पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच बढ़ते 'अविश्वास' की क्या वजह है?

    • Author, अज़ीज़ुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, पेशावर

पाकिस्तान व अफ़ग़ानिस्तान के बीच आजकल के बयानों से पता चलता है कि दोनों में तनाव बढ़ गया है और इसकी एक बड़ी वजह ग़ैर क़ानूनी घोषित संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वा और बलूचिस्तान में बढ़ते हमले हैं.

पाकिस्तान का कहना है कि अफ़ग़ान तालिबान किसी सशस्त्र संगठन को अपनी धरती का पाकिस्तान या किसी भी दूसरे देश के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने की इजाज़त न दें जबकि अफ़ग़ान तालिबान का कहना है कि पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा है वह पाकिस्तान की अपनी आंतरिक समस्या है

पाकिस्तान में हिंसा की बढ़ती घटनाओं के बाद कुछ दिनों पहले कोर कमांडर कॉन्फ़्रेंस में इस बारे में विचार किया गया और इसके बाद प्रधानमंत्री के नेतृत्व में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक में भी अन्य मामलों के साथ-साथ देश में सुरक्षा की स्थिति पर भी महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं.

इस बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया कि पाकिस्तान किसी भी देश को अपनी धरती किसी गिरोह द्वारा आतंकवादियों की शरणस्थली के तौर पर इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देगा.

यह भी कहा गया कि पाकिस्तान अपनी जनता की सुरक्षा का अधिकार रखता है. इसके अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक में आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने के संकल्प को दोहराया गया है.

इस बारे में एक जनवरी को केंद्रीय गृह मंत्री राना सनाउल्लाह ने भी एक बयान में कहा था कि अगर अफ़ग़ान तालिबान अफ़ग़ानिस्तान के अंदर टीटीपी के विरुद्ध कार्रवाई नहीं करते तो फिर अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार अगर कहीं से पाकिस्तान के विरुद्ध किसी क्षेत्र का इस्तेमाल हो रहा है तो पाकिस्तान वहां कार्रवाई का अधिकार रखता है.

पाकिस्तान की ओर से दिए गए इस बयान को अफ़ग़ानिस्तान में भड़काऊ बताया गया था. इस बारे में अफ़ग़ानिस्तान के रक्षा मंत्रालय की ओर से बयान जारी किया गया था कि अफ़ग़ानिस्तान अपनी धरती की रक्षा करना जानता है.

हालांकि इसी बीच इस्लामी अमारत के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद का कहना है, "अमारत-ए-इस्लामिया-अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान समेत अपने सभी पड़ोसियों के साथ अच्छे पड़ोसी के तौर पर बेहतर संबंध चाहता है और उन सभी संसाधनों और स्रोतों पर विश्वास रखता है जो इस लक्ष्य तक हमें पहुंचा सकते हैं."

अविश्वास से तनाव तक

विशेषज्ञों और विश्लेषकों का कहना है कि दोनों देशों के बीच हालात तनावपूर्ण हैं और दोनों देशों के बीच संबंध ने एक नया रूप ले लिया है.

वरिष्ठ अफ़ग़ान पत्रकार और विश्लेषक समी यूसुफ़ ज़ई का कहना है, "हालांकि पाकिस्तान को इस समय अपनी ही नीतियों की प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि अफ़ग़ान तालिबान के पास कोई औपचारिक संगठित सेना नहीं है."

"उन्होंने ताक़त के ज़रिए सत्ता पर क़ब्ज़ा किया है और पाकिस्तान को इन सभी परिस्थितियों को अलग दृष्टि से देखने की ज़रूरत है. इस परिदृश्य में पाकिस्तान को उनसे बात करनी होगी.'

उनका कहना था, "अफ़ग़ान तालिबान अपने देश के अंदर अपने लोगों पर दया नहीं करते, जहां महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है, अपने लोगों को मारा जाता है तो ऐसे में उनका रवैया पड़ोसी देशों के साथ कैसा होगा?"

पेशावर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर बाबर शाह ने बीबीसी को बताया कि अफ़ग़ान तालिबान ने जब सत्ता संभाली तो वहां कोई काम नहीं कर पाए हैं जिसकी वजह से उनके लिए समस्याएं पैदा हुईं और अब भी उनकी कोशिश यह है कि किसी तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी ओर ध्यान दिया जाए.

उनका कहना है, "अफ़ग़ान तालिबान को दुनिया में मान्यता नहीं दी गई और उनकी मुश्किलें बढ़ती गईं जबकि अतीत के उलट इस बार पाकिस्तान ने भी उन्हें मान्यता नहीं दी जिस वजह से अफ़ग़ान तालिबान को भी निराशा हुई है."

पाकिस्तान का संविधान इजाज़त नहीं देता

रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और विश्लेषक ब्रिगेडियर रिटायर्ड महमूद शाह का कहना है कि पाकिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान से बात करनी चाहिए थी और उनसे कहना चाहिए कि वह टीटीपी की अफ़ग़ानिस्तान की शरणस्थलियों को ख़त्म करें और उन सभी तत्वों को पाकिस्तान के हवाले कर दे.

उनका विचार है कि पाकिस्तान को टीटीपी के साथ बातचीत करने की ज़रूरत ही नहीं थी और न ही पाकिस्तान का संविधान इसकी अनुमति देता है कि सरकार आपराधिक गिरोह के साथ बात करे.

प्रत्यक्ष रूप में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच भारी तनाव का कारण अवैध घोषित संगठन तहरीक-ए-तालिबान के बढ़ते हुए हमले हैं.

पहले भी जब अफ़ग़ानिस्तान में हामिद करज़ई और फिर अशरफ़ ग़नी की सरकार थी तो उन दिनों में भी पाकिस्तान की ओर से बार-बार यही कहा जाता रहा कि पाकिस्तान में हमलों के लिए अफ़ग़ानिस्तान की धरती इस्तेमाल हो रही है और यह कि हमलावर अफ़ग़ानिस्तान से आकर पाकिस्तान में हमले करते हैं.

पाकिस्तान में सरकार ने आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमला और दूसरे बड़े हमलों के बारे में भी यही कहा था कि हमलावर अफ़ग़ानिस्तान से आए थे. इसके विपरीत अफ़ग़ानिस्तान का कहना था कि हमलावर पाकिस्तान के अंदर ही मौजूद हैं.

अब स्थिति बदल गई है

समी यूसुफ़ ज़ई का कहना है कि पिछले 40 साल से दोनों देशों के बीच जो सिलसिला जारी था अब इस समय स्थिति उससे बिल्कुल अलग हो गई है.

अफ़ग़ानिस्तान पर जब रूस ने हमला किया था तो उसके बाद से पाकिस्तान से लोग जाकर अफ़ग़ानिस्तान में लड़ते रहे और उनके अनुसार यह सिलसिला उसके बाद भी जारी रहा.

अफ़ग़ानिस्तान लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान से लोग आकर अफ़ग़ानिस्तान में कार्रवाइयां करते हैं लेकिन पाकिस्तान इससे इनकार करता रहा है. उनका कहना था कि अब स्थिति बिल्कुल उल्टी हो गई है.

बाबर शाह कहते हैं कि पाकिस्तान पिछले एक साल से आंतरिक तौर पर दुर्भाग्यवश राजनीतिक अस्थिरता का शिकार है जिसके कारण देश की नीति विशेष तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित होती है.

उनका कहना था कि यह कहा जा सकता है कि तालिबान के साथ संबंध वैसे नहीं थे जैसे होने चाहिए और जब हालात ख़राब हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में ऐसी शक्तियां भी सक्रिय हो जाती हैं जो देश के अंदर हालात ख़राब करना चाहती हैं.

अफ़ग़ान तालिबान के वादे

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के लिए अफ़ग़ान तालिबान के साथ अमेरिका ने दोहा में बातचीत शुरू की थी जिसमें दूसरी शर्तों के साथ एक शर्त यह भी थी कि अफ़ग़ानिस्तान में किसी भी संगठन या व्यक्ति को अफ़ग़ानिस्तान की धरती को किसी भी देश के विरुद्ध आतंकवाद या हिंसा के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

इसमें यह भी कहा गया था कि अफ़ग़ान तालिबान अलक़ायदा और दूसरे आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध कार्रवाइयां करेंगे ताकि उनका पूरी तरह सफ़ाया किया जा सके.

पिछले साल अगस्त में अफ़ग़ान तालिबान ताक़त के बल बूते पर सत्ता में आए और सरकार का नियंत्रण संभाला. अफ़ग़ान तालिबान के इस तरह काबुल पहुंचने पर पाकिस्तान पर आरोप भी लगाए जाते रहे कि तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त था.

इसके बावजूद अफ़ग़ान तालिबान के सत्ता में आने के बाद भी पाक- अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर हालात तनावपूर्ण रहे और विभिन्न स्थानों पर सीमा पर बाड़ को उखाड़ दिया गया था और इसके अलावा अलग अलग समय पर सीमा पार से पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में हमले भी किए जाते रहे.

अफ़ग़ान तालिबान ने इस दौरान पाकिस्तान और ग़ैर क़ानूनी संगठन टीटीपी के बीच समझौते की कोशिशें कीं और वार्ता का सिलसिला शुरू हुआ.

इन वार्ताओं के लिए अफ़ग़ान तालिबान मध्यस्थ की भूमिका अदा करते रहे और इससे कुछ समय के लिए युद्ध विराम भी हुआ लेकिन इसकी समाप्ति के बाद पाकिस्तान में हालात एक बार फिर तनावपूर्ण हुए हैं.

हमले और कार्रवाइयां

हालांकि पिछले एक साल में कुछ महीने तो टीटीपी की ओर से युद्ध विराम रहा है लेकिन इसके बावजूद इस संगठन ने दावा किया है कि एक साल में 369 हमले किए गए हैं जिनमें पुलिस और सुरक्षाबलों का भारी नुकसान हुआ है.

टीटीपी की ओर से जारी इन मौतों की संख्या के दावे की कहीं औपचारिक रूप से पुष्टि नहीं हो सकी लेकिन यह बात स्पष्ट है कि 2021 की तुलना में 2022 में अतिवादियों के हमलों में इज़ाफ़ा हुआ है.

रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने एक निजी टीवी चैनल के साथ बातचीत में कहा था कि इस साल अधिकतर हमलों में लगभग 58 प्रतिशत हमले ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में हुए हैं और दूसरे नंबर पर बलूचिस्तान में हमले हुए हैं.

दूसरी और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में पुलिस का कहना था कि एक साल में अतिवादियों के सफ़ाए के लिए विभिन्न जगहों पर कार्रवाइयां की गईं जिनमें 800 से अधिक चरमपंथियों को गिरफ़्तार किया गया जबकि 196 मारे गए हैं.

हल क्या है?

यहां कई सवाल उठाए जा रहे हैं कि पाकिस्तान इस परिस्थिति से निपटने के लिए क्या कर सकता है.

इससे पहले यानी 2014 में ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़ब और इससे पहले जो ऑपरेशन किए गए उस समय चरमपंथी कुछ सीमित क़बायली क्षेत्रों में मौजूद थे जहां से उनका सफ़ाया करने के दावे किए गए थे और यह कहा गया था कि अधिकतर पाकिस्तान से फ़रार हो गए हैं.

अब सरकारी स्तर पर यह रिपोर्ट सामने आई है कि चरमपंथी सरकार के साथ वार्ता के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में फैल गए हैं और अपने ठिकाने बना लिए हैं.

यह बात उस समय सामने आई है जब स्वात के क्षेत्र मट्टा में चरमपंथियों ने एक डीएसपी को घायल कर दिया था और दूसरे को बंधक बना लिया था. इसके बाद स्वात में जनता की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई थी और चरमपंथियों को क्षेत्र से निकाल दिया गया था.

अब ऐसी जानकारी मिली है कि चरमपंथी राज्य के दक्षिणी क्षेत्रों के अलावा विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद हैं. ऐसे में सुरक्षा बलों के लिए कार्रवाई करना मुश्किल हो गया है.

पिछले दिनों राष्ट्रीय असेंबली के डिप्टी स्पीकर और ज़िला बन्नूं से जमीयत-ए-उलेमा-ए-इस्लाम के नेता ज़ाहिद अकरम दुर्रानी ने कहा कि ऐसी कोई स्थिति नहीं है जिससे लगे कि बन्नूं में कोई ऑपरेशन हो रहा है.

बाबर शाह ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान सबसे ज़्यादा पाकिस्तान पर निर्भर रहता है हालांकि पाकिस्तान ने अफ़ग़ान तालिबान की सरकार को मान्यता नहीं दी है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान को समर्थन दिया जा रहा है.

ऐसे में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक भी हुई और अगर सरकार पाकिस्तान अफ़ग़ान तालिबान पर यह बात साफ़ तौर पर स्पष्ट कर दे कि "यह रेडलाइन है और इसके अतिक्रमण की अनुमति नहीं होगी तो ऐसे में शायद वह समझ जाएंगे."

समी यूसुफ़ ज़ई का कहना था कि पाकिस्तान तालिबान के साथ ऐसी नीति अपनानी होगी जिससे स्थिति सुधारी जा सके और अफ़ग़ान तालिबान को एक औपचारिक संगठित सेना नहीं बल्कि एक ससस्त्र शक्तिशाली समूह के तौर पर देखना होगा क्योंकि "अब इस समूह को पाकिस्तान के अंदर टीटीपी के रूप में प्लेटफ़ॉर्म भी मिला हुआ है."

इधर अमारत-ए-इस्लामिया के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने कहा, "हम इस उद्देश्य के लिए पूरी तरह गंभीर हैं, पाकिस्तानी पक्ष की भी ज़िम्मेदारी बनती है कि हालात को क़ाबू में रखने की कोशिश करे.

बेबुनियाद बातों और भड़काऊ विचार व्यक्त करने से बचे, क्योंकि ऐसी बातें और अविश्वास का माहौल किसी पक्ष के हित में नहीं."

उनका कहना था कि अमारत-ए-इस्लामिया जिस तरह अपने देश के अंदर शांति और स्थिरता को महत्व देती है उसी तरह पूरे क्षेत्र के लिए अमन व स्थिरता चाहती है और इस सिलसिले में अपनी कोशिश जारी रखेगी."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)