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गुरुवार, 05 मई, 2005 को 10:19 GMT तक के समाचार
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इंटरनेट जोड़ रहा है लोगों को

इंटरनेट
इंटरनेट से दुनिया भर से लोग किसी एक विषय पर चर्चा करने के लिए दोस्ती कर रहे हैं
हाल ही में छत्तीसगढ़ राज्य के बरनावपारा अभ्यारणय में 75 लोग मिले. उन्होंने तीन दिन साथ बिताया और सपनों का छत्तीसगढ़ कैसा हो इस पर चर्चा की.

एक मायने में यह बैठक विशिष्ट थी, यानी साधारण बैठकों से अलग.

इसकी ख़ास बात ये थी कि ये सारे लोग इस बैठक के पहले एक दूसरे से कभी मिले भी नहीं थे, हालांकि ये एक दूसरे को नाम से बख़ूबी जानते थे.

ये आपस में एक दूसरे को साइबर मित्र कहते हैं.

और यह संयोग ही था कि ये मित्र छत्तीसगढ़ पर बात करने के लिए जुटे थे वरना दुनिया के तमाम हिस्सों की तरह भारत में भी इंटरनेट ने लोगों को जोड़ा है और अब यह साइबर समाज भी बना रहा है.

गोष्ठी से सूचना तक

छत्तीसगढ़ के इस बैठक का आयोजन छत्तीसगढ़ नेट नामक एक इंटरनेट विचार गोष्ठी ने किया था.

छत्तीसगढ़ ईग्रुप
इंटरनेट के ज़रिए छत्तीसगढ़ से जुड़े मुद्दों पर चर्चा शुरु की नेट ग्रुप ने

इस समूह के मॉडरेटर शुभ्रांशु चौधरी कहते हैं, “पहले जैसे लोग हर शाम गाँव की चौपाल में मिला करते थे. अब चूंकि इंटरनेट की बदौलत ये दुनिया ही एक वैश्वविक गाँव में तब्दील हो चुकी है, हम चाहते हैं कि लोग एक बार फिर से आपस में बातचीत करना शुरू करें. जब तक लोग बाचतीत नहीं करेंगे उनकी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है.”

छत्तीसगढ़ की तरह की ई ग्रुप कई राज्यों के लिए बने हुए हैं और कई विषय विशेष पर चर्चा करने के लिए भी बने हुए हैं. मसलन बिहार, गोवा, झारखंड और उत्तरांचल के अपने अपने ई ग्रुप हैं. इसी तरह कुछ ग्रुप जंगल पर चर्चा करते हैं तो कुछ पंचायती राज पर और कुछ ई गवर्नेंस पर.

गोवा के ई ग्रुप के फ्रेडेरिक नरोन्हा कहते हैं, “गोवा में तो एक-एक गाँव के इंटरनेट ग्रुप हैं. और दूर दराज़ में बैठे लोग भी अब इंटरनेट की वजह से अपने गाँव की हर गतिविधि पर न सिर्फ़ नज़र रखते हैं बल्कि उन पर सक्रिए रूप से हिस्सा लेते हैं.”

इसी तरह उत्तरांचल की समस्याओँ पर बना उत्तराखंड विचार समूह पिछले तीन वर्षों से उत्तरांचल से जुड़े विषयों पर ई मेल पर बातचीत कर रहा है.

 इस उत्तराखंड ई मेल समूह में कभी तो हम यह संदेश डालते हैं कि मैं फलाँ दिन फलाँ जगह जा रहा हूं क्या वहाँ कोई उत्तरांचली है. अगर हैं, तो मैं उनसे मिलना चाहूँगा और इस तरह मैंने अनजान जगहों पर कई दोस्त बनाए हैं
श्रीधर राममूर्ति, उत्तराखंड ई ग्रुप

इस विचार समूह से शुरू से जुड़े श्रीधर राममूर्ति कहते हैं, “इस उत्तराखंड ई मेल समूह में कभी तो हम यह संदेश डालते हैं कि मैं फलाँ दिन फलाँ जगह जा रहा हूं क्या वहाँ कोई उत्तरांचली है. अगर हैं, तो मैं उनसे मिलना चाहूँगा और इस तरह मैंने अनजान जगहों पर कई दोस्त बनाए हैं."

"इसके अलावा हम विभिन्न गंभीर विषयों पर भी चर्चा करते हैं. हम जल्द ही उत्तरांचल की नई राजधानी पर चर्चा करने के लिए नैनिताल में इकट्ठे होने वाले हैं. हमने फ्राँस की एक संस्था के साथ मिलकर उत्तरांचल की आदर्श राजधानी का एक प्रारूप तैयार किया है और हम इस पर चर्चा को आगे बढ़ाना चाहते हैं."

अलग-अलग विषय

ऐसा नहीं है कि ये समूह सिर्फ़ इसी तरह की अमन चैन के दिनों की चर्चा करते हैं. वे संकट और उससे निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

अंडमान और निकोबार पर बने इसी तरह के एक ई मेल समूह ने हाल में आए सुनामी के समय जमकर काम किया.

इस समूह से जुड़े पंकज सेखसराय कहते हैं “मैंने अब सुनामी पर अंडमान पर आई सभी खबरों का एक संकलन तैयार किया है. इसे तैयार करने में मुझे अंडमान ई ग्रुप से जुड़े सदस्यों से भारी मदद मिली.”

 यह सूचना के आदान प्रदान का एक नया तरीका है
पार्थ प्रतिम सरकार

इस तरह के ई ग्रुप न सिर्फ़ राज्यों के आधार पर ही बने हैं, वरन् जंगल, वन्य पशु, रेडियो जैसे तमाम विषयों पर इस तरह के ई ग्रुप भारत में काम कर रहे हैं.

सूचना प्रोद्यौगिकी का ग्रामीण विकास में उपयोग कैसे हो, इस विषय पर बने एक ई ग्रुप बायटेसफोरल के पार्थ प्रतिम सरकार कहते हैं “अमरीका के काफी विश्वविद्यालयों के मीडिया विभाग के छात्रों को बायटेसफोरल का सदस्य बनकर इसे सीखने की सलाह दी जाती है. यह सूचना के आदान प्रदान का एक नया तरीका है और अमेरिकी प्रध्यापक यह चाहते हैं कि उनके छात्र यह सीखें.”

इंटरनेट
सूचना के आदान प्रदान का तरीक़ा तेज़ी से बदला है

सरकार आगे कहते हैं, "मैं बंगलादेशी नागरिक हूं पर मैं स्वयं को दक्षिण एशियाई मानता हूं. हमारे ई ग्रुप में आज 800 से अधिक सदस्य है जिसमें दक्षिण एशिया के सारे देशों के लोग शामिल हैं. चूंकि हमारी समस्याएँ एक जैसी हैं इसलिए उनके समाधान भी एक जैसे ही होंगे. हमें कभी यह नहीं लगता कि भारत की समस्या पर एक पाकिस्तानी की सलाह कैसे गलत हो सकती है."

इस तरह के ई ग्रुप से जुड़े लोगों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस तरह के प्रयोग बढ़ेंगे और इससे वे लोग भी आपसे में जुड़ सकेंगे जो या तो एक ही राज्य के मूल निवासी होंगे या फिर उनकी रुचियाँ एक जैसी होंगी.

वे कहते हैं कि इससे सामाजिक दायरा बढ़ेगा और समाज का हित ज़्यादा कारगर ढंग से सध सकेगा.

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