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भारतीयों में मोटापे का जीन! | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे कारणों का पता लगाने का दावा किया है कि भारतीय मूल के लोगों में मोटापे से संबंधित समस्याएँ ज़्यादा क्यों होती हैं. लंदन के इम्पीरियल कॉलेज के एक अध्ययन दल ने इस विषय पर शोध किया है और पाया है कि भारतीय मूल के लोगों में एक ऐसा जीन होता है जो कमर के आसपास वज़न बढ़ाने की वजह बनता है. बताया गया है कि इसी जीन की वजह से ही पूरे शरीर का वज़न बढ़ता है और एक ख़ास क़िस्म की डायबटीज़ भी होती है. हालाँकि ख़ास क़िस्म का यह जीन ब्रिटेन की क़रीब 50 प्रतिशत आबादी में पाया जाता है मगर भारतीय मूल के लोगों में यह ज़्यादा पाया जाता है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि नेचर पत्रिका की तरफ़ से कराए गए इस शोध के बाद मोटापे से संबंधित समस्याओं का इलाज करने में कुछ ठोस मदद मिल सकती है. इस शोध से यह उम्मीद बनी है कि भारतीय मूल के लोगों में मोटापे की बढ़ती वजह के पीछे क्या ख़ास कारण हो सकते हैं. दुनिया भर में जितने लोग मोटापे की समस्याओं का सामना कर रहे हैं उनमें फिलहाल भारतीय मूल के लोगों लगभग एक चौथाई यानी 25 प्रतिशत हिस्सा हैं लेकिन अगर यही रफ़्तार जारी रही तो यह संख्या बढ़कर 2020 में चालीस प्रतिशत हो जाएगी. शोध दल ने जिस जीन समूह का पता लगाने का दावा किया है वह एमसी4आर नामक जीन के पास स्थित रहता है और इस जीन को प्रभावित भी करता है. एमसी4आर यह जीन शरीर में ऊर्जा के स्तर को नियंत्रित करता है और यह निर्धारित करता है कि हम कितना और किस तरह का खाना खाते हैं और हमारे शरीर को कितनी ऊर्जा ख़र्च करने और कितनी इकट्ठी करने की ज़रूरत होती है. इसी प्रक्रिया में भारतीय मूल के कुछ बच्चों में ही मोटापा हो जाता है. शोधकर्ताओं ने कहा है कि यह जीन समूह कमर के आसपास रहता है और इससे दो किलोमीटर तक वज़न वहाँ जमा हो जाता है और इसी वजह से शरीर पर इंसुलिन का असर होना बंद हो जाता है और इससे टाइप-2 डायबटीज़ होने का रास्ता खुल जाता है. रोकथाम शोधकर्ता दल के मुखिया प्रोफ़ेसर जसपाल कूनेर का कहना है कि मोटापे की वजह बनने वाला जीन और मोटापे से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को ठीक से समझने की कोशिश कम ही हुई है. प्रोफ़ेसर जसपाल कूनेर का कहना था, "डायबटीज़ और दिल का दौरा पड़ने से संबंधित समस्याओं के पीछे जिन जीन का हाथ होता है अगर इसके बारे में बेहतर तरीके से जानकारी और समझदारी हासिल कर ली जाए तो लोगों की इस समस्या के बारे में पता लगाने में ज़्यादा आसानी हो सकती है कि उनका कौन सा अनुवंशिक जीन मोटापे के लिए उन्हें ज़्यादा संवेदनशील बनाता है." प्रोफ़ेसर जसपाल कूनेर के अनुसार, "हम लोगों के अनुवंशिक गुणों या अवगुणों को बदल तो नहीं सकते मगर मोटापे या ऐसी ही अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की रोकथाम पर ज़्यादा जागरूक तरीके से ध्यान तो दिया ही जा सकता है. मसलन, खाने-पीने की आदतों और कसरत वग़ैरा को कुछ नियमित और नियंत्रित किया जा सकता है और इस बीमारी का मुक़ाबला करने के लिए नई दवाइयाँ तैयार की जा सकती हैं." ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन के चिकित्सा निदेशक प्रोफ़ेसर पीटर वीसबर्क का कहना है कि यह काफ़ी पहले ही स्थापित किया जा चुका है कि भारतीय मूल के एशियाई लोग गोरे यूरोपीय लोगों के मुक़ाबले दिल की बीमारियाँ होने के लिए ज़्यादा संवेदनशील होते हैं यानी भारतीय मूल के लोगों को ये बीमारियाँ ज़्यादा होने की संभावना होती है. ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन ने ही यह शोध कराया था. इसके चिकित्सा निदेशक प्रोफ़ेसर पीटर वीसबर्ग ने कहा, "यह अध्ययन काफ़ी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक ऐसे महत्वपूर्ण जीन और सुराग का पता लगा है जिसके आधार पर डॉक्टर अनेक लोगों को स्वास्थ्य संबंधी फ़ायदे पहुँचा सकते हैं और लोगों को वज़न स्वस्थ सीमा में रखने में मदद कर सकते हैं." "दूसरी बात ये कि इस अध्ययन के नतीजों से जीव विज्ञान में एक नई दिशा मिलती है कि कुछ ख़ास लोग अन्य लोगों के मुक़ाबले दिल की बीमारियों के लिए ज़्यादा संवेदनशील क्यों होते हैं." | इससे जुड़ी ख़बरें डाइटिंग से घटता नहीं मोटापा05 मई, 2008 | विज्ञान डटकर खाओ फिर भी पतले!30 अप्रैल, 2008 | विज्ञान जंक फ़ूड विज्ञापनों के ख़िलाफ़ अभियान16 मार्च, 2008 | विज्ञान 'महामारी बन रहा है मोटापा'20 फ़रवरी, 2008 | विज्ञान 'पूरी दुनिया में फ़ैल रहा है मोटापा'25 अक्तूबर, 2007 | विज्ञान संक्रामक है मोटापा भी...26 जुलाई, 2007 | पहला पन्ना दिल के दौरे से मोटे मरीज़ों को राहत20 जून, 2007 | विज्ञान मोटापा पहुँचा सकता है पैरों को नुक़सान26 नवंबर, 2006 | विज्ञान इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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