बताया गया है.
इसमें अनाम सदस्य देशों ने अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथी समूहों के प्रसार के बारे में आगाह किया है. इन देशों का कहना है कि इससे इलाक़े में अस्थिरता बढ़ रही है.
तालिबान की पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ईरान के साथ सीमा पर झड़पें होती रहती हैं. वहीं ताजिकिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंध ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है.
प्रवासन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम) के मुताबिक 2021 और 2022 के बीच क़रीब 36 लाख अफ़ग़ान अपने देश छोड़ चुके हैं. इनमें से अधिकांश प्रवासियों ने ईरान और पाकिस्तान में शरण ली.
अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी देशों के साथ उसके संबंध इस तरह से हैं.
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता
पिछले कुछ सालों में ईरान ने अफ़ग़ानिस्तान से लगती सीमा पर अवरोधक लगाने की बात कई बार की है. इसका मक़सद प्रवासियों की आमद को नियंत्रित करना, ड्रग तस्करी पर रोक लगाना और सुरक्षा चिंताओं का समाधान करना है.
'हमशारी' ऑनलाइन न्यूज़ पर 16 को आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ईरान की ग्राउंड आर्मी के कमांडर ने उत्तर-पूर्व में अफ़ग़ानिस्तान से लगती 74 किमी लंबी सीमा को बंद करने पर ज़ोर दिया. उन्होंने इसे सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता बताया.
ईरान अफ़ग़ानिस्तान के साथ लगती अपनी 921 किलोमीटर लंबी सीमा के इस खंड पर बाड़ लगाने का काम कर रहा है. यहाँ कुछ और अवरोधक भी लगाए जाएंगे.
ईरान का कहना है कि उसने क़रीब 50 लाख अफ़ग़ान प्रवासियों को शरण दी है. इनमें से अधिकांश शरणार्थी तालिबान की सत्ता में वापस आने के बाद से आए हैं. वहीं कुछ ईरानी मीडिया सूत्रों का अनुमान है कि यह संख्या 80 लाख तक हो सकती है.
अब्दुल्ला मोबिनी ईरान के राष्ट्रीय प्रवासन प्राधिकरण के प्रमुख हैं. उन्होंने 20 फरवरी को कहा था कि ईरान ने पिछले 11 महीनों में क़रीब दस लाख प्रवासियों को निर्वासित किया है.
प्रवासियों के मुद्दों के अलावा ईरान इस्लामिक स्टेट (आईएस) जैसे जिहादी समूहों से बढ़ते ख़तरों का भी सामना कर रहा है. आईएस ने तीन जनवरी को करमान शहर में हुए दो बड़े बम विस्फोटों की ज़िम्मेदारी ली थी. इन हमलों में क़रीब 95 लोगों की मौत हो गई थी.
इसके अलावा, ईरान अफ़ग़ानिस्तान में पैदा होने वाली ड्रग को यूरोप के कई देशों तक पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण रास्ते का भी काम करता है.
ईरान और तालिबान के घनिष्ठ संबंधों के बाद भी दोनों देशों में वैचारिक मतभेदों की वजह से गहरे संदेह हैं. ईरान पर शिया मौलवियों का शासन है तो अफ़ग़ान तालिबान इस्लाम की सुन्नी शाखा को मानने वाला है.
टीटीपी से परेशान पाकिस्तान
पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान के साथ लगती अपनी 2,640 किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ लगाने का काम क़रीब पूरा कर लिया है. यह परियोजना 2017 में शुरू हुई थी.
पाकिस्तान लगातार यह दावा करता रहा है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) सीमा पार हमले के लिए अफ़ग़ानिस्तान में अपने ठिकानों का इस्तेमाल करता है.
अफ़ग़ान तालिबान के सत्ता में वापस आने के बाद पाकिस्तान में चरमपंथी हमलों में काफ़ी बढ़ोतरी देखी गई है. पाकिस्तान का कहना है कि टीटीपी के क़रीब छह हज़ार लड़ाके अफ़ग़ानिस्तान में छिपे हुए हैं.
अफ़ग़ान तालिबान के साथ जारी तनाव के बीच पाकिस्तान ने सितंबर 2023 में 11 लाख अफ़ग़ान शरणार्थियों को निर्वासित करने के संबंध में एक महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला किया.
साल 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ के हमले के बाद से लाखों शरणार्थियों ने पाकिस्तान में शरण ली है. पाकिस्तान इन शरणार्थियों को अब सुरक्षा के लिए ख़तरा बताता है. कई विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की यह हताशा टीटीपी के खिलाफ अफगान तालिबान की कथित निष्क्रियता ती वजह से पैदा हुई है.
पाकिस्तान ने तीन महीने में पांच लाख 40 हजार से अधिक अफ़ग़ान प्रवासियों को निष्कासित कर दिया है. बाक़ी बचे शरणार्थियों को निर्वासित करने के लिए मार्च 2024 तक का समय दिया गया है.
ताजिकिस्तान की शंघाई सहयोग संगठन से अपील
ताजिकिस्तान ने असुरक्षा और ड्रग्स की तस्करी का मुक़ाबला करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान से लगती सीमा पर एक 'सुरक्षा बेल्ट' बनाने की अपील की है. उसकी अफ़ग़ानिस्तान के साथ 1,350 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है.
ताजिकिस्तान ने मई 2023 में शंघाई सहयोग संगठन से औपचारिक तौर पर अफ़ग़ानिस्तान के चारों ओर एक सुरक्षा बेल्ट बनाने में सहयोग मांगा था.
ताजिकिस्तान ने सितंबर 2023 में बताया था कि उसकी सेना ने चरमपंथी संगठन अंसारुल्लाह के तीन सदस्यों को मार गिराया है.
उसका कहना था कि इन लोगों ने अफगानिस्तान से उसके यहां घुसपैठ की थी. अंसारुल्लाह को अल क़ायदा का सहयोगी संगठन माना जाता है. इसके अधिकतर सदस्य ताजिकिस्तान के निवासी हैं. ऐसा माना जाता है कि उत्तरी अफगानिस्तान में उसके सैकड़ों लड़ाके हैं.
ताजिकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान से लगती सीमा पर हजारों रूसी सैनिक मौजूद हैं. इसके बाद भी ताजिकिस्तान ने सीमा पर अतिरिक्त सैनिकों और सैन्य चौकियों के साथ अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी है.
ईरान के रास्ते तुर्की आते हैं अफ़ग़ान प्रवासी
ईरान के साथ लगती तुर्की की 170 किलोमीटर लंबी सीमा पर बन रही सुरक्षा दीवार के एक बड़े हिस्से का काम आंशिक तौर पर पूरा हो गया है.
यह दीवार अफगान प्रवासियों और ड्रग तस्करी को रोकने के लिए पूर्वी तुर्की में बना जा रही है. अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद से हजारों अफगान ईरान के रास्ते तुर्की में दाखिल हो गए हैं.
तुर्की में क़रीब तीन लाख अफ़ग़ान प्रवासी रहते हैं. इनमें से क़रीब 57 हजार को 2022 में निर्वासित कर दिया था. इसके बाद से तुर्की में कितने अफ़ग़ान प्रवासी आए या कितने को निर्वासित किया गया, इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.
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