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नीम के गुणों और पेटेंट का विवाद | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में एक कहावत प्रचलित है कि जिस धरती पर नीम के पेड़ होते हैं वहाँ मृत्यु और बीमारी कैसे हो सकती है. नीम के पेड़ पूरे दक्षिण एशिया में फैले हैं और हमारे जीवन से जुड़े हुए हैं लेकिन अब अन्य देश भी इसके गुणों के प्रति जागरूक हो रहे हैं. यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत में लोग नीम के बारे में अपने पारंपरिक ज्ञान से कैसे लाभ उठा सकता है. नीम एक चमत्कारी वृक्ष माना जाता है. भारत में इसके ओषधीय गुणों की जानकारी हज़ारों सालों से रही है. चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है. इसे ग्रामीण ओषधालय का नाम दिया गया है. इसके गुणों का अँदाज़ा इसके वैज्ञानिक नाम से ही हो जाता है. नीम फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के डॉक्टर रमेश सक्सेना कहते हैं, "नीम का वैज्ञानिक नाम फ़ारसी से बना है - आज़ाद दरख़्ता-ए-हिंद. जिसका अर्थ निकलता है - भारत का आज़ाद पेड़." "इसका एक अर्थ ये भी लगाया जाता है कि यह पेड़ बीमारियों वग़ैरा से आज़ाद होता और पर कोई कीड़ा-मकौड़ा नहीं लगता. इसलिए नीम को आज़ाद पेड़ कहा जाता है."
जब पश्चिमी देशों में नीम के गुणों के प्रति जानकारी बढ़ी और कुछ अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने नीम को कीटनाशक के विकल्प के रूप में देखा तो उसका पेटेंट करा लिया. भारत की पर्यावरणविद वंदना शिवा ने इसे जैव चोरी का नाम दिया और इसे चुनौती दी तो पेटेंट रद्द हो गया. वंदना शिवा कहती है, "नीम हमने इसलिए चुना क्योंकि कुछ अंतरराष्ट्रीय कंपनिया सबसे ज़्यादा इसी के पीछे पडी थीं और भारत में नीम की ज़रूरत हर इनसान को है." "नीम की सबसे ज़्यादा ज़रूरत किसान को है, क्योंकि अगर किसान के पास नीम के पेड़ नहीं हैं और नीम जैसे कीटनाशक नहीं हैं तो उसे महंगे कीटनाशक ख़रीदने पड़ते हैं." वंदना शिवा कहती हैं, "चालीस हज़ार से ज़्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली है क्योंकि उन्हें कीटनाशक इतने महंगे ख़रीदने पड़े की उसका क़र्ज़ वे नहीं चुका सके. इसलिए हमारे लिए नीम जीवित रहने का एक सहयोगी साधन है." "चूँकि नीम हर घर में है, हर आँगन में है और ये मानकर चलना की नीम पर किसी ख़ास कंपनी का अधिकार है, और हमें नीम का इस्तेमाल करने के लिए उन कंपनियों को धन देकर अनुमति लेनी होगी.यह बिल्कुल असहनीय है." वंदना शिवा अपनी मुहिम में सफल रहीं. यह पेटेंट रद्द हो गया. उनका तर्क है कि कोई कंपनी भला पारंरिक ज्ञान का पेटें कैसे करा सकती है. सुखी जीवन का अंग भारत में नीम का पेड़ ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग रहा है. लोग इसकी छाया में बैठने का सुख तो उठाते ही हैं साथ ही इसके पत्तों, निंबोलियों, डंडियों और छाल को विभिन्न बीमारियाँ दूर करने के लिए प्रयोग करते हैं. यह ऐंटीसैप्टिक की तरह इस्तेमाल होता रहा है.
नीम फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के डॉक्टर रमेश सक्सेना बताते हैं, "नीम त्वचा संबंधी बीमारियों के लिए बड़ा फ़ायदेमंद है. नीम के तेल से मालिश करने से विभिन्न प्रकार के चर्म रोग ठीक हो जाते हैं. नीम की पत्तियों को उबालकर और पानी ठंडा करके नहाया जाए तो उससे भी बहुत फ़ायदा होता है." "अब भी गाँवों और बहुत से शहरों में काफ़ी लोग नीम की दातून का इस्तेमाल करते हैं जो दाँतों को स्वस्थ और मज़बूत रखने में बहुत मदद करती है." डॉक्टर रमेश सक्सेना कहते हैं कि भारत में पहले तो कुछ लोग नीम की दातून इस्तेमाल करने को अंधविश्वास समझते थे लेकिन जब अमरीका में एक शोध हुआ कि नीम की छाल में ऐसे गुण होते हैं जो दाँतों और मसूढ़ों में लगने वाले तरह-तरह के वैक्टीरिया को पनपने नहीं देते हैं जिससे दाँत स्वस्थ और मज़बूत रहते हैं.
दिल्ली में रहने वाले सुभाष विद्यालंकार शुरू से नीम की दातून का प्रयोग करते रहे हैं. वह नीम के फ़ायदे गिनाते हुए कहते हैं, "मेरे दाँत बिल्कुल ठीक रहे हैं और अब मेरी आयु लगभग 78 वर्ष होने वाली है और अब भी मेरे दाँत पूरी तरह मज़बूत हैं, उनमें कोई बीमारी नहीं है, कोई कीड़ा वग़ैरा नहीं लगा है. ऐसा इसीलिए हो सका है कि नीम में जो कीटाणुनाशक तत्व होते हैं उससे दाँत मज़बूत रहे हैं." आयुर्वेदिक चिकित्सा में नीम का प्रयोग तरह-तरह से होता रहा है. चाहे चर्म रोग हो, पेट की तकलीफ़, खसरा, मधुमेह या दमा लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान नीम के ओषधीय गुणों को लेकर संदेह है." डॉक्टर अनीता नायर कहती हैं, "नीम को एक ऐसे पेड़ के रूप में पेश किया जा रहा है जो डायबटीज़ से लेकर एड्स, कैंसर और न जाने किस-किस तरह की बीमारियों का इलाज कर सकता है लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस पर ऐसे कोई नैदानिक परीक्षण किए गए हैं जो इसकी प्रभावशीलता प्रमाणित कर सके." डॉ रमेश सक्सेना का कहना है कि नीम पर व्यापक शोध हुआ है और अब बाज़ार में इसके ढेरों उत्पाद दिखाई देते हैं लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि इनके पेटेन्ट ले लिए जाएँ. भारत में नीम के कोई दो करोड़ पेड़ हैं. लेकिन अब अन्य देशों में भी इन्हे रोपा जा रहा है. ऑस्ट्रेलिया से लेकर ब्राज़ील तक नीम के बाग़ लगाए जा रहे हैं. चीन ने एक साल में कोई डेढ़ करोड़ पेड़ लगाए हैं. अगर भारत को अपने पारंपरिक ज्ञान का लाभ उठाना है तो इस दिशा में जल्दी क़दम बढ़ाना होगा. | इससे जुड़ी ख़बरें शराब नहीं, डीज़ल-पेट्रोल बनेगा महुआ से29 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस किसानों को भा रही है हर्बल खेती15 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस पेटेंट मामले पर बुनियादी सवाल अभी भी क़ायम09 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस नीम के पेटेंट का फ़ैसला भारत के पक्ष में 09 मार्च, 2005 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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