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मानव क्लोनिंग के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया के सबसे चर्चित विवादों में से एक, मानव क्लोनिंग पर संयुक्त राष्ट्र ने दो वर्ष की खींचतान के बाद प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पारित कर दिया है. संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव को मानने की कोई क़ानूनी बाध्यता देशों पर नहीं होगी. संयुक्त राष्ट्र ने क़ानूनी बाध्यता वाले एक प्रस्ताव पर सर्वसम्मति बनाने के बहुत प्रयास किए थे लेकिन सहमति नहीं बन सकी. 191 सदस्य वाली सभा में 84 सदस्य देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, 34 ने विरोध में और 37 सदस्य देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. मानव क्लोनिंग की दिशा में काम कर रहे ब्रिटेन ने प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट दिया जबकि अमरीका और दूसरे कैथोलिक देशों ने मानव क्लोनिंग पर रोक लगाने के पक्ष में वोट दिया. ये देश तो चिकित्सकीय कारणों से भी मानव क्लोनिंग करने के ख़िलाफ़ हैं. ब्रिटेन में चिकित्सकीय मानव क्लोनिंग पर तो काम हो रहा है लेकिन इसके अलावा मानव क्लोनिंग पर 2001 में प्रतिबंध लगा दिया गया था. इस प्रस्ताव पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री जॉन रीड ने कहा, "हम प्रतिबंध के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ थे क्योंकि हम मानते हैं कि चिकित्सकीय मानव क्लोनिंग से कई रोगों के निदान में सहायता मिलेगी." उन्होंने कहा, "यह बहुत शर्मनाक है कि संयुक्त राष्ट्र प्रजनन के उद्देश्य से किए जाने वाले मानव क्लोनिंग पर क़ानूनी बाध्यता वाला कोई प्रस्ताव पारित नहीं कर पाया, वह भी सिर्फ़ इसलिए कि कुछ देशों को चिकित्सकीय कारणों से क्लोनिंग करने के मामले में मनाया नहीं जा सका." उन्होंने कहा कि चूंकि प्रस्ताव क़ानूनी रुप से बाध्यकारी नहीं है ब्रिटेन चिकित्सकीय कारणों से मानव क्लोनिंग पर काम करता रहेगा. पहला प्रस्ताव मानव क्लोनिंग पर प्रतिबंध का पहला प्रस्ताव 2003 में आया था जिसे कोस्टारिका ने रखा था और जिसमें चिकित्सकीय सहित सभी तरह के मानव क्लोनिंग पर प्रतिबंध का प्रस्ताव था.
इस प्रस्ताव का अमरीका सहित 64 देशों ने समर्थन किया था. लेकिन बेल्जियम ने एक दूसरा प्रस्ताव भी रखा था जिसमें कहा गया था कि प्रजनन के लिए मानव क्लोनिंग पर तो प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए लेकिन चिकित्सकीय कारणों में मानव क्लोनिंग का फ़ैसला करने की स्वतंत्रता देशों को होनी चाहिए. लंबी चर्चा के बाद भी दोनों में से किसी भी प्रस्ताव पर मत विभाजन नहीं हो सका और पिछले नवंबर में तय किया गया कि क़ानूनी बाध्यता न रखने वाला एक प्रस्ताव तैयार किया जाएगा. फ़रवरी में संयुक्त राष्ट्र की एक समिति ने मौजूदा प्रस्ताव को पारित कर दिया था और ये फ़ैसला किया था कि इसे आम सभा के समक्ष वोट के लिए रखा जाए. |
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