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'मोबाइल फ़ोन से कैंसर का ख़तरा नहीं' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बड़े स्तर पर कराए गए एक अध्ययन के अनुसार मोबाइल फ़ोन का उपयोग करने वालों को कैंसर का ख़तरा होने की आशंका नहीं है. उल्लेखनीय है कि इससे पहले के कई अध्ययनों में यह पाया गया था कि मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल से 'एकाउस्टिक न्यूरोमा' का ख़तरा हो सकता है. एकाउस्टिक न्यूरोमा कान को दिमाग से जोड़ने वाली तंत्रिका में ट्यूमर के विकास को कहा जाता है. लेकिन ताज़ा अध्ययन में पाया गया है कि मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल के दौरान कम से कम पहले 10 वर्षों तक तो कैंसर का कोई ख़तरा नहीं है. हालाँकि विशेषज्ञ एहतियात के तौर पर अब भी मोबाइल फ़ोनों के सीमित इस्तेमाल की सलाह देते हैं. एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में एक अरब से ज़्यादा लोग मोबाइल फ़ोनों का इस्तेमाल करते हैं. व्यापक अध्ययन इंस्टीट्यूट ऑफ़ कैंसर रिसर्च के अध्ययन में पाँच यूरोपीय देशों के चार हज़ार से ज़्यादा लोगों को शामिल किया गया. ब्रिटेन, डेनमार्क, फ़िनलैंड, नॉर्वे और स्वीडन में किए गए इस प्रयोग मे एकाउस्टिक न्यूरोमा से पीड़ित 678 लोगों और 3,553 स्वस्थ लोगों को शामिल किया गया. अध्ययन में पाया गया कि मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल और एकाउस्टिक न्यूरोमा को ख़तरे में किसी तरह का संबंध नहीं है. इसमें एनालॉग और डिजिटल दोनों तरह के फ़ोनों और हैंड्सफ़्री किट को भी शामिल किया गया था. अध्ययन की रिपोर्ट में कहा गया है कि मोबाइल फ़ोन के एक दशक तक इस्तेमाल के बाद भी एकाउस्टिक न्यूरोमा की आशंका नहीं दिखती. हालाँकि और लंबे समय तक इस्तेमाल के किसी भी संभावित दुष्परिणाम के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. ब्रिटेन सरकार के लिए एक स्वतंत्र संस्था द्वारा कराए गए अनुभव में भी मोबाइल फ़ोनों के इस्तेमाल को ख़तरारहित पाया गया है. हालाँकि इस अध्ययन की रिपोर्ट में मोबाइल विकिरण से नुकसान की आशंका ज़रूर व्यक्त की गई है. |
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