|
केवल दस हज़ार रूपए में कंप्यूटर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक कंप्यूटर वो भी चलता फिरता - मोबाइल – और दाम 10000 रूपए. यानी सारे ज़रूरी काम करने वाला ऐसा कंप्यूटर जो आम आदमी की पहुँच में हो और जिसे आप जहाँ चाहें साथ ले जा सकें. ऐसा ही एक कंप्यूटर बनाया गया है भारत में और जिसे बनाने में सरकार ने पहल की. 10 हज़ार रूपए वाला ये कंप्यूटर 800 ग्राम भारी है और बिजली से नहीं बैटरी से चलता है और आम आदमी की पहुँच के भीतर है. भारतीय वैज्ञानिकों की समझ बूझ और सरकार की मदद से इस कंप्यूटर को बनाया गया है और न सिर्फ़ सॉफ़्टवेयर बल्कि पूरा हार्डवेयर भी भारत में ही बना है. निर्माण बंगलौर की एक कंपनी एनकोर सॉफ़्टवेयर लिमिटेड ने इस कंप्यूटर का निर्माण किया है. कंपनी के अध्यक्ष और सीईओ विनय देशपाँडे का कहना है,"यह मोबाइल डेस्कटॉप कंप्यूटर है जिसे इस्तेमाल करना बहुत आसान है और इसमें सारे रोज़मर्रा के ज़रूरी काम किए जा सकते है." वे कहते हैं,"भारत में जहाँ कई गाँवों में बिजली की समस्या आज भी है वहाँ यह बहुत उपयोगी सिद्ध होगा क्योंकि यह बैटरी से चलता है." तो इस तरह के कंप्यूटर का विचार क्यों आया? वैज्ञानिक और औद्योगिक शोध परिषद सीएआईआर के प्रमुख डॉ आर ए माशेलकर का कहना है कि कंप्यूटर दो मुख्य ज़रूरतें पूरी करता है. उन्होंने कहा,"पर्सनल कंप्यूटर 25-50 हज़ार में मिलते हैं और उन्हें साथ ले जाना संभव नहीं है. यह कंप्यूटर सस्ता है और लोगों कहीं भी ले जाया जा सकता है." इंटरनेट का इस्तेमाल और वर्ड प्रोसेसिंग आदि आसानी से कर लेने वाला यह कंप्यूटर विडोज़ ऑपरेटिंग प्रणाली की जगह लिनेक्स पर काम करेगा जो काफ़ी किफ़ायती है. अभी कन्नड़ हिंदी और मराठी में भी इसका प्रयोग किया जा सकता है और अन्य भाषाओं में काम चल रहा है. कमी लेकिन एक बात जो खटकती है वो यह है कि इसमें मेमरी स्पेस कम है यानी डेटा जमा करने के लिए स्थान कम है. हालाँकि बाहर से मेमरी स्टिक लगाई जा सकती है, या हार्ड डिस्क जोड़ी भी जा सकती है. विनय देशपांडे का कहना है,"इसमें सॉलिड स्टेट है जिसे ‘फ़्लैश मेमोरी’ कहते हैं – 512 मेगाबाइट तक. लेकिन अगर बाज़ार देख कर ज़रूरत महसूस हुई तो 1 गीगाबाईट तक की मेमोरी लगा सकते हैं." डॉ. माशेलकर का मानना है कि आज ऐसे ही कंप्यूटर की ज़रूरत है और भारत की जनता इस कंप्यूटर क्रांति के लिए तैयार है. वे कहते हैं,"अगर आम आदमी के लिए कंप्यूटर नहीं बनाए जाएँगे तो तकनीक सिर्फ़ एक ख़ास तबक़े तक ही पहुँच पाएगी." तीन महीनों में यह कंप्यूटर बाज़ार में आने की उम्मीद है. इसके तीन मॉडल हैं. विनय देशपाँडे का कहना है कि सॉफ़कॉम मॉडल मोनिटर के साथ अभी बाज़ार में 10 हज़ार का बेचा जाएगा लेकिन अगर माँग बढ़ी तो कीमत साढ़े सात – आठ हज़ार तक भी कम की जा सकती है. क्षेत्रीय भाषाएँ कंप्यूटर मामलों के जानकार पत्रकार आशुतोष सिन्हा का कहना है कि यह कंप्यूटर तभी सफल हो सकता है जब सभी क्षेत्रीय भाषाओं में इसका उपयोग किया जा सके. उन्होंने कहा,"भारत में कंप्यूटर के फैलने के लिए सबसे अहम है कि स्थानीय भाषाओं में उसका इस्तेमाल किया जा सके." जनसाधारण तक कंप्यूटर ले जाने की ऐसी ही एक और कोशिश का नाम था सिंप्यूटर जो सफल नहीं हो पाया. उसे भी विनय देशपाँडे की कंपनी ने बनाया था लेकिन उनका कहना है कि सिंप्यूटर के उपयोग को लोगों ने ग़लत समझा और वो कभी भी व्यावासायिक रूप से बेचा नहीं गया. वे कहते हैं,"जो सिंप्यूटर के साथ हुआ वो इसके साथ नहीं होगा, अभी से हम कुछ कंपनियों के साथ बात कर रहे हैं और भारी संख्या में इसके लिए ऑर्डर आने भी लगे हैं." कोई भी तकनीक अपने आप में सफल नहीं होती, अगर लोगों के काम आए तो सफल कहलाती है. देखना ये है कि यह मोबाइल कंप्यूटर क्या भारत की आम आदमी की ज़िंदगी में शुमार हो पाएंगे. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||