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मोबाइल में क़ैद हुए बम धमाके | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लंदन में हुए बम धमाकों की पहली झलक मोबाइल फ़ोन में क़ैद की गई. भूमिगत रेल में सफ़र करने वालों ने इसके लिए अपने कैमराफ़ोन का इस्तेमाल किया. जल्दी ही ये तस्वीरें इंटरनेट और दुनिया भर के समाचार नेटवर्कों पर उपलब्ध थीं. यूरोप में वीडियो मोबाइल ख़ासे लोकप्रिय हो रहे हैं. इसके चलते लोग मीडिया के पहुँचने से काफ़ी पहले किसी घटना की वीडियो तस्वीरें खींच पाते हैं. लंदन की भूमिगत रेलों और एक डबल-डेकर बस पर हुए हमले में पचास से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. तस्वीरों की भरमार बम धमाकों के बाद से हज़ारों मोबाइल तस्वीरें और वीडियो उपलब्ध होने लगे थे. टीवी चैनलों और कई वेबसाइटों ने इन तस्वीरों का इस्तेमाल किया. कई लोगों का कहना था कि धमाकों के बारे में जानने और तस्वीरें देखने के लिए उन्होंने सबसे पहले वेबसाइट 'फ्लिकर' का इस्तेमाल किया. इसके बाद बीबीसी न्यूज़ और स्काई न्यूज़ की वेबसाइटों ने भी अपने पाठकों से तस्वीरें और वीडियो भेजने के लिए कहा. बीबीसी न्यूज़ वेबसाइट को क़रीब 1000 तस्वीरें और 20 वीडियो फुटेज मिले.शुरू में धुंए और कालिख से भरी रेल की तस्वीरें मिली और उसके बाद राहत कार्यों की तस्वीरें. पत्रकारिता की नई परिभाषा हालांकि लंदन की भूमिगत रेल से किसी को फ़ोन नहीं लगाया जा सकता लेकिन तस्वीरें और वीडियो फुटेज लिए जा सकते हैं. रिपोर्टिंग में मोबाइल के उपयोग से पत्रकारों और ग़ैर पत्रकारों के बीच का रिश्ता भी बदल रहा है. इसे ओपन-सोर्स पत्रकारिता कहा जा रहा है. पिछले साल अमरीका मे चले चुनाव अभियान और दिसंबर में आए सूनामी तूफ़ान में भी मोबाइल तस्वीरों का इस्तेमाल हुआ था. मोबाइल फ़ोन सिर्फ नेटवर्क के ज़रिए तस्वीरें भेज सकता है जबकि टेलीविज़न में उच्च तकनीक की ज़रूरत होती है. ये तस्वीरें ज़्यादा साफ़ नहीं होती लेकिन समाचार संस्थाओं का कहना है कि दर्शक समझते हैं कि इन्हें अफ़रा तफ़री में लिया गया है. मामलों की छानबीन में भी ये काफ़ी सहायक साबित हो रही हैं.लंदन में हुए हमलों की जांच के लिए भी मोबाइल वीडियो का उपयोग होगा. |
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