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बुधवार, 06 सितंबर, 2006 को 15:14 GMT तक के समाचार
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जीएसएलवी की विफलता का राज खुला
इसरो
जाँच के मुताबिक ईंधन नियंत्रण प्रणाली में ख़राबी आने के कारण जीएसएलवी मिशन असफल हुआ
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान इसरो का कहना है कि जीएसएलवी मिशन की विफलता के लिए इसके प्रणोदक के रेगुलेटर में आई गड़बड़ी ज़िम्मेदार थी.

ग़ौरतलब है कि पिछले 10 जुलाई को भू-स्थैतिक प्रक्षेपण यान जीएसएलवी श्रीहरिकोटा से उड़ान भरने के चंद सेंकेंड बाद ही विस्फोट हो कर नष्ट हो गया था.

बंगलौर स्थित इसरो मुख्यालय ने आरंभिक जाँच रिपोर्ट में कहा है, "मिशन की विफलता का बुनियादी कारण इसके चार तरल प्रणोदक मोटरों में से एक में आई ख़राबी थी."

जाँच से स्ट्रैप ऑन मोटर में ईंधन को नियंत्रित करने वाली उपकरण में गड़बड़ी का पता चला है.

 मिशन की विफलता का बुनियादी कारण इसके चार तरल प्रणोदक मोटरों में से एक में आई ख़राबी थी
इसरो

इसी ख़राबी के कारण यान अपने तय रास्ते से भटक गया और विस्फोट के बाद समुद्र में जा गिरा.

इसरो के चेयरमैन माधवन नायर ने बताया कि जीएसएलवी के ज़रिए प्रक्षेपित किए जाने वाले लगभग दो टन वजनी उपग्रह इनसैट-4सी को अब अब अगले साल जून में दोबारा प्रक्षेपित किया जाएगा.

उन्होंने कहा कि आगे ऐसी तकनीकी गड़बड़ी न हो, इसके लिए गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली को और मजबूत बनाया जाएगा.

इसरो चार टन तक वजनी उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए ज़रूरी बुनियादी ढ़ाँचा विकसित करने पर लगभग 54 करोड़ डॉलर का निवेश कर रहा है.

क्षमता

स्वदेशी तकनीक से जीएसएलवी विकसित करने वाला भारत दुनिया का छठा देश है और इसके वाणिज्यिक इस्तेमाल को बढ़ाने की योजना है.

इसके अलावा देश के चंद्र अभियान में भी इस जीएसएलवी रॉकेट की अहम भूमिका होगी. 10 जुलाई को हुए हादसे से इन दोनों लक्ष्यों को ठेस पहुँचा था.

जीएसएलवी लगभग 2168 किलोग्राम या 2.4 टन वजन वाला इनसैन-4सी उपग्रह लेकर जा रहा था.

दुर्घटनाग्रस्त हुए जीएसएलवी की लंबाई 49 मीटर थी और इसमें रूसी तकनीक से बनी नियंत्रण प्रणाली लगाई गई थी . हलाँकि सारे उपकरण स्वदेशी तकनीक से बनाए गए थे.

अभी भारत के नौ संचार उपग्रह अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं.

संचार उपग्रह प्रणाली के मामले में एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत पहले नबंर पर है.

भारतीय वैज्ञानिक दो तीन साल के भीतर चांद पर मानव खोजी दल उतारने की तैयारी कर रहे हैं.

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