|
सौर ऊर्जा से कंप्यूटर चलेंगे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में बिजली की भारी किल्लत को देखते हुए अब ग्रामीण क्षेत्रों के प्राइमरी स्कूलों में सौर ऊर्जा यानी सूरज की बिजली से कंप्यूटर चलाने की योजना है. उत्तर प्रदेश में बिजली का संकट इतना गंभीर है कि गाँव तो क्या शहरों में भी भारी कटौती होती है या फिर किसी न किसी तकनीकी ख़राबी से आपूर्ति में व्यवधान रहता है. एक अनुमान के अनुसार क़रीब 80 फीसदी घरों में बिजली नहीं है तो फिर प्राइमरी स्कूलों का सवाल ही कहाँ उठता है? कंप्यूटर शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पिछले साल सर्वशिक्षा अभियान के फंड से सभी 70 ज़िलों में क़रीब एक हजार प्राइमरी स्कूलों के लिए कंप्यूटर देने की योजना है. बच्चों को कंप्यूटर सिखाने के लिए अध्यापकों को विशेष रूप से प्रशिक्षण दिया गया. पढ़ाई के लिए मध्य प्रदेश सरकार का तैयार कराया हुआ कंप्यूटर कोर्स मंगा लिया गया. लेकिन यह सब करने के बाद भी ज़्यादातर स्कूलों में ये कंप्यूटर बंद पड़े हैं. कारण सिर्फ एक है कि बिजली नहीं मिलती. नया रास्ता वैकल्पिक ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव जीबी पटनायक का कहना है, "बिजली की जो स्थिति है, निश्चित रूप से हम नहीं कह सकते कि कंप्यूटर के लिए बिजली उपलब्ध रहेगी, इसलिए अब हमने एक कार्यक्रम बनाया है कि कंप्यूटरों को सौर ऊर्जा से चलाया जाए." एक स्कूल में कंप्यूटर भर चलाने के लिए सोलर पैनल पर क़रीब 70 हज़ार रुपए का ख़र्च आएगा, जबकि आजकल कंप्यूटर 25-30 हज़ार रुपए में मिल जाता है.
सर्वशिक्षा अभियान के अतिरिक्त निदेशक पार्थसारथी सेन शर्मा का कहना है कि धन की व्यवस्था वैकल्पिक ऊर्जा विभाग और सर्वशिक्षा अभियान के फंड से की जाएगी. "सौर ऊर्जा में शुरू में लागत भले ज़्यादा लगे, लेकिन चूँकि इसको चलाने का ख़र्च नहीं है, इसलिए दीर्घकाल में यह लागत ज़्यादा नहीं होगी." इधर शिक्षा और वैकल्पिक ऊर्जा विभाग स्कूलों में सौर ऊर्जा के लिए धन की व्यवस्था में लगे हैं, उधर बाराबंकी ज़िले में किसान अपने स्तर से ही सौर ऊर्जा के बहुआयामी प्रयोग में लगे हैं. देवा शरीफ़ के पास टिकरापट्टी गाँव के युवा किसान ज्ञानेश्वर वर्मा ने अब से 15 साल पहले शौकिया कंप्यूटर खरीदा था, ताश और शतरंज खेलने के लिए. फिर उन्होंने अपने विद्यालय में कंप्यूटर पढ़ाने के लिए एक और कंप्यूटर ख़रीदा. मगर विद्यालय में बिजली नहीं है. कंप्यूटर क्लास के लिए वह बच्चों को गाँव लाते है, पर अक्सर स्कूल समय में बिजली नहीं होती. ज्ञानेश्वर का कहना है कि अब गाँवों में भी कंप्यूटर शिक्षा की बड़ी माँग है. ज्ञानेश्वर सिविल इंजीनियरिंग कर चुके हैं और अपने "टेक्निकल" दिमाग़ से कुछ न कुछ नया जुगाड़ करते रहे हैं. ज्ञानेश्वर ने सोचा कि स्कूल परिसर में ही खेत की सिंचाई के लिए उन्होंने जो सोलर पंप लगा रखा है, उसकी बिजली से वह कंप्यूटर चला सकते हैं. "सोलर का जब सिस्टम फिट हो जाएगा, हमारा एसी कनवर्टर लग जाएगा तो कंप्यूटर चलाने में बड़ी सहूलियत होगी. इस तरह कंप्यूटर और पंखे चल जाएंगे तो विद्यालय का बड़ा विकास हो जाएगा." नियमों के मुताबिक सरकारी अनुदान से लगने वाले सोलर पंप का इस्तेमाल केवल सिंचाई के लिए हो सकता है. लेकिन सौर ऊर्जा किसानों और नौजवानों के लिए नए-नए रोज़गार का ज़रिया बन रही है. उदाहरण के लिए बाराबंकी ज़िले के ही उमरी गाँव के मंशाराम वर्मा सोलर पंप से बैट्री चार्ज करके सौ-डेढ़ सौ रुपए रोज़ कमा लेते हैं. इन बैट्रियों से गाँवों में लोग टीवी वग़ैरह चलाते हैं. सबसे पहले पंजाब के अमृतसर से आए सिख किसान शरमैल सिंह उत्तर प्रदेश के पहले ऐसे किसान हैं जिन्होंने सोलर पंप लगवाया. बाराबंकी के ही चक कोडर गाँव में शरमैल सिंह ने सोलर पंप का ऐसा बहुधंधी इस्तेमाल किया कि वैकल्पिक ऊर्जा विभाग दूसरे लोगों को प्रेरित करने के लिए उनके फार्म हाउस को आदर्श के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. शरमैल सिंह के मुताबिक सोलर पंप से बस फ़ायदे ही फ़ायदे हैं, "पानी बहुत कम क़ीमत पर मिलता रहता है और आत्मनिर्भर है."
"जब हम चाहें लगा लें. तालाब बनाया है, उसमें बत्तखें, मछलियाँ पालते हैं, उसमें भैंस नहाती हैं और इसमें कोई चखचख नहीं, कोई प्रदूषण नहीं, कोई भागदौड़ नहीं, ये हमारे लिए बहुत फ़ायदेमंद साबित हुई है." नए-नए प्रयोग करने के लिए पहले जो लोग शरमैल सिंह को शेख चिल्ली कहते थे अब वही उनको गाँधी कहते हैं. उनके बेटे रणजीत सिंह का कहना है कि सोलर पंप से उनके फार्म हाउस में रोशनी भी होती है, जैसे अपना पावर हाउस लग गया हो. वैकल्पिक ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव जीबी पटनायक का कहना है कि अकेले उत्तर प्रदेश में 27 लाख ट्यूबवेल डीज़ल से चलते हैं और छह लाख थर्मल बिजली से. पिछले साल ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई के लिए 109 सोलर पंप लगे थे. इस साल चार सौ सोलर पंप लगाने का लक्ष्य है. बसौली के किसान रूप नारायण सिंह का कहना है कि डीज़ल पंप से सिंचाई बहुत महंगी है इसलिए लोग सोलर पंप लगाना चाहते हैं. बैंक अब सोलर पंप लगाने के लिए कर्ज़ भी देने लगे हैं. लेकिन किसान अजीत सिंह का कहना है कि सोलर पंप का फ़ायदा वही उठा सकते हैं जिनके पास एक जगह पर ज़्यादा खेत हैं जबकि उत्तर प्रदेश में किसानों के पास खेत कम हैं और बिखरे हुए हैं. दूसरी बात ये कि यहाँ लोग खेत में घर बनाकर नहीं रहते इसलिए सोलर पंप की सुरक्षा भी एक मुद्दा है. वैकल्पिक ऊर्जा विभाग अभी तक सोलर कुकर, सोलर लालटेन, सोलर स्ट्रीट लाइट और सोलर वॉटर हीटर जैसे उपयोग को बढ़ावा देता रहा है. होटल, नर्सिंग होम, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और पाँच सौ वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल वाले आवासीय भवनों में सोलर वाटर हीटर लगाना अनिवार्य कर दिया गया है. लेकिन अगर सौर ऊर्जा को सामान्य बिजली में बदलने का प्रयोग कामयाब हो गया तो गाँवों और कस्बों में न केवल कंप्यूटर शिक्षा बल्कि दूसरे अनेक क्षेत्रों में भी रोज़गार पनप सकते हैं. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||