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भारी होता जा रहा है सूचना का जाल
इक्कीसवीं सदी में ई-मेल और इंटरनेट जैसे इलेक्ट्रॉनिक संचार के साधनों ने इंसान की ज़िंदगी का मतलब ही बदल दिया. मगर किसी भी चीज़ की अति हमेशा बुरी होती है. और ऐसा ही हो रहा है संचार के इन साधनों की इंसानी जीवन में दखलंदाज़ी के साथ.
डॉक्टर जैकब नील्सन का मानना है कि हालात ऐसे आ गए हैं कि कई बार लगता है जैसे इंसान कंप्यूटर को नहीं बल्कि कंप्यूटर इंसान को चला रहे हैं. उन्होंने इस स्थिति को 'सूचना प्रदूषण' का नाम दिया है और उनका कहना है कि अब वक़्त आ गया है कि कंप्यूटर को उसका 'असल स्थान' बता दिया जाए. स्थिति नब्बे के दशक में वर्ल्ड वाइड वेब आया और इंटरनेट ने अपना जाल फैलाना शुरू किया. मगर इस जाल ने इतनी सारी सूचनाएँ जुटा डालीं कि वह लोगों के लिए भारी हो गया.
जैकब नील्सन का कहना है,"सूचनाओं के भंडार का चरम सीमा पर पहुँच जाना ही सूचना प्रदूषण है." उनके अनुसार ई-मेल की समस्या और गंभीर है क्योंकि यह व्यक्तिगत और सामूहिक सूचना का एक अजीबोगरीब सा मिश्रण है. पिछले महीने मोबाइल फ़ोन बनानेवाली एक कंपनी ने अपने दफ़्तर में ई-मेल का प्रयोग ये कहते हुए बंद कर दिया कि फ़ोन ज़्यादा कारगर होते हैं. मगर जैकब नील्सन का कहना है कि ऐसा नहीं कि ये सारे साधन बुरे हैं. वे कहते हैं,"सही तरीक़ा ये है कि आप समझदारी से इन साधनों का इस्तेमाल करें." उनके मुताबिक़ एक ई-मेल अच्छी हो सकती है मगर जब सैकड़ों की संख्या में मेल आपके पास आने लगें तो लोगों को घुटन होने लगती है. सुरक्षा
डॉक्टर नील्सन के अनुसार अगर जल्दी इस समस्या से निबटने के कड़े उपाय नहीं निकाले गए तो कंप्यूटर कोई काम की चीज़ ना होकर समय की बर्बादी का एक साधन भर बनकर रहा जाएगा. उन्होंने इसके लिए ख़ासतौर से सैकड़ों की संख्या में बिना आमंत्रण के पहुँचने वाले ई-मेलों पर ध्यान देने की बात की. उन्होंने कहा,"मैं समझता हूँ कि इसके लिए हमें कोई क़ानून बनाना पड़ सकता है क्योंकि प्रदूषण करनेवालों को कटघरे में खड़ा किया जाना ज़रूरी है." साथ ही उनके अनुसार कोई सामूहिक मेल भेजते वक़्त ये ज़रूर सोचना चाहिए कि क्या वाकई इसे सबको भेजा जाना ज़रूरी है. उनका कहना है,"आपको उस व्यक्ति के वक़्त की क़द्र करनी चाहिए जिसे आप मेल भेज रहे हैं." डॉक्टर नील्सन की सलाह है कि अब वक़्त आ गया है कि कंप्यूटर ये तय करना बंद करे कि इंसान के समय को किस तरह कहाँ ख़र्च किया जाए. |
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