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सोमवार, 30 जनवरी, 2006 को 10:09 GMT तक के समाचार
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'गैस उत्सर्जन के गंभीर परिणाम'
आईसबर्ग
ब्रिटेन सरकार ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें कहा गया है कि ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के परिणाम उससे काफ़ी गंभीर हो सकते हैं जितना कि पहले सोचा गया था.

रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीनहाउस गैसों को ‘ख़तरनाक स्तर’ से नीचे रखने की संभावना कम ही है.

रिपोर्ट में ग्रीनलैंड में बर्फ़ की परत पिघलने की आशंका जताई गई है जिसके चलते 1000 सालों में समुद्रों का जल स्तर सात मीटर से बढ़ सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक़ इसका सबसे ज़्यादा असर दुनिया के ग़रीब देशों पर पड़ेगा.

 रिपोर्ट से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के नतीजे उससे कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं जितना हमने सोचा था
टोनी ब्लेयर, प्रधानमंत्री, ब्रिटेन

‘अवॉएडिंग डेंजरस क्लाइमेट चेंज’ नाम की इस रिपोर्ट में उन वैज्ञानिकों के सुबूतों को शामिल किया गया है जो फ़रवरी 2005 में हुए ब्रितानी मौसम विभाग के एक सम्मेलन में आए थे.

रिपोर्ट की प्रस्तावना में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने लिखा है “रिपोर्ट से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के नतीजे उससे कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं जितना हमने सोचा था.”

तापमान में बढ़ोतरी

तापमान बढ़ोतरी से पड़ने वाले प्रभाव पर रिपोर्ट में विशेष उल्लेख किया गया है.

विषेशज्ञ बिल हेयर लिखते हैं कि तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी कई प्रजातियों के लिए ख़तरनाक है.

तामपान वृद्धि का असर
विकसित और विकासशील देशों में फ़सलों की पैदावार कम
रुस और यूरोप में पैदावार में गिरावट
रेगिस्थान बनने से उत्तरी अफ़्रीका से लोगों का पलायन
अफ़्रीका में मलेरिया

इस रिपोर्ट से जुड़े कुछ वैज्ञानिकों को ये काम दिया गया था कि वे पता लगाएँ कि ग्रीनगैस हाउस गैसों की मात्रा में कितनी बढ़ोतरी से तापमान में ‘ख़तरनाक वृद्धि’ हो सकती है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में दो डिग्री की बढ़ोतरी से विकसित और विकासशील देशों में फ़सलों की पैदावार कम हो सकती है, रुस और यूरोप में खराब पैदावार की आशंका तिगुनी हो सकती है और करीब 2.8 अरब लोगों को पानी की किल्लत से जूझना पड़ सकता है.

विकल्प

2005 में हुए सम्मेलन में ये सवाल भी पूछा गया था कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में खतरनाक पदार्थों को कम करने के लिए क्या किया जाना चाहिए.

इस बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके लिए कुछ तकनीकी विकल्प हैं- जैसे बेहतर तरीके से ऊर्जा खर्च करना.

इसके अलावा आर्थिक विकल्प भी हैं जिसमें उत्सर्जन पदार्थों के व्यापार का विकल्प है.

लेकिन मुख्य मुद्दा ये है कि कितनी जल्दी इन विकल्पों को अपनाया जाता है और कितनी सरकारें ऐसा करती हैं.

नेदरलैंड की एक पर्यावरण एजेंसी के बर्ट मेट्ज़ और देत्लेव वैन कहते हैं, "सबसी बड़ी समस्या तकनीक या उसकी कीमत नहीं है, समस्य है इन विकल्पों को लागू करने में आने वाली राजनीतिक और सामाजिक बाधाएँ."

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