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शनिवार, 13 अक्तूबर, 2007 को 10:15 GMT तक के समाचार
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अंडाशय के कैंसर का टीका बना
अंडाशय की कोशिकाएँ
अंडाशय का कैंसर ज़्यादातर मामलों में जानलेवा साबित होता है
अमेरिका के वैज्ञानिकों का कहना है कि अंडाशय के कैंसर के लिए बनाए गए टीके के शुरुआती परीक्षणों के परिणाम काफी उत्साहजनक पाए गए हैं.

न्यूयार्क के बफ़ैलो स्थित रॉसवैल पार्क कैंसर इंस्टीट्यूट के अनुसार यह टीका कैंसर के प्रति शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए बनाया गया है.

इस बीमारी के अधिकतर मरीजों को कीमोथेरेपी से फ़ायदा होता है लेकिन पूरी तरह निदान न हो सकने के कारण 70 फ़ीसदी से भी ज्यादा मरीज़ों की रोग होने के पाँच साल के अंदर ही मौत हो जाती है.

ब्रिटेन की कैंसर रिसर्च संस्था ने इस अध्ययन का स्वागत किया है और कहा है कि अभी इसके और परीक्षण की ज़रूरत है.

इस अध्ययन की विस्तृत जानकारी 'नेशनल अकैडमी ऑफ साइंसेज़' ने प्रकाशित की है.

इस टीके में अंडाशय कैंसर के प्रोटीन के एक अंश के साथ एक ऐसा कण भी है जिसे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए जाना जाता है.

यह टीका सिर्फ अंडाशय की कैंसर कोशिकाओं में बड़ी संख्या में पनप रहे प्रोटीन कणों को अपना निशाना बनाएगा जबकि स्वस्थ कोशिकाओं पर इसका असर नहीं होगा.

शोधकर्ताओं ने ऐसी औरतों पर इसका परीक्षण किया जिसे ऐसा अंडाशय कैंसर था जिसमें रोग की शुरूआत अंडाशय की बाहरी परत से होती है.

उन्होंने कहा है कि हालांकि यह एक शुरूआती अध्ययन है लेकिन फिर भी इसके प्रारंभिक परीक्षणों में काफ़ी उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं.

दोहरा असर

यह टीका शरीर के प्रतिरोधक तंत्र को प्रतिरक्षी कोशिकाएँ बनाने और कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाने के लिए विशेष टी-कोशिकाओं को प्रोटीन का उत्पादन करने को प्रेरित करता है.

शोधकर्ताओं ने मरीजों में ऐसी प्रतिरोधी कोशिकाओं को खोज निकाला है जिनका असर टीके को लगाने के 12 महीनो में दिखने लगता हैं और लंबे समय तक रहता है.

मुख्य शोधकर्ता प्रोफेसर कुनले ओडुंसी के अनुसार अब यह जाना-माना तथ्य है कि प्रतिरोधक तंत्र में अंडाशय की कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और नष्ट करने की क्षमता होती है.

उन्होंने कहा, "यही हमारे टीके की सीधी नीति है और हम इस जानकारी का ही लाभ उठाते हुए अंडाशय के कैंसर के मरीजों को फ़ायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं."

उन्होंने कहा कि हमें विश्वास है कि यह टीका हर जगह उपलब्ध होगा.

'कैंसर रिसर्च, यूके' के डा. एलिसन रौस कहते हैं, "प्रारंभिक परीक्षणों ने हालांकि उत्साहजनक परिणाम दिए हैं लेकिन यह भी याद रखना ज़रूरी है कि अभी इस क्षेत्र में और बड़े अध्ययन किए जाने की ज़रूरत है ताकि हम यह निश्चित रूप से जान सकें कि यह टीका पूर्णतया असरकारी और सुरक्षित है या नहीं."

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