सोशलः तीन तलाक़ बिल पर क्या कहती हैं मुस्लिम महिलाएं?

तीन तलाक़ को आपराधिक करार देने वाला विधेयक (मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक) गुरुवार को लोकसभा में पारित हो गया है. अब इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा.
ये विधेयक तीन तलाक़ या मौखिक तलाक़ को आपराधिक घोषित करता है और इसमें तलाक़ की प्रथा का इस्तेमाल करने वाले के ख़िलाफ़ अधिकतम तीन साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान है.
बीबीसी हिंदी ने तीन तलाक़ के मुद्दे पर फ़ेसबुक लाइव में मुस्लिम महिलाओं से बात की. लाइव में शामिल सभी महिलाओं ने एक सुर में मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल नहीं देने की मांग की.

पढ़ें फ़ेसबुक लाइव में महिलाओं ने क्या-क्या कहा?
हमारी कौम का मसला
यह क़ानून औरत के लिए नुकसानदेह है. हम मानते हैं कि इसका ग़लत इस्तेमाल किया गया है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप मुस्लिम समुदाय के निजी मसलों में हस्तक्षेप करेंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा की तीन तलाक़ मान्य नहीं होगा लेकिन इस बिल के अनुसार अगर कोई तीन तलाक़ बोलता है तो उसे तीन साल की सज़ा हो जाएगी. ये किसी की आज़ादी पर हमला है. ये औरत के लिए नुकसानदेह है.
जानकार कहते हैं कि तीन तलाक़ का ग़लत इस्तेमाल किया गया है और हम इस बात को स्वीकार करते हैं. लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी कहा है कि यह हमारे कौम का मसला है जिसे हम खुद सुलझायेंगे.

ये मसला मुस्लिम समुदाय खुद सुलझा सकता था लेकिन ऐसा कर नहीं सका. औरतों को बहुत जगह दबा दिया जाता है लेकिन उन मसलों को नहीं उठाया जाता है. तीन तलाक़ का मसला राजनीतिक हो गया है.
सामग्री् उपलब्ध नहीं है
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शिक्षा, रोजगार, किसान जैसे कई मुद्दे हैं जिन पर सरकार को ध्यान देना चाहिए. लेकिन किसी खास समुदाय से किसी खास चीज़ को उठाकर मुद्दा बना दिया गया.

हर समुदाय में होते हैं ऐसे लोग
बेशक बीवी देर से सोकर उठे और पति उसे तलाक़-ए-बिद्दत दे दे, तो यह ग़लत है. लेकिन ऐसे लोग हर समुदाय में होते हैं.
क़ानून बनना चाहिए या नहीं यह सवाल नहीं है. यह मुस्लिमों का मामला है. संविधान में हमें अपने-अपने मजहब के मुताबिक़ अपने पर्सनल लॉ का पालन करने का अधिकार दिया गया है और 1937 शरीयत एप्लीकेशन के अनुसार मुल्क में फ़ैसले होते हैं. दोनों एक ही मजहब के हैं तो शरीयत एप्लीकेशन के मुताबिक़ उनके फ़ैसले होंगे. संविधान के मुताबिक़ हमें बराबर का दर्जा दिया गया है.
अन्य समुदाय के लिए तलाक़ देने की स्थिति में एक साल की सज़ा है लेकिन मुसलमान के तलाक़ देने पर तीन साल की सज़ा देने का प्रावधान बनाया जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक माना है. लेकिन तीन तलाक़ देने वाले मुसलमान को जेल में डालने से क्या होगा?
एक समुदाय को ही निशाने पर लिया जा रहा है.
तीन तलाक़ को लेकर जो चिंता दिखाई गई है क्या उतना ही अन्य महत्वपूर्ण मसलों को लेकर भी दिखाया जा रहा है?

क्या सज़ा नहीं होनी चाहिए?
सज़ा समुदाय तय करेगा. तीन तलाक़ में सज़ा क्रिमिनल लॉ की तरह कैसे दे सकते हैं? सरकार से चाहते हैं कि वो पर्सनल लॉ में दखल न दें.
मुस्लिम लड़कों के पास नौकरियां नहीं हैं, वो उन्हें नौकरियां दें.
अगर सब्जी में नमक ज्यादा डाल दिया और इस मुद्दे पर तलाक़ दे दिया तो ये ग़लत है. मुस्लिम समुदाय इसमें बदलाव कर रहा है. एजुकेशन होनी चाहिए. मुस्लिम औरत दूसरा निकाह कर सकती हैं.
जिन्होंने इस्लाम और शरीयत को नहीं समझा है वो इस पर ऐतराज करेंगे. लेकिन जेल में डाल देना किसी समस्या का हल नहीं है.
अगर किसी के कहने पर भी सज़ा दी जा रही है तो क्या यह इसका ग़लत इस्तेमाल नहीं है?












