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जीन का संबंध भोजन और प्रजनन से | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के शोधार्थियों ने एक ऐसे जीन की खोज की है जो भूख और प्रजनन क्षमता को नियंत्रित करता है. यह जीन (टीओआरसी-1) मास्टर स्विच की तरह काम करता हुआ प्रतीत होता है जो भूख को नियंत्रित कर भोजन को पेट में जाने से रोकता है और गर्भधारण की अनुमति देता है. शोधार्थियों का कहना है कि यह जीन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय किसी महिला को गर्भधारण नहीं करने देता जब उसके शरीर में भोजन की कमी होती है. नेचर पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार जिन मादा चूहों में यह जीन नहीं था उनका वजन अधिक पाया गया और वो बच्चे भी पैदा नहीं कर पाईं. कम वजन वाली और कुछ अतिरिक्त वजन वाली महिलाओं को प्रजनन क्षमता संबंधी समस्याएं हो सकती हैं और केलीफ़ोर्निया के सैल्क इंस्टीट्यूट का यह शोध संकेत देता है कि टीओआरसी-1 इन दोनों मामलों में अपनी भूमिका निभाता है. लेप्टिन का असर शोधार्थियों के अनुसार साधारण स्थितियों में जबकि पर्याप्त भोजन किया जाता है, तब चर्बी की कोशिकाएं एक हॉर्मोन बनाती हैं जिसे लेप्टिन कहते हैं. यह हॉर्मोन भूख को घटाने और प्रजनन क्षमता को सुचारु करने वाले जीन टीओआरसी-1 को चालू कर देता है. खाद्य पदार्थों की कमी के समय लेप्टिन की कमी से टीओआरसी-1 काम नहीं करता और भूख की देखभाल न करने के साथ गर्भधारण को भी रोकता है. शोधार्थियों का मानना है कि यह भुखमरी और अकाल के वक्त होने वाला एक अनोखा फ़ायदा है. उनका मानना है कि इस जीन की संख्या में अतिरिक्त वृद्धि भी मोटापे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. ऐसे में पहले ही काफ़ी मात्रा में भोजन किये जा चुकने पर भी यह भोजन बंद करने का संकेत नहीं देता. वंशानुगत मोटापा उन्होंने कहा कि अगर यह जीन पीढ़ी दर पीढ़ी जाता रहे तो यह मोटापे की वंशानुगत समस्या का कारक बन जाता है. इस जीन के सही प्रकार से काम न करने से प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है और यह गर्भधारण की अनुमति नहीं देता. इसकी जाँच करने के लिए वैज्ञानिकों ने बिना टीओआरसी-1 वाले चूहों का प्रजनन कराया जिनका वजन मात्र आठ सप्ताहों के बाद ही बढ़ने लगा और दोनों ही लिंगों की प्रजनन क्षमता नकारात्मक रही. इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफ़ेसर मार्क मोंटमिनी ने कहा कि टीओआरसी-1 ने दवाओं के लिए अच्छा रास्ता दिखा दिया है. |
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