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आँख में ख़ामी महानता में सहायक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वैज्ञानिकों का कहना है कि नज़र में ख़ामी होना किसी कलाकार के महानता तक पहुँचने का रहस्य हो सकता है. हारवर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों के एक दल का कहना है कि नीदरलैंड के मशहूर चित्रकार रेम्ब्राँ की एक आँख में ख़ामी थी या फिर ‘सुस्त’ थी. रेम्ब्राँ ने अपनी ख़ुद की जो तस्वीरें बनाई उनके विश्लेषण के बाद वैज्ञानिकों की राय है कि उनकी एक आँख सीधी थी जब कि दूसरी कुछ तिरछी थी. न्यू इंगलैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसन पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में इन वैज्ञानिकों ने दलील दी है कि रेम्ब्राँ को अपनी आँख में ख़ामी की वजह से दुनिया को सपाट या दो आयामों में देखने में मदद मिलती थी. पेंटिंग एक ऐसी विधा है जिसमें कलाकार दो आयामी कैनवस पर तीन आयामी विश्व का चित्रण करते हैं. आम तौर पर यह भी देखा जाता है कि कला अध्यापक अपने छात्रों को एक आँख बंद कर के अपनी विषय वस्तु को देखने को कहते हैं. इससे विषय वस्तु दो आयामी या सपाट जैसी दिखाई देती है और उसका चित्रण करना आसान हो जाता है. आँखों की सही रचना को स्टीरियोस्कोपिक विज़न भी कह जाता है. उससे विश्व को तीन आयामों में देखना संभव होता है. लेकिन हारवर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों के दल की प्रमुख मार्गरेट लिविंगस्टोन का कहना है कि इससे कलाकार को वस्तुओं का तीन आयामी चित्रण करने में दिक्कत होती है. फ़ायदा डॉक्टर लिविंगस्टोन और उनके दल के वैज्ञानिकों ने 17 वीं सदी के चित्रकार रेम्ब्राँ वैन रेयन के ऐसे 24 तैलचित्रों और 12 रेखाचित्रों का अध्ययन किया जिसमें रेम्ब्राँ ने अपनी ही तस्वीर बनाई थी. वैज्ञानिकों का कहना है कि रेम्ब्राँ की बाईं आँख में ख़राबी थी और लगता है कि यह सीध से 10 डिग्री खिसकी हुई थी. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस ख़ामी की वजह से चूँकि उन्हें अपनी विषय वस्तु सपाट जैसी दिखाई देती थी, इसलिए उसका चित्रण करना ज़्यादा आसान था. डॉक्टर लिविंगस्टोन का कहना है कि इससे एक बात तो तय है कि कलाकारों के लिए कुछ ख़ामिया काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होती हैं. |
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