|
इंटरनेट क्रांति अब अंतरिक्ष में भी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया में धूम मचाने के बाद इंटरनेट अब अंतरिक्ष में भी जाने की तैयारी कर रहा है. इंटरनेट को जन्म देने वाले और इसी तरह के बहुत से प्रयोगों के लिए मशहूर विंट सर्फ़ यह सपना देख रहे हैं कि अब वह दिन दूर नहीं जब इंटरनेट अंतरिक्ष में भी धूम मचा देगा. विंट सर्फ़ अपनी यात्रा और सपना कुछ इस तरह बयान करते हैं- जब मैं कैलीफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था तो एक ऐसे कार्यक्रम से जुड़ा हुआ था जिसे एडवांस रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी या अरपा कहा जाता था. मेरा काम कंप्यूटरों के लिए सॉफ़्टवेयर लिखना था जिन्हें अंततः हमने 1969 में अरपानेट पर पेश कर दिया. 1973 में मेरे एक सहयोगी रॉबर्ट काहन ने उन तीन तकनीकी क्षेत्रों के बारे में बताया जिन पर वह काम कर रहे थे. वे क्षेत्र थे - अरपानेट, एक मोबाइल रेडियो प्रणाली और उपग्रह पर आधारित एक डाटा प्रणाली. काहन की समस्या यह थी कि इन तीनों प्रणालियों को किस तरह से जोड़ा जाए कि वे एक दूसरे के साथ मिलकर काम करें. हमने इस इंटर-नेट की समस्या क़रार दिया क्योंकि हम विभिन्न नेट प्रणालियों को एक दूसरे से जोड़ने की कोशिश कर रहे थे ताकि वे एक साथ मिलकर काम कर सकें. उस मुलाक़ात के क़रीब छह महीने के अंदर ही हमने एक ऐसी प्रणाली का बुनियादी ढाँचा तैयार कर लिया था जिसे आज की दुनिया में इंटरनेट के नाम से जाना जाता है. हमने इसका विस्तृत आधार 1974 में तैयार किया. इस तरह आज से क़रीब तीस साल पहले हमने इंटरनेट के बारे में विस्तृत पत्र प्रकाशित किया. तीस साल पहले जो हमने विस्तृत विवरण तैयार किया था उसी का बड़ा हिस्सा आज इंटर-नेट में इस्तेमाल होता है. अधूरा काम तब मैंने ख़ुद से एक सवाल पूछा, "हमने नेटवर्क स्थापित करने की प्रक्रिया में जो कुछ सीखा है क्या उसका कुछ और फ़ायदा नहीं उठाया जा सकता है?" ख़ासतौर से इंटरनेट के फ़ायदों को सौर प्रणाली के बारे में और जानकारी हासिल करने में इस्तेमाल किया जा सकता है. जब कोई अंतरिक्ष यान छोड़ा जाता है तो इस पर ऐसे बहुत से यंत्र लगे होते हैं जो बहुत सी चीज़ों के लिए संवेदी होते हैं जैसे कि फ़ोटोग्राफ़ी, खनिज या फिर किसी ग्रह पर मौजूद कोई और तत्व. हम यह तो कोशिश कर रहे हैं कि ग्रहों पर आख़िर क्या लेकिन उनकी सही जानकारी हासिल करने के लिए हमें संचार की ज़रूरत है. बस यहीं हम यह कोशिश कर रहे हैं कि अंतरिक्ष यानों की संचार प्रणाली में क्यों ना इंटरनेट जैसी तकनीक या प्रोटोकोल का इस्तेमाल किया जाए. अनोखी दुनिया कल्पना कीजिए कि जब अंतरिक्ष में इंटरनेट का इस्तेमाल होने लगेगा तो सबकुछ बदल जाएगा. मिसाल के तौर पर मंगल और पृथ्वी जब सूर्य की परिक्रमा के दौरान उसके सबसे नज़दीक आते हैं तो क़रीब साढ़े तीन सौ करोड़ मील की दूरी पर होते हैं. और जब सबसे दूरी पर होते हैं तो क़रीब साढ़े तेईस करोड़ मील की दूरी पर होते हैं. पहली अवस्था में पृथ्वी से प्रकाश सिगनल एक लाख 86 हज़ार मील प्रति सेकंड की रफ़्तार से मंगल गृह पर पहुँचने में पाँच मिनट का समय लगता है और दूसरी अवस्था में बीस मिनट. इस तकनीक के आधार पर यह उम्मीद की जा सकती है कि मंगल गृह से कोई तस्वीर सिर्फ़ बीस मिनट में हम तक पहुँच जाए यानी कि यह देखा जा सकता है कि मंगल गृह पर उतरा यान बीस मिनट पहले किस स्थान पर था. अगर आप उस यान को कहीं ले जाना चाहते हैं तो आप उसे मिसाल के तौर पर दाहिनी तरफ़ जाने का कमांड देंगे लेकिन वह यान अगले बीस मिनट तक आपका कमांड नहीं लेगा यानी इस पूरी प्रक्रिया में कुल समय लगेगा चालीस मिनट. ऐसे में अगर आपने इसे किसी ग़लत दिशा में निर्देशित कर दिया तो बीस मिनट में तो न जाने क्या कुछ हो जाए. इसलिए इतनी दूरी के वातावरण में अब और अभी जैसी कोई चीज़ फिलहाल नहीं है. परत दर परत यह परियोजना 1998 में शुरू हुई थी और इस दौरान हमने इस दिशा में काफ़ी प्रगति की है. हमने विभिन्न प्रोटोकोल की परतें परिभाषित करने में कामयाबी हासिल की है. इस तरह हम दो गृहों के बीच आपस में इंटर-नेट जैसा संचार संपर्क करने के मामले में बहुत दूर नहीं हैं और यही होगी अंतरिक्ष की दुनिया में इंटरनेट की क्रांति. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||