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भारत में अफ़ग़ानिस्तान के दूतावास बंद होने से कितने मुश्किल में हैं भारत में रह रहे अफ़ग़ान
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में अफ़ग़ानिस्तान के दिल्ली स्थित दूतावास ने काम करना बंद कर दिया है.
शनिवार, 30 सितंबर की देर रात दूतावास ने बयान जारी कर कहा कि वह एक अक्टूबर, 2023 से काम नहीं करेगा.
दूतावास बंद करने के कई वजहें बताई गईं, जिसमें भारत सरकार से समर्थन न मिलना अहम था.
कामकाज क्यों बंद हुआ? इससे दोनों देशों के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा? इस पर बीते चार दिनों में काफ़ी बात हो चुकी है.
लेकिन भारत में शरणार्थियों की तरह रह रहे हज़ारों अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों की आवाज़ अब भी सुनाई नहीं दे रही है.
ये वो लोग हैं, जिनके लिए पराए मुल्क में दूतावास का होना किसी घर से कम नहीं था, क्योंकि इन्हें हर ज़रूरी काम के लिए दूतावास जाना पड़ता था.
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी(यूएनएचसीआर) के मुताबिक़ भारत में 15 हज़ार से ज़्यादा अफ़ग़ान शरणार्थी रह रहे हैं.
इसके अलावा क़रीब 20 हज़ार ऐसे अफ़ग़ान नागरिक हैं, जो रिफ्यूजी कार्ड पाने के लिए सालों से यूएनएचआरसी के चक्कर काट रहे हैं.
दूतावास के बंद होने के बाद भारत में किन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, यह जानने के लिए हमने अफ़ग़ानिस्तान के लोगों से बात की.
'अकेले जीना मुश्किल भरा है'
अजर कोधनी, दो साल पहले तक अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में रह रहे थे, लेकिन तालिबान के आने से कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपना वतन और परिवार दोनों छोड़ दिया.
25 साल के अजर, फ़िलहाल दिल्ली में एक किराए का कमरा लेकर रहते हैं और पेशे से एक सिंगर हैं और म्यूजिक एकेडमी के साथ जुड़े हुए हैं.
अजर कहते हैं, “क़रीब दो साल पहले मैं तीन महीने के मेडिकल वीज़ा पर भारत आया था. वीज़ा ख़त्म होते ही मैंने रिफ्यूजी कार्ड बनवाने के लिए संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) में रजिस्टर कर दिया, ताकि भारत में मुझे शरण मिल सके. फ़िलहाल मुझे रिफ्यूजी कार्ड नहीं मिला है.”
वे कहते हैं, “भारत में पढ़ाई या फिर कोई भी नौकरी करने के लिए एबेंसी से पेपर की ज़रूरत पड़ती है, क्योंकि हमारे पास आधार कार्ड नहीं है. बिना किसी डॉक्युमेंट की किराए का कमरा लेने में भी दिक्क़त आती है."
"अब मुझे आगे कॉलेज में एडमिशन लेना है, अगर हमारा दूतावास नहीं होगा, तो मैं डॉक्युमेंट कैसे लाऊंगा. ऐसे में अकेले जीना मुश्किल भरा है.”
अफ़ग़ानिस्तान दूतावास अपने नागरिकों को एक तरह का वेरिफिकेशन डॉक्युमेंट बना कर देता है, जो कहीं काम या एडमिशन लेने के लिए एक सिक्यॉरिटी का काम करता है.
बच्चों की पढ़ाई पर असर
अफ़ग़ानिस्तान में काबुल के रहने वाले नजीबुल्लाह सात साल पहले अपने पूरे परिवार के साथ भारत आए थे. उनके परिवार में कुल सात लोग हैं.
दूतावास की अहमियत पर बात करते हुए नजीबुल्लाह कहते हैं, “तीन साल पहले मेरा पासपोर्ट एक्सपायर हो गया था. मैंने 125 अमेरिकी डॉलर की फीस भरी और अगले पांच साल के लिए मुझे मेरा पासपोर्ट सिर्फ़ दस दिन में मिल गया.”
वे कहते हैं, “इसके बाद मेरे परिवार वालों का पासपोर्ट एक्सपायर हो गया. दूतावास ने फीस लेकर तीन साल के लिए उनके पासपोर्ट की मियाद बढ़ा दी. अब दूतावास बंद होने के बाद हम अपना पासपोर्ट रिन्यू कैसे करवाएंगे?”
पराए देश में किसी व्यक्ति के लिए पासपोर्ट उसकी सबसे बड़ी पहचान होती है. हर काम के लिए उसे पासपोर्ट का सहारा लेना पड़ता है.
लेकिन नजीबुल्लाह की सबसे बड़ी चिंता, उनके बच्चों का स्कूल बंद होना है. वे कहते हैं, “मेरे दो बच्चे जंगपुरा के जमालुद्दीन अफ़ग़ान हाई स्कूल में पढ़ते थे, जो पिछले दो महीने से बंद पड़ा है."
नजीबुल्लाह कहते हैं, “कुछ महीने पहले भारत सरकार ने पैसे देने बंद कर दिए, जिसके बाद यह स्कूल बंद हो गया और अब मेरे बच्चे घर पर बैठे हैं. मेरे पास इतने रुपये नहीं है कि मैं बच्चों का एडमिशन प्राइवेट स्कूल में करवा पाऊं.”
परिवार का कहना है कि स्कूल के साथ-साथ बच्चों के पास ज़रूरी दस्तावेज़ भी नहीं हैं कि वे कहीं और पढ़ सकें, क्योंकि ये काग़ज भी दूतावास ही बना कर देता है. अब अगर दूतावास ही नहीं काम करेगा, तो हमारे बच्चे कहाँ जाएंगे.
पासपोर्ट रिन्यू करवाने को लेकर दिल्ली में रहने वाली लामिया शेरजाई भी डरी हुई हैं. पाँच साल पहले भारत आई लामिया कहती हैं, “एक साल बाद मेरे पासपोर्ट की वैलिडिटी ख़त्म हो जाएगी.
दूतावास के बंद होने के बाद हम कैसे पासपोर्ट को अपडेट करवा पाएंगे. अगर तालिबान समर्थित लोग होंगे, तो वे कभी हमारे पासपोर्ट को अपडेट नहीं करेंगे और ऐसे में हम रिफ्यूजी कार्ड भी नहीं बनवा पाएंगे.”
दूतावास बंद होने से कामकाज़ ठप
15 साल पहले अहमद हैदर हदीस को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना पड़ा. वे पेशे से म्यूजिशियन हैं और ड्रम बजाने का काम करते हैं.
वे कहते हैं, “अफ़ग़ानिस्तान म्यूजिक के लिए हमें दूतावास में बुलाया जाता था, लेकिन तालिबान आने के बाद यह काम ख़त्म हो गया है, क्योंकि वे म्यूजिक को हराम मानते हैं.”
"हमें उम्मीद थी कि दूतावास में हमें फिर से काम मिलेगा, लेकिन अब ये उम्मीद भी ख़त्म हो गई है.”
भारत के साथ अफगानिस्तान के पुराने संबंधों को याद करते हुए वे कहते हैं कि एक समय था जब भारत ने हमें दवा, खाना और बस तक की सुविधा दी थी और आज वह हमारे दूतावास को चलने में मदद नहीं कर रहा है.
तलाक़ से लेकर मौत तक
दूतावास की ज़रूरत सिर्फ़ पासपोर्ट को रिन्यू करने के लिए नहीं पड़ती है. यह उससे कई ज़्यादा बढ़कर है.
काबुल के रहने वाले अब्दुल्लाह सालेह, साल 2007 में अपने परिवार के साथ भारत आए थे और इस वक़्त दिल्ली के लाजपत नगर में रह रहे हैं.
दूतावास बंद होने से आने वाली मुश्किलों की बात करते हुए वे कहते हैं, “अगर हम लोगों को तलाक़ लेना होता है, तो कोर्ट की बजाय अपने देश के दूतावास जाते हैं."
अफ़ग़ानिस्तान के हज़ारों नागरिक ऐसे हैं, जो तालिबान के सत्ता में आने के कई साल पहले भारत आए थे और आज रिफ्यूजी कार्ड लेकर रह रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि एक दिन यूएनएचआरसी उन्हें कनाडा या अमेरिका जैसे किसी देश में शरण दिलवा पाएगा.
भले अफ़ग़ानिस्तान के हज़ारों लोग शरणार्थी बनकर भारत में रह रहे हों, या फिर यूरोप के किसी देश में जाना चाहते हों, लेकिन अपना वतन, अपनी मिट्टी को आज भी याद कर इन लोगों की आंखों में आंसू आ जाते हैं.
अब्दुल्लाह सालेह कहते हैं, “अगर अफ़ग़ानिस्तान के किसी नागरिक की भारत में मौत हो जाए तो दूतावास के लेटर के बिना उनकी मृत शरीर को काबुल नहीं भेजा जा सकता. ये बहुत बड़ी दिक्क़त है."
"हमारे बुज़ुर्ग अक्सर ये बात कहते हैं कि मरने के बाद हमें अफ़ग़ानिस्तान में दफ़्न करना. अगर दूतावास ही नहीं होगा, तो कैसे ये संभव हो पाएगा.”
'दूतावास उम्मीद की तरह'
अफ़ग़ानिस्तान की पीपल्स पार्टी और पॉलिटिकल एक्टिविस्ट निसार अहमद शेरजाई पिछले आठ सालों से अपने परिवार के साथ भारत में रह रहे हैं.
तालिबान के मुखर विरोधी शेरजाई भारत में शरणार्थियों के लिए कई सालों से काम भी कर रहे हैं. उन्होंने पिछले दो सालों में तालिबान के ख़िलाफ़ कई प्रदर्शन आयोजित किए हैं.
शेरजाई कहते हैं, “तालिबान के डर की वजह से हम लोग भागकर भारत आए. हम रिफ्यूजी बनकर रह रहे हैं. हम सालों से तालिबान का विरोध कर रहे हैं. सोचिए अगर कल को मेरा वीज़ा में कोई दिक्क़त आ जाती है, तो मैं कहाँ जाऊंगा. अगर तालिबान का कोई आदमी दिल्ली दूतावास में आ गया, तो हम कैसे वहां जा पाएंगे. दूतावास हमारे लिए उम्मीद की तरह है.”
वे कहते हैं, “मैं अकेला नहीं हूँ. मेरे जैसे क़रीब 25 हज़ार लोग भारत में हैं. पासपोर्ट, वीज़ा और दूसरे कामों के अलावा भारतीय जेलों में अफ़ग़ानिस्तान के नागरिक भी हैं. उनकी देखभाल, पूछताछ के लिए भी हम दूतावास जाते हैं. चुनी हुई सरकार के राजदूत का भारत में न रहना, हमारे लिए एक नहीं बल्कि सौ मुश्किलें लेकर आएगा.”
शेरजई कहते हैं कि तालिबान के झंडे तले दुनिया भर में लोगों का क़त्ल किया गया, वो झंडा कैसे कहीं भी फहराया जा सकता है. भारत का फ़र्ज़ बनता है कि वो तालिबान से हटकर चुनी हुई सरकार के लोगों की मदद करे.
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