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सोमवार, 28 नवंबर, 2005 को 11:28 GMT तक के समाचार
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सम्मेलन में अमरीका की आलोचना
पर्यावरणविदों ने मॉन्ट्रियल संधि से ज़्यादा उम्मीद नहीं लगा रखी है
कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर में क्योटो संधि लागू होने के बाद जलवायु परिवर्तन पर पहला अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण शिखर सम्मेलन शुरु हो गया है.

अगले 12 दिन तक 180 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधि ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा कम करने के उपायों पर चर्चा करेंगे.

सम्मेलन के शुरु होते ही इन देशों के प्रतिनिधियों ने अमरीका की नीतियों को चुनौती दी है.

अमरीका पहले ही कह चुका है कि वह क्योटो संधि पर अमरीका की ओर से आगे कोई कदम उठाने के विषय पर किसी भी बहस का विरोध करेगा.

उधर अर्जेंटीना के पर्यावरण मंत्री गॉंज़ालेस गार्शिया ने कहा है कि यदि पर्यावरण को हमेशा के लिए नुकसान हो गया तो न तो आर्थिक विकास होगा, न ही ऊर्जा सुरक्षा होगी और न ही दीर्घकालिक लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की संभावन होगी.

साझा बयान की कोशिश

फ़रवरी में क्योटो संधि लागू होने के बाद यह पहला अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन है.

सम्मेलन में होने वाले विचार-विमर्श में अगले सात वर्षों के दौरान ग्रीन हाउस के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के उपायों के अलावा इसके बाद की अवधि के लिए नीतियों पर भी विचार-विमर्श होने की संभावना है.

कनाडा की सरकार इस बात का प्रयास कर रही है कि भावी उपायों से संबंधित एक साझा बयान पर हस्ताक्षर के लिए अमरीका और अन्य औद्योगिक देशों को राज़ी किया जा सके.

हालाँकि अमरीका के मुख्य वार्ताकार हार्लन वाटसन ने सम्मेलन शुरु होने से पहले बीबीसी को बताया कि वह कनाडा के प्रस्ताव का पुरज़ोर विरोध करेंगे.

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के बारे में बहुत पहले से कोई प्रतिबद्धता ज़ाहिर करना सही नहीं होगा.

अमरीकी उपस्थिति

उल्लेखनीय है कि क्योटो संधि में शामिल नहीं होने के फ़ैसले के कारण मॉन्ट्रियल सम्मेलन की वार्ताओं में अमरीका की औपचारिक भागीदारी नहीं रहेगी, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन संबंधी समझौते में शामिल होने के कारण मॉन्ट्रियल की चर्चाओं में उसके प्रतिनिधि उपस्थित रहेंगे.

भारतीय पर्यावरणविद सुनीता नारायण का कहना है कि जलवायु परिवर्तन पर मॉन्ट्रियल में होने वाले सम्मेलन से भारत जैसे विकासशील देशों को कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

बीबीसी हिंदी के एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए उन्होंने कहा कि विकसित देशों ने विकास के ग़लत तरीक़ों से दुनिया के पर्यावरण को चौपट कर दिया और अब वे भारत और चीन जैसे देशों पर चौपट पर्यावरण में सुधार लाने के लिए दबाव डाल रहे हैं.

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