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रीढ़ के दर्द से निजात की उम्मीद | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लाइलाज मानी जाने वाली रीढ़ की चोट की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए ब्रिटेन के वैज्ञानिकों की एक खोज नई उम्मीद लेकर आई है. वैज्ञानिकों का मानना है कि वो रीढ़ की चोट के इलाज के बिल्कुल क़रीब हैं. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का दल एक ऐसी पद्दति की खोज में है जिसकी सहायता से स्पाइनल कॉर्ड यानी मेरुदण्ड के अन्दर क्षतिग्रस्त नर्व फ़ाइबर यानी तंत्रिका तंतु की दोबारा उत्पत्ति संभव हो सकेगी. इससे अन्य ठीक तंत्रिका तंतुओं को भी सुचारु रूप से काम करने में मदद मिलेगी. रीढ़ की चोट का इलाज मुश्किल होता है क्योंकि शरीर, दिमाग़ या मेरुदण्ड को हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति नहीं कर पाता है. हलांकि तंत्रिका चोट की जगह पर उतकों की दोबारा उत्पत्ति कर सकती है. कैम्ब्रिज की टीम ने कॉन्ड्रोइटिनेस नाम के एक जीवाणु एंज़ाइम की पहचान की है जो घाव की जगह के कणों को पचा लेते हैं और वहां पर फिर से तंत्रिका तंतु पैदा देता हैं. इस एंज़ाइम के ज़रिए आस-पास के वो तंत्रिका तंतु भी अधिक सक्रिय हो उठते हैं जो क्षतिग्रस्त होने से बच जाते हैं. अपने प्रयोग के शुरुआती दौर में शोधकर्ताओं ने पाया कि कॉन्ड्रोइटिनेस की सहायता से किसी भी दूसरे तरीक़े की अपेक्षा अधिक सुधार मिले हैं. हलांकि इसका प्रयोग मरीज़ों पर होना अभी बाक़ी है. मुख्य शोधकर्ता प्रोफ़ेसर जेम्स फॉसेट ने कहा, “ऐसा कभी कभार ही होता है कि रीढ़ पूरी तरह से टूट जाए कुछ तंत्रिका तंतु ज़रूर सही सलामत बचे रहते हैं.” उन्होंने कहा, “कॉन्ड्रोइटिनेस से दो तरह की उम्मीदें हैं एक तो यह तंतुओं को फिर से पैदा करता है और दूसरे ये तंत्रिकाओं को सुचारु भी करता हैं.” प्रोफ़ेसर जेम्स ने उम्मीद जताई कि इस नई खोज से हमें उम्मीद है कि लकवा के शिकार लोगों के इलाज से उनकी हालत में सुधार किया जा सकेगा. खोज के लिए पूंजी देने वाली संस्था ‘ऐक्शन मेडिकल रिसर्च’ ने कहा, “ये बहुत ही महत्वपूर्ण खोज है. आने वाले दिनों में इससे रीढ़ की चोट से जूझ रहे लोगों के इलाज में आसानी होगी.” स्पाइनल इंजरीज़ एसोसिएशन के पॉल स्मिथ ने चेताते हुए कहा कि जब तक इसका सफल प्रयोग मरीज़ों पर नहीं हो जाता तब तक ज़्यादा उम्मीद नहीं की जानी चाहिए. उन्होंने कहा, “अक्सर जो परिणाम प्रयोगों के दौरान मिलते हैं वो वास्तव में उतने सटीक नहीं होते हैं.” ब्रिटेन में क़रीब 40 हज़ार लोग रीढ़ की चोट से ग्रसित हैं और चोट के समय व्यक्ति की औसत आयु सिर्फ़ 19 वर्ष है. | इससे जुड़ी ख़बरें कृत्रिम जीवन की ओर एक क़दम25 जनवरी, 2008 | विज्ञान 'शारीरिक क्षमता से विटामिन-ई का संबंध'25 जनवरी, 2008 | विज्ञान विटामिन-डी की कमी बढ़ा सकता है हृदय रोग08 जनवरी, 2008 | विज्ञान 'बोन मैरो' से शुक्राणु बनाने का दावा14 अप्रैल, 2007 | विज्ञान तनाव मारता है दिमाग़ की कोशिकाएँ14 मार्च, 2007 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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