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कितना आसान होगा बीसीसीआई में बदलाव करना?
- Author, प्रदीप मैगज़ीन
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार
भारत में क्रिकेट पर नियंत्रण रखने वाली सर्वोच्च संस्था बीसीसीआई के लिए 19 जनवरी को एक पर्यवेक्षक की नियुक्त होने वाली है.
इस पर्यवेक्षक को लोढ़ा समिति की सिफारिशों के तहत बीसीसीआई में होने वाले सुधारों पर नज़र रखने के लिए नियुक्ति किया जा रहा है.
हालांकि जिस किसी को भी ये जिम्मेवारी मिलेगी उसके लिए यह एक चुनौतीपूर्ण और मुश्किल काम होगा.
क्योंकि बोर्ड के सदस्यों ने लोढ़ा समिति की सिफारिशों के प्रति रूखा रवैया अपना कर यह जाहिर कर दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले लोढ़ा समिति की सिफारिशें नहीं मानने की वजह से बोर्ड के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को पद से हटा दिया था.
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को अवमानना का नोटिस भी दिया था.
देश में बहुत सारे क्रिकट प्रेमियों को अभी भी लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने अनावश्यक रूप से इस मामले में कुछ ज्यादा ही दखलअंदाजी की है.
बोर्ड के अध्यक्ष बनने की सीमा 70 साल तय करने और मंत्रियों या कार्यरत नौकरशाहों को इसके लिए अयोग्य बनाने जैसी लोढ़ा समिति की सिफारिशों को भी मौलिक अधिकार के हनन की तरह देखने वालों की कमी नहीं है.
ऐसे लोगों को यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि कोर्ट ने तभी दखल दिया था जब बोर्ड और उसके अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने अपने दामाद गुरुनाथ मयप्पन को सट्टेबाजी और फिक्सिंग के आरोप में बचाने की कोशिश की थी.
बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के आदित्य वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दर्ज कर इस मामले में न्यायिक जांच की मांग की थी. हालांकि बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को बोर्ड की ओर से मान्यता प्राप्त नहीं है.
हरियाणा और पंजाब हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस ने इस मामले में जांच के आदेश दिए थे.
मुदगल आयोग ने एन श्रीनिवासन को तो सीधे तौर पर इस मामले में दोषी नहीं पाया था लेकिन उनके दामाद गुरुनाथ मयप्पन को दोषी पाया गया था और आयोग ने पाया कि बोर्ड उन्हें बचाने की कोशिश कर रहा था.
मुद्गल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कुछ और भी गड़बड़ियों का जिक्र किया था. रिपोर्ट के मुताबिक़ तब भारतीय टीम के कप्तान रहे महेंद्र सिंह धोनी ने मयप्पन और आईपीएल टीम चेन्नई सुपर किंग्स के साथ अपने संबंधों के बारे में आयोग से झूठ बोला था.
लेकिन मुद्गल आयोग ने जिस सबसे महत्वपूर्ण बिंदु का ज़िक्र किया था, वो था आपस में हितों की टकराव को लेकर.
फिर चाहे वो खिलाड़ी हो या बोर्ड सदस्य. बोर्ड के कामकाज में उनके अड़ंगेबाज़ी की वजह से ऐसा होता था.
ख़ुद श्रीनिवासन को बोर्ड के संविधान में संशोधन करके बोर्ड के अधिकारियों को आईपीएल टीम खरीदने की अनुमति देने का दोषी पाया गया था.
मुद्गल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक़ तीन सदस्यीय न्यायिक जांच समिति का गठन किया गया.
इस जांच समिति की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस आरएम लोढ़ा कर रहे थे.
इस समिति ने बोर्ड के संविधान में ऐसे बदलावों की सिफारिश की है जिससे बोर्ड के कामकाज को अधिक पारदर्शी बनाया जा सके.
इसे इस मायने में क्रांतिकारी बदलाव कहा जा सकता है कि लोढ़ा समिति ने बोर्ड के संविधान को पूरी तरह से पलट देने की सिफारिश की है.
आयु सीमा के अलावा समिति ने सिफारिश की है कि सभी सदस्यों के कार्यकाल का समय कुल नौ साल का होगा जिसमें तीन साल के बाद अंतराल होगा.
इसका मतलब हुआ कि बोर्ड के मौजूदा सदस्यों में से कोई भी आगे अपने पद पर कायम नहीं रहने वाला है.
इस कड़ी में एक और महत्वपूर्ण फ़ैसला 'एक राज्य एक वोट' का है. कुछ राज्यों में एक से ज्यादा वोटिंग सदस्य हैं लेकिन अब वे राज्य भी सिर्फ़ एक वोट ही दे सकेंगे.
समिति ने बोर्ड के नौ सदस्यीय मंडल में खिलाड़ियों के एक प्रतिनिधि, एक कैग के प्रतिनिधि और एक लोकपाल के होने की बात कही है.
इसके साथ ही बोर्ड के कामकाज पर नज़र रखने के लिए एक प्रोफेशनल सीईओ की नियुक्ति की जाएगी.
लगभग-लगभग ऐसी ही संरचना राज्यों के लिए भी तय करने की बात कही गई है.
सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा समिति की इन सभी सिफारिशों को मान लिया है और बोर्ड को इसे लागू करने को कहा है.
इसके लिए छह महीने से लेकर एक साल तक समय दिया गया है. लोढ़ा समिति को इन बदलावों पर नज़र रखने का अधिकार भी दिया गया है.
बोर्ड के अधिकारियों को डर है कि उन्हें पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाएगा और इस वजह से वो समिति की सिफारिशों का विरोध कर रहे हैं.
वो अभी भी इन सुधारों का रोकने के जुगत में लगे हुए हैं. और ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि फिलहाल चल रही भारत-इंग्लैंड सिरीज़ में भी वे गड़बड़ी कर सकते हैं.
वे ऐसा करके यह दिखाना चाहेंगे कि इतना आसान नहीं है इस तरह से बदलाव करना.
एक बात पक्की है कि लोढ़ा समिति की सिफारिशें आने वाले दिनों में देश के दूसरे खेल फ़ेडरेशनों के लिए आदर्श हो सकते हैं.
जब किसी संस्था में बदलाव का दौर होता है तो ऐसी परेशानियां का सामना करना ही पड़ता है जो बीसीसीआई को अभी झेलनी पड़ रही हैं.
उम्मीद है कि बीसीसीआई के आने वाले अधिकारी इन बदलावों को बिना विलंब और कोर्ट के दख़ल के बिना लागू करेंगे.
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