|
मिश्रित भ्रूण विकसित करने पर विवाद | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मनुष्य और जानवर की कोशिकाओं को मिलाकर मिश्रित भ्रूण विकसित करने में लगे ब्रिटेन के वैज्ञानिकों को डर है कि उन्हें अपना शोध रोकना पड़ सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि भ्रूण अनुसंधान के लिए लाइसेंस देने वाली संस्था सरकार के दबाव में उनके आवेदनों को खारिज कर सकती है. दरअसल इस शोध के विरोध में जनमत को देखते हुए मंत्रियों ने इसे मंजूरी न देने का सुझाव दिया है. 'ह्यूमन फर्टिलाइजेशन एंड एंब्रोयोलॉजी अथॉरिटी' यानी एचएफईए जल्द ही इस संबंध में फ़ैसला लेगा कि शोध की अनुमति के लिए पहुँचे दोनों आवेदनों पर विचार करना उसके अधिकार क्षेत्र में है या नहीं. शोध के लिए मानव अंडाणुओं की कमी को देखते हुए मिश्रित भ्रूण विकसित करने का सुझाव दिया गया था लेकिन एचएफईए का कहना है कि अभी यह मसला सुलझना बाकी है कि वर्तमान क़ानून के तहत इस तरह के शोध को मंजूरी दी जा सकती है या नहीं. इसके अलावा यह भी देखना होगा कि इसके लिए लाइसेंस देना एचएफईए के अधिकार क्षेत्र में है भी कि नहीं. शोध से विकसित मिश्रित भ्रूण में 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मानव का होगा और काफ़ी कम हिस्सा जानवर का. इसका विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि यह प्रकृति से छेड़छाड़ के साथ ही अनैतिक भी है. जबकि शोधकर्ताओं ने इस मामले में लोगों से बेहतर समझ दिखाने की अपील की है. इलाज में मदद प्रजनन से जुड़े उपचार और भ्रूण शोध से संबंधित पुराने पड़ चुके क़ानून में संशोधन के लिए लोगों से सुझाव माँगे गए थे. मंत्रियों का मानना है कि विज्ञान के क्षेत्र में आए बदलावों को देखते हुए ह्यूमन फर्टिलाइजेशन एंड एंब्रयोलॉजी एक्ट-1990 में संशोधन की ज़रूरत है. नए श्वेत पत्र में कहा गया है कि भ्रूण को बनाने वाली कोशिकाओं की आनुवांशिक बनावट में बदलाव करने जैसे कुछ शोध वैज्ञानिक कर सकते हैं. लेकिन सरकार वैज्ञानिकों को मनुष्य और जानवर के मिश्रित भ्रूण बनाने से रोकने पर विचार कर रही है. मिश्रित भ्रूण में आनुवांशिक तत्व मनुष्य से लिया जाता है और उसे जानवर के अंडाणु में रख दिया जाता है. इसके बाद इसे प्रयोगशाला में शोध के लिए स्टेम कोशिकाओं के स्रोत के रूप में भ्रूण की शुरुआती अवस्था तक विकसित होने दिया जाता है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अविकसित अवस्था में स्टेम कोशिकाओं के अध्ययन से अल्ज़ाइमर समेत कई बीमारियों के इलाज में मदद मिल सकती है. किंग्स कॉलेज, लंदन के प्रोफेसर क्रिस शॉ ने अपने सहयोगी डॉक्टर स्टीफेन मिंगर के साथ मिलकर इसके लिए आवेदन किया है. उनका कहना है, '' इस शोध को रोकना रोगियों के कष्ट को नज़रअंदाज करना होगा क्योंकि इस क्षेत्र में हमारे पास कोई भी दवाई नहीं है.'' डॉक्टर मिंगर को उम्मीद है कि इससे पार्किंसन्स जैसी बीमारियों के आनुवांशिक कारणों को समझने में मदद मिल सकती है. हालांकि उन्हें बताया गया है कि एचएफईए उनके आवेदन को मंजूर नहीं करेगा. न्यूकैस्टल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लाइल आर्मस्ट्राँग के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की दूसरी टीम ने भी इसी तरह के शोध के लिए आवेदन किया है. वे शरीर में अलग-अलग ऊतकों के विकास का अध्ययन करना चाहते हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें मानव क्लोनिंग के क्षेत्र में बड़ी सफलता19 मई, 2005 | विज्ञान मानव भ्रूण की क्लोनिंग को अनुमति09 फ़रवरी, 2005 | विज्ञान तीस मानव भ्रूणों के क्लोन12 फ़रवरी, 2004 | विज्ञान क्लोन भ्रूण को प्रतिरोपित करने का दावा17 जनवरी, 2004 | विज्ञान प्रयोगशाला में बने शुक्राणु से भ्रूण11 दिसंबर, 2003 | विज्ञान क्लोन शिशु की जाँच स्थगित07 जनवरी, 2003 | विज्ञान दूसरा मानव क्लोन?05 जनवरी, 2003 | विज्ञान क्लोनिंग पर प्रतिबंध की माँग28 दिसंबरजनवरी, 2002 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||