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योग: जानू नमन और नासिकाग्र दृष्टि आसन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जानू घुटने को कहते हैं. क्रम से घुटनों को मोड़ने और सीधा करने को जानू नमन कहते हैं. घुटना हमारे शरीर का वह अंग है जो पूरे शरीर को संभालता है. यह आसन घुटने से संबंधित मांसपेशियों को ताकत देता है और उन्हें लचीला बनाता है. ढलती उम्र में व्यक्ति को जोड़ों से संबंधित आसन ज़रूर सीख लेने चाहिए, क्योंकि व्यक्ति तभी तक जवान रहता है जब तक उसके सभी अंग और जोड़ तनाव रहित रहते हैं. हमारे शरीर में एक प्राण शिक्ति है.आसन की मदद से उसके प्रवाह को गितशील बनाए रख सकते हैं. प्रारंभिक स्थिति
जमीन पर दोहरा कंबल बिछाकर रखें और दोनों पैरों को सामने की ओर फैला कर बैठ जाएं. दोनों पैरों के बीच थोड़ा अंतर रखें. विशेष तौर पर रीढ़ की हड्डी सीधा रखें. पूर शरीर को भी सीधा रखने का प्रायस करें. जानू नमन दाएं पैर को घुटने से मोड़ें और दाएं जांघ के नीचे दोनों हाथों की अंगुलियों को मिलाकर पकड़ लें. इससे आपके दोनों हाथ सीधे हो जाएंगे. इस बात का ध्यान रखें कि एड़ी ज़मीन से थोड़ा ऊपर रहे. दूसरी अवस्था में दाएं पैर को घुटने से मोड़ें और हथेलियों के दबाव से जांघ को सीने के क़रीब लाने का प्रयास करें.इस अवस्था में सांस पूरी तरह बाहर निकल जाएगी और पैर अंदर की ओर पिचक जाएगा. (सिद्धार्थ प्रसाद के साथ योग पर कार्यक्रम आप हर शनिवार और रविवार को बीबीसी हिंदी रेडियो के प्रात:कालीन प्रसारण भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े छह बजे सुन सकते हैं.) इस आसन को करते समय सिर और रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें.
यह एक क्रम है. इस आसन को व्यक्ति को अपने शक्ति के अनुसार 5 से 10 बार करना चाहिए. आसन करते समय यह हमेशा ध्यान रखें कि पैर को सीधा करते समय सांस को भरना है और घुटने से मोड़ते समय सांस को छोड़ना है. नासिकाग्र दृष्टि दृष्टि का अर्थ होता है देखना. एकाग्रता का संबंध हमारी दृष्टि से होता है. क्योंकि जहां दृष्टि स्थिर कर ली जाए वहां एकाग्राता बढ़ जाती है. जिसके बाद ध्यान लगने लगता है. एकाग्रता हमें अंतर्मुखी बनाता है और मन की चंचलता को शांत करता है. इसका सबसे आसान अभ्यास किसी एक बिंदु पर टकटकी लगाकर देखना है.यह छात्रों के लिए ज़्यादा लाभदायक है. कैसे लगाएं आसन
किसी भी ध्यानात्मक आसन करने के लिए दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर बैठें. बाएं हाथ को घुटने पर रखें. दाएं हाथ की मुट्ठी बनाएं और हाथ को नाक की सीध में रखें. सांस भरते हुए अंगुठे को धीरे-धीरे नाक की सीध में क़रीब लेकर आएं. सांस छोड़ते हुए हाथ को सीधा कर लें, लेकिन अपनी दृष्टि अंगुठे पर ही बनाए रखें. क्या होगा लाभ इस आसन को करने से एकाग्रता बढ़ती है. दृष्टि के स्थिर हो जाने से मन शांत रहता है. सांस की गति के साथ एकाग्र करने से विचार स्थिर हो जाते हैं. इससे पढ़ने की क्षमता भी बढ़ती है. (योग प्रशिक्षक सिद्धार्थ प्रसाद का विशेष कार्यक्रम आप हर शनिवार और रविवार सुन सकते हैं सुबह साढ़े छह बजे बीबीसी हिंदी सेवा के 'आज के दिन' कार्यक्रम में. यह कार्यक्रम और यह लेख आपको कैसा लगा. आप अपनी राय हमें hindi.letters@bbc.co.uk पर भेज सकते हैं) | इससे जुड़ी ख़बरें जड़ी बूटियों के गुणों वाले भारतीय बुर्क़े07 सितंबर, 2007 | विज्ञान 'आयुर्वस्त्र' पहनना ही काफ़ी नहीं28 जनवरी, 2008 | विज्ञान अब चलने से पैदा होगी बिजली08 फ़रवरी, 2008 | विज्ञान रीढ़ के दर्द से निजात की उम्मीद18 फ़रवरी, 2008 | विज्ञान मानव के बराबर बुद्धिमान होंगी मशीनें18 फ़रवरी, 2008 | विज्ञान 'महामारी बन रहा है मोटापा'20 फ़रवरी, 2008 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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