पाकिस्तान के लिए गले की फाँस क्यों बन गई है तालिबान सरकार को मान्यता

    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की अंतरिम सरकार तो बन गई है, लेकिन अब भी उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती है, अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करना.

तालिबान की सरकार मान्यता पाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है, लेकिन पाकिस्तान ने भी तालिबान सरकार को मान्यता दिलाने के लिए पूरा ज़ोर लगाया हुआ है.

यहाँ तक कि पाकिस्तान ने अमेरिका को अपनी भावनाओं पर संयम रखने की सलाह भी दे डाली है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने सोमवार को एक इंटरव्यू में कहा कि अमेरिका को अपनी भावनाओं पर संयम रखना होगा. अमेरिकी अभी सदमे में हैं. अगर ऐसा नहीं हुआ तो अफ़ग़ानिस्तान का पतन हो जाएगा. अगर ऐसा न हुआ तो अफ़ग़ानिस्तान चरमपंथियों का गढ़ बन जाएगा.

इमरान ख़ान ने कहा कि जब तक अमेरिका नेतृत्व नहीं करता, तब तक हमें अफ़ग़ानिस्तान में अराजकता फैलने की चिंता रहेगी और इससे सबसे ज़्यादा हम प्रभावित होंगे. तालिबान के भीतर के कट्टरपंथी तत्वों को रोकने के लिए भी उसका समर्थन करना ज़रूरी है.

पाकिस्तान अलग-अलग मंचों से इस बात को उठाता रहा है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान भी पाकिस्तान ने तालिबान को मान्यता देने पर ज़ोर दिया था. इमरान ख़ान तालिबान में अस्थिर सरकार से पूरी दुनिया के प्रभावित होने की बात कहते रहे हैं.

तालिबान सरकार को मान्यता दिलाने के लिए पाकिस्तान की कोशिश स्पष्ट रूप से नज़र आ रही है. इमरान ख़ान पूरी दुनिया को अस्थिर अफ़ग़ानिस्तान के कारण पैदा होने वाले ख़तरे आगाह कर रहे हैं.

लेकिन, अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का क़ब्ज़ा होने और अंतरिम सरकार बनने के बाद भी पाकिस्तान के लिए तालिबान सरकार को मान्यता दिलाना अहम क्यों हो गया है? इसमें हो रही देरी पाकिस्तान के लिए क्या मायने रखती है?

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मानते हैं कि तालिबान की सरकार बनने के बाद पाकिस्तान की उम्मीदों के मुताबिक स्थितियाँ नहीं बन पाई हैं, जिससे उसके ख़ुद के लिए कई चुनौतियाँ पैदा हो गई हैं.

उम्मीद के मुताबिक़ नतीजे नहीं

लंदन के 'किंग्स कॉलेज' में विदेश मामलों के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं कि पाकिस्तान की मदद से तालिबान सरकार बन तो गई है, लेकिन उसके बाद के नतीजे मन मुताबिक़ नहीं हैं. एक तरफ़ तालिबान अंतरराष्ट्रीय समुदाय की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा है, तो दूसरी तरफ़ पाकिस्तान की अपील भी ख़ाली जा रही हैं.

वह कहते हैं, "अमेरिकी फ़ौजों के जाने के बाद से अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार चलाने में जैसी मुश्किलें आ रही हैं, मानवीय और आर्थिक संकट पैद हो गया है उससे लगता है कि पाकिस्तान इन नतीजों को लेकर बहुत स्पष्ट नहीं था. शायद उसे ये उम्मीद थी कि चीन और रूस मान्यता दे देंगे लेकिन अब वो भी ख़ामोश हैं."

कहीं से भी तालिबान को मान्यता ना मिलने से पाकिस्तान की अंदरूनी परेशानियाँ बढ़ रही हैं.

अफ़ग़ानिस्तान को आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक से मिलने वाली मदद भी रुकी हुई है. जब तक अमेरिका मान्यता नहीं देता, तब तक ना मदद का रास्ता खुल सकता है और ना पश्चिमी देशों के समर्थन का.

लेकिन, अफ़ग़ानिस्तान में आर्थिक हालात ख़राब होने से पाकिस्तान में शरणार्थियों की समस्या बढ़ सकती है, जिसे लेकर वो पहले भी चिंता ज़ाहिर कर चुका है.

पाकिस्तान की चिंता ये भी है कि अफ़ग़ानिस्तान में अस्थिरता और कट्टरता बढ़ने से पाकिस्तान तहरीके तालिबान के हाथ मज़बूत हो सकते हैं.

प्रोफ़ेसर हर्ष पंत बताते हैं, "अब ये लगने लगा है कि जब तक अमेरिका मान्यता नहीं देगा, तब तक कुछ नहीं होने वाला. इसलिए सारी कोशिश अमेरिका पर दबाव बनाने की है. पाकिस्तान विदेश मीडिया में और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार तालिबान का मसला उठा रहा है."

अंदर से बढ़ता दबाव

भले ही चीन और रूस तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दे रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान पर मान्यता देने का दबाव बढ़ रहा है. ये आवाज़ उठ रही है कि दूसरे देशों की तरफ़ देखने की बजाए पाकिस्तान ख़ुद आगे क़दम बढ़ाए.

पाकिस्तान की इस्लामिक राजनीतिक पार्टी जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख फ़ज़लुर रहमान ने मांग की है कि पाकिस्तान को तालिबान सरकार को मान्यता देनी चाहिए.

रहमान पाकिस्तान के प्रमुख मौलानाओं में से एक हैं और विपक्षी दलों के सबसे बड़े गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक फ़्रंट के प्रमुख भी हैं.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसरसंजय के भारद्वाज के मुताबिक़ अगर तालिबान सरकार को मान्यता मिल जाती, तो पाकिस्तान के लिए स्थितियाँ बहुत अनुकूल हो सकती थीं. इससे तालिबान सरकार में उनकी अहमियत बढ़ती, पाकिस्तान में ये उपलब्धि कहलाती और अमेरिका और चीन के लिए वो तालिबान से संपर्क का माध्यम बनकर अहम बने रहते. लेकिन, समस्या ये है कि फ़िलहाल ऐसा कुछ भी होता नहीं दिख रहा, बल्कि पाकिस्तान सरकार अपने देश में भी दबाव झेल रही है.

तालिबान में साख

विशेषज्ञ मानते हैं कि तालिबान में अपना प्रभाव और साख बनाए रखने के लिए भी पाकिस्तान को तालिबान सरकार को मान्यता दिलाना ज़रूरी है.

प्रोफ़ेसर संजय के भारद्वाज के मुताबिक़, "अगर तालिबान सरकार को मान्यता नहीं मिलती तो पाकिस्तान की तालिबान में जो साख बनी हुई है, उसे धक्का लगेगा. यह भी सवाल उठेगा कि तालिबान सरकार को पाकिस्तान की क्यों सुननी चाहिए. फिर तालिबान अपने तरीक़े से स्थितियाँ संभालेगा, जिससे 1996 वाले हालात बन सकते हैं."

"मुश्किल ये है कि पाकिस्तान बार-बार समावेशी सरकार और मानवाधिकार की बात कर रहा है लेकिन तालिबान सुनने को तैयार नहीं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मांग के अनुरूप तालिबान में कोई बदलाव नहीं दिखता. ऐसे में पाकिस्तान दोनों तरफ़ से मुश्किल में है. वो ना तो तालिबान को बदलने के लिए तैयार कर पा रहा है और ना ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तालिबान के पक्ष में मोड़ पा रहा है."

अमेरिका और चीन से रिश्ते

पाकिस्तान के रिश्ते अमेरिका से भले ही तनावपूर्ण बने हुए हैं, लेकिन अमेरिका का सहयोग भी उसके लिए ज़रूरी है. साथ ही वो चीन से भी अपने मधुर संबंध बनाए रखना चाहता है.

इस समय पाकिस्तान की आर्थिक तौर पर, लॉजिस्टिक और परमाणु कार्यक्रम के लिए चीन पर बहुत निर्भरता बनी हुई है.

जानकारों के मुताबिक़ पाकिस्तान में चीन के भी अपने हित हैं. वो पाकिस्तान के ज़रिए भारत के साथ संतुलन बनाने, तालिबान के साथ संपर्क बढ़ाने और अमेरिका का एशिया में प्रभाव कम करने की कोशिश में है.

संजय के भारद्वाज का कहना है, "अगर पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान पर प्रभाव खो देता है, तो अफ़ग़ानिस्तान में चीन के लिए उसकी अहमियत कम हो सकती है. वहीं, अमेरिका भी उससे छिटक सकता है क्योंकि वो पहले ही पाकिस्तान से अपने रिश्तों को तालिबान तक सीमित होने की बात कह चुका है. पाकिस्तान को अमेरिका, तालिबान और चीन इन तीनों को एक साथ साधना है जो मान्यता मिले बिना संभव नहीं दिखता."

पाकिस्तान क्यों नहीं देता मान्यता

अब सवाल ये भी उठ रहे हैं कि पाकिस्तान क्यों तालिबान सरकार को मान्यता देने से हिचक रहा है.

1996 में पिछली तालिबान सरकार को मान्यता देने वाले देशों में पाकिस्तान आगे रहा है. आज भी वो मान्यता की पैरवी कर रहा है लेकिन अभी तक पाकिस्तान ने ख़ुद आगे होकर तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है.

जानकारों की मानें, तो पाकिस्तान मान्यता देने की शुरुआत करके कोई जोख़िम नहीं लेना चाहता. अगर तालिबान सरकार में कट्टरता हावी रहती है तो पाकिस्तान को इसके लिए आलोचना झेलनी पड़ सकती है.

एक वजह पाकिस्तान के आर्थिक हालात भी हैं. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुज़र रही है और वह इस समय फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की ग्रे लिस्ट में बना हुआ है. उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगे हैं.

ऐसे में तालिबान सरकार का समर्थन पाकिस्तान की छवि को और ख़राब कर सकता है.

प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज कहते हैं, "अब 1996 से हालात बहुत बदल चुके हैं. पहले दुनिया को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि अफ़ग़ानिस्तान में क्या हो रहा है. अब पूरी दुनिया मानवाधिकारों की बात कर रही है. तब तहरीक-ए-तालिबान नहीं था और पाकिस्तान में उतना आतंकवाद नहीं था. तालिबान को पहले मान्यता देने वाले सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी चुप्पी साधे हुए हैं. पाकिस्तान अकेले इतना बड़ा क़दम नहीं उठा सकता."

प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत इसके पीछे एक और कारण मानते हैं. वह कहते हैं कि पाकिस्तान और अन्य सहयोगी देश अगर मान्यता दे देंगे, तो उनके पास कोई भी बढ़त नहीं रहेगी. अभी अगर तालिबान से कोई ठोस प्रतिबद्धता करानी है, तो उसके लिए मान्यता पाने की उसकी ज़रूरत का इस्तेमाल किया जा सकता है.

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