| आँख की रौशनी के लिए नई किरण | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वैज्ञानिकों ने आँख की कुछ ऐसी कोशिकाएँ बनाने का दावा किया है जो प्रकाश के लिए बहुत संवेदनशील होती हैं और जिनसे कुछ तरह के अंधेपन का इलाज संभव है. लंदन के इंपीरियल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने मेनचेस्टर के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर मेलानोप्सिन नाम के एक प्रोटीन का अध्ययन किया है. वैज्ञानिकों के इस दल ने विज्ञान पत्रिकार नेचर को बताया कि आँख की कोशिकाएँ आमतौर पर इस प्रोटीन का इस्तेमाल नहीं करती हैं और अगर इस प्रोटीन को सक्रिय कर दिया जाए तो इससे कोशिकाएँ प्रकाश के लिए संवेदनशील हो जाती हैं जिसका मतलब है कि कुछ तरह का अंधापन ठीक हो सकता है. इन वैज्ञानिकों का कहना है कि इस खोज से उन लोगों को भी फ़ायदा हो सकता है जो रात होते ही अवसाद का शिकार हो जाते हैं. बीमारी मनुष्य की आँख के पिछले पर्दे को रेटिना कहते हैं. इसमें कुछ कोशिकाएँ होती हैं जिन तक प्रकाश पहुँचता है और उसी प्रकाश का विश्लेषण करके ये नज़र आने वाली चीज़ की शिनाख़्त करती हैं यानी देखने में सक्षम होती हैं. मनुष्यों में आँख की ज़्यादातर बीमारी रेटिना में ख़राबी की वजह से ही होती हैं. रेटिना में ख़राबी से उसमें प्रकाश का विश्लेषण करने की क्षमता नष्ट या कम हो जाती है. अभी तो इस तरह की बीमारियों का कोई ठोस इलाज नहीं है और एक बार अगर नज़र चली जाती है तो उसे वापस नहीं लाया जा सकता. अभी तक यही सोचा जाता रहा है कि आँख में सिर्फ़ छड़ या शलाका और शंकु नाम की दो तरह की कोशिकाएँ होती हैं जो तस्वीर को आँख से दिमाग़ तक पहुँचाती हैं. लेकिन अब इन वैज्ञानिकों ने चूहों पर किए प्रयोग में इन दोनों तरह की कोशिकाओं को नष्ट करके देखा कि रेटिना में कुछ अन्य कोशिकाएँ भी होती हैं जिनमें प्रकाश के लिए प्रतिक्रिया होती है यानी वे तस्वीर को दिमाग़ तक पहुँचा सकती हैं. कुछ अन्य वैज्ञानिकों ने इस पर कुछ संदेह व्यक्त किया है कि मेलानोप्सिन नामक प्रोटीन इन तीनों तरह की कोशिकाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो प्रकाश के लिए संवेदनशील होती हैं. इसलिए लंदन और मेनचेस्टर के इस वैज्ञानिक दल ने मेलानोप्सिन नामक इस प्रोटीन का विस्तार से अध्ययन और प्रयोग किए. लंदन सिटी यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रोन डगलस का कहना था कि हो सकता है इससे नज़र सुधारने में थोड़ी सी ही मदद मिले लेकिन यह एक शुरूआत तो होगी. लीड्स यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर क्रिस इंगलेहर्न का कहना था, "यह बहुत महत्वपूर्ण है. वे इस मुख्य प्रक्रिया में दाख़िल हो गए हैं कि क्या चीज़ किसी कोशिका को प्रकाश के लिए संवेदनशील बनाती है." उनका कहना था कि यह खोज आँखों के अलावा व्यापक महत्व की हो सकती है. |
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