You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
तालिबान को मान्यता देने से क्यों हिचकते हैं चीन, रूस और पाकिस्तान
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"अगर उन्होंने सभी गुटों को शामिल नहीं किया, तो आज नहीं तो कल वहाँ गृह युद्ध होगा. इसका मतलब एक अस्थिर और अराजक अफ़ग़ानिस्तान." - इमरान ख़ान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री
"चीन उम्मीद करता है कि अफ़ग़ानिस्तान के सभी पक्ष वहाँ के लोगों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की उम्मीदों के मुताबिक फ़ैसले करेंगे. एक खुला और सबको साथ लेकर चलने वाला राजनीतिक ढाँचा तैयार करेंगे." - चीनी विदेश मंत्रालय
"सबसे महत्वपूर्ण ये सुनिश्चित करना है कि जो वादे उन्होंने सार्वजनिक रूप से किए हैं, उन्हें पूरा किया जाए और हमारे लिए यह सर्वोच्च प्राथमिकता है.''- सर्गेई लवरोफ़, रूस के विदेश मंत्री
ये बयान उन तीन देशों के हैं जिनकी अफ़ग़ान-तालिबान शांति वार्ता, तालिबान की अंतरिम सरकार के गठन और तालिबान के समर्थन में अहम भूमिका रही है.
लेकिन, तालिबान को खुले समर्थन और दुनिया को नए तालिबान का भरोसा दिलाने के बावजूद इन तीनों देशों ने तालिबान को मान्यता नहीं दी है.
पाकिस्तान, चीन और रूस तालिबान सरकार को मान्यता देने के सवाल पर समावेशी सरकार के निर्माण, अंतरराष्ट्रीय समुदायों की उम्मीदें, आतंकी संगठनों से दूरी और शासन में उदारता की बात करते हैं.
तीनों देशों के अफ़ग़ानिस्तान में अपने हित भी है. पाकिस्तान इस मौके को भारत के साथ प्रतिद्वंद्विता के संदर्भ में देखता है. पिछली सरकार का भारत की तरफ़ झुकाव था लेकिन तालिबान सरकार के पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध हैं.
चीन और रूस दोनों ही अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी दबदबे से खुश नहीं थे. उनकी कोशिश थी कि अमेरिका यहां से जाए और फिर उससे जो खाली जगह बने उसमें उनका दबदबा हो. चीन की नज़र अफ़ग़ानिस्तान के संसाधनों पर भी है.
वहीं, रूस चाहता है कि मध्य एशियाई देशों में किसी तरह की इस्लामिक कट्टरता ना आए और यहां अमेरिका का दबदबा कम हो जाए जिससे रूस के लिए मौके बनें.
फिर भी तीनों देश तालिबान सरकार को मान्यता देने से क्यों हिचक रहे हैं. तालिबान के साथ अपने संबंधों को वो किस तरह आगे बढ़ाना चाहते हैं.
मान्यता से दबाव ख़त्म
जानकारों का कहना है कि मान्यता देना एक ऐसा मसला है जिससे अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है. चीन, रूस और पाकिस्तान इसे गंवाना नहीं चाहते और ना ही कोई ख़तरा मोल लेना चाहते हैं.
लंदन के 'किंग्स कॉलेज' में विदेश मामलों के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर हर्ष वी पंत कहते हैं, "तीनों ही देश अगर मान्यता दे देंगे तो उनके पास कोई भी बढ़त नहीं रहेगी. अभी अगर तालिबान से कोई ठोस प्रतिबद्धता करानी है तो उसके लिए मान्यता पाने की उसकी ज़रूरत का इस्तेमाल किया जा सकता है."
"लेकिन, अगर एक बार मान्यता दे दी तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता. उसके बाद अपने फैसले का बचाव करना पड़ेगा. अभी इंतज़ार करने की स्थिति इन देशों के लिए ठीक है. इस तरह वो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के ख़िलाफ़ भी नहीं जा रहे हैं."
वहीं, तालिबान नेतृत्व की कट्टरता भी इन देशों के हाथ बांधती है. जिस तरह इस तालिबान को 1996 के तालिबान से अलग बताया गया था, समावेशी और उदार सरकार की बात की गई थी वो होता नहीं दिख रहा है.
तालिबान सरकार को एक महीना हो गया है लेकिन कोई भी सकारात्मक संकेत नहीं आए हैं.
अब भी महिलाओं के अधिकारों को लेकर संशय बना हुआ है. लड़के-लड़कियों के एकसाथ पढ़ने पर रोक लगा दी गई है. ऐसी भी ख़बरें वहां नाइयों को लोगों की दाढ़ी ना काटने के आदेश दिए गए हैं.
शरीया क़ानून लागू करने की बात होती रही है. खुलेआम चौराहे पर लोगों के शव टांगे गए हैं और लोगों का पलायन जारी है.
ऐसे में तालिबान सरकार में कट्टरता कम होने की बजाय बढ़ती हुई ही नज़र आती है जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता नहीं है. वहीं, इससे अन्य चरमपंथी संगठनों का हौसला बढ़ने का भी डर बना रहता है.
प्रोफ़ेसर पंत बताते हैं, "तालिबान को लेकर नकारात्मक रिपोर्ट्स आ रही हैं. इसके कारण दुनिया की बड़ी शक्तियां मान्यता देने के लिए कोई जल्दबाजी नहीं कर रही हैं. ऐसे में चीन, रूस और पाकिस्तान अगर मान्यता दे देते हैं तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच बन रही सहमति के ख़िलाफ़ फ़ैसला होगा."
"इसके लिए ये देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालिबान सरकार के समर्थन में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इमरान ख़ान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में जो भाषण दिया उसमें मुख्य एजेंडा यही है कि दुनिया को तालिबान को मान्यता देने के लिए तैयार किया जाए. जितने ज़्यादा देश इस दिशा में बढ़ेंगे उतना ही पाकिस्तान को तालिबान को लेकर नीति में मज़बूती मिलेगी."
इस्लामिक कट्टरता बढ़ने का डर
शुरुआती दौर से ही रूस, चीन और पाकिस्तान का ज़ोर इस बात पर रहा है कि तालिबान सरकार में अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल उनके ख़िलाफ़ ना किया जाए.
पाकिस्तान तहरीक-ए-तालिबान को लेकर चिंता जताता आया है, चीन को डर है कि उसके शिनजियांत प्रांत में पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट को मज़बूती ना मिले और रूस अपने पड़ोसी देशों में शांति बनाए रखना चाहता है.
जिस तरह से तालिबान ने पंजशीर घाटी में राजनीतिक विरोधियों को मारा है उसे देखते हुए ताजिकों और उज़्बेकों में बहुत नाराज़गी है. कज़ाकिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और रूस के नज़दीक हैं. वहाँ बढ़ती नाराज़गी और कट्टरता से रूस के लिए बचना मुश्किल होगा.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर संजय के भारद्वाज कहते हैं, "तालिबान सरकार में जितनी कट्टरता होगी वो आगे भी विस्तार करेगी. इस्लामिक कट्टरवाद किसी एक देश की सीमा तक नहीं रहता वो अपना विस्तार करता है. रूस, चीन और पाकिस्तान को यही डर सता रहा है."
वह बताते हैं कि एक बात और अहम है कि तालिबान सरकार में हक्कानी समूह का वर्चस्व होना जिसकी कट्टरता के बारे में पूरी दुनिया जानती है. तभी ये तीनों देश समावेशी सरकार की बात कर रहे हैं ताकि एक उदार तालिबान सरकार उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल ना हो सके.
पाकिस्तान की मुश्किलें कुछ अलग
इस बीच पाकिस्तान की मुश्किलें चीन और रूस से कुछ अलग है. पाकिस्तान को ना सिर्फ़ आतंकी गतिविधियां बढ़ने का डर है बल्कि उसकी आर्थिक हालत भी ख़राब है.
पाकिस्तान इस समय फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ग्रे लिस्ट में बना हुआ है. उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगे हैं. ऐसे में कट्टर तालिबान सरकार का समर्थन पाकिस्तान की छवि को और खराब कर सकता है.
प्रोफेसर संजय भारद्वाज बताते हैं, "1996 से हालात बहुत बदल चुके हैं. पहले दुनिया को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि अफ़ग़ानिस्तान में क्या हो रहा है. अब पूरी दुनिया मानवाधिकारों की बात कर रही है. तब तहरीक-ए-तालिबान नहीं था और पाकिस्तान में उतना आतंकवाद नहीं था. तालिबान को पहले मान्यता देने वाले सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी चुप्पी साधे हुए हैं. पाकिस्तान अकेले इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकता."
क्या संभव है समावेशी सरकार
अफ़ग़ानिस्तान में जिस समावेशी सरकार पर ज़ोर दिया जाता है तालिबान उसके लिए कितना तैयार है.
अमेरिका, भारत, रूस, चीन और पाकिस्तान सभी देश अपनी-अपनी तरह की समावेशी सरकार चाहते हैं. क्या तालिबान इन सभी को भरोसे में लेने में सक्षम है?
हर्ष पंत मानते हैं कि तालिबान शासन में फिलहाल समावेशी सरकार बनना बहुत मुश्किल है. अगर वो ऐसा चाहते तो पंजशीर घाटी में हिंसा का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि राजनीतिक समाधान की बात करते. अभी तो आंतरिक कलह ही ख़त्म नहीं हुई है.
लेकिन, अंतरराष्ट्रीय समुदाय समावेशी सरकार पर ज़ोर देता है क्योंकि बग़ैर समावेशी सरकार के तालिबान भी अफ़ग़ानिस्तान को नियंत्रित नहीं कर पाएंगे.
इसके चलते तालिबान में गृह युद्ध स्थिति बनी रहेगी और आर्थिक विकास व विदेशी संभव नहीं होगा. चीन के अफ़ग़ानिस्तान में आर्थिक हित इससे प्रभावित हो सकते हैं.
तालिबान के सामने चुनौतियां
तालिबान सरकार की लगातार कोशिश रही है कि उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी जाए. हाल ही में उसने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अफ़ग़ानिस्तान की तरफ़ से तालिबान के प्रतिनिधि को संबोधित करने का मौका देने की मांग की थी.
तालिबान सरकार के शुरुआती दिनों में उसने महिला अधिकारों और सबको साथ लेकर चलने की बात की थी लेकिन, मौजूदा हालात ऐसे संकेत नहीं देते हैं.
तालिबान की आंतरिक कलह अब जगजाहिर हो चुकी है. काबुल पर नियंत्रण के कुछ दिन बाद ही मुल्ला बरादर और हक़्क़ानी गुट के बीच सरकार के गठन को लेकर राष्ट्रपति भवन में हिंसक झड़प होने को लेकर क़यास लगाए जाते रहे.
अमेरिका के साथ वार्ता में मुख्य भूमिका निभाने वाले मुल्ला बरादर अचानक गायब हो गए. तालिबान के नेता मुल्ला हिब्तुल्लाह अखुंदज़ादा भी लंबे समय से नदारद हैं. इससे समूह की समस्याएं और भी बढ़ गई हैं. ये सवाल भी उठ रहा है कि वो ज़िंदा भी हैं या नहीं.
इसके अलावा पारंपरिक नस्लीय और क़बायली खींचतान भी चल रही है. पूर्व में रहने वाले पश्तून मज़बूत होकर उभरे हैं और वो दक्षिणी क़बीलों के ख़िलाफ़ खड़े हो रहे हैं.
वहीं, पंजशीर घाटी में हुई हिंसा के बाद हज़ारा समुदाय में अलग नाराज़गी है.
इस सरकार के 33 मंत्रियों में से सिर्फ़ तीन ही मंत्री अल्पसंख्यक समूहों से हैं. इनमें दो ताजिक मूल के हैं और एक उज़्बेक मूल के. सरकार में न तो सबसे बड़े नस्लीय समूहों में शामिल शिया हज़ारा समुदाय से कोई मंत्री हैं और न ही कोई महिला मंत्री ही शामिल हैं.
प्रोफेसर संजय भारद्वाज कहते हैं कि आंतरिक टकराव को शांत करने के साथ ही तालिबान सरकार को अपने कट्टर रुख को भी छोड़ना होगा जो कि इतना आसान नहीं है.
वो कहते हैं, "इन समूहों के बनने का आधार ही कट्टरता है. अगर ये उसे छोड़ देंगे तो इनका अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा. अगर ये उदार रुख अपनाते भी हैं तो इन्हीं के अंदर से कोई और गुट विरोध करने उभर आएगा."
जानकारों का मानना है कि पहले इन चरमपंथी संगठनों का एक ही दुश्मन था अमेरिका और अफ़ग़ान सरकार लेकिन अब वो चले गए हैं, अब इनके बीच सत्ता की लड़ाई होगी जो साफ दिख रही है, ऐसे में जब तक स्थिरता नहीं आती तब तक तालिबान सरकार को मान्यता मिलना मुश्किल है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)