अब ऐप से बनेंगे आपसी रिश्ते बेहतर!

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- Author, टिम मुगहन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
आप अपने ख़तों के जवाब ख़ुद ही लिखते हैं न? और घर-दफ़्तर के ई-मेल्स. पक्का आप ही लिखते होंगे. दोस्तों से चैट करते वक़्त भी ख़ुद ही बातें कहते होंगे आप! है न?
कई बार अपने लिखे ख़त में ही बाद में कमी महसूस हुई होगी. या फिर जो ई-मेल आपने भेजा, उसके बारे में आपने सोचा होगा कि कुछ कसर रह गई.
काश! कोई बता पाता कि इसे और बेहतर कैसे बनाया जा सकता था. क़रीबी दोस्तों से बातचीत में भी कई बार तनातनी हो जाती है.जिसके बाद लोग सोचते हैं कि काश! अपनी बात को वो और बेहतर ढंग से रख पाते तो ये बेवजह का तनाव न होता, रिश्तों में.
अगर हम आपको कहें कि इस काम में आपकी मदद के लिए ऐप बनाए जा रहे हैं, तो शायद आप यक़ीन न करें. मगर है ये पूरी तरह सच्ची बात.
चिट्ठी लिखने में, ई-मेल लिखने में, सोशल साइट्स पर बात करने में ख़ुद को कमतर पाने वाले लोगों को ये जानकर ख़ुशी होगी, कि ऐसे ऐप बनाने की कोशिशें हो रही हैं जो आपकी तरफ़ से जवाबी ई-मेल लिखेगा. आपके लिखे ई-मेल को बेहतर बनाने की सलाह देगा. अपनी गर्लफ्रैंड या ब्वॉयफ्रैंड से चैट करने में भी आपकी मदद करेगा.

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अमरीका के बोस्टन शहर की रहने वाली जोआन मैक्नील को ही ले लीजिए. मैक्नील को हमेशा लगता था कि वो अपने दिल के भाव ई-मेल में सही से नहीं बयां कर पाती थीं. कई बार वो कुछ ज़्यादा ही जोश दिखा जाती थीं. और अक्सर लगता था कि कसर रह गई.
कभी लगता था कि उन्होंने सामने वाले पर तंज कस दिया. और कई बार मैक्नील को ये भी लगा कि, कहीं सामने वाला ये न समझे कि उन्हें बातचीत में दिलचस्पी नहीं.
आज की ज़िंदगी में हम रूबरू कम ही बातें करते हैं. ज़्यादातर बातें, ई-मेल, चैटिंग, फ़ेसबुक, टेक्स्ट मैसेज या वीडियो चैटिंग के ज़रिए होती हैं.
तो हम इलेक्ट्रॉनिक तरीक़े से बतियाने में ये समझ ही नहीं पाते की हमने अपनी बात सही ढंग से रखी है या नहीं. कहीं सामने वाले को बुरा तो नहीं लगा? कहीं उसे यूं तो नहीं महसूस हुआ कि दिलचस्पी नहीं? हम-आप दिल ही दिल में ऐसे सवालों से जूझते रहते हैं.
अगर, इन सवालों से निजात दिलाने के लिए कोई ऐप बन जाए तो? आपकी कई मुसीबतों का हल चुटकी बजाते निकल सकता है न! ऐसा ऐप जो आपकी तरफ़ से दफ़्तर का या निजी ई-मेल लिख दे.

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तो क्या आप ऐसे किसी ऐप की मदद से मेल लिखना पसंद करेंगे? क्या आप किसी ऐप को ये हक़ देंगे कि वो आपको ये बताए कि किस दोस्त से ताल्लुक़ बेहतर करने की ज़रूरत है और किससे दूरी बनाने की? या फिर जब आप डेट पर जाएं तो ये ऐप बताए कि आप क्या बातें करें?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशते हुए जोआन मैक्नील ने जी-मेल के साथ एक प्लगइन फीचर डेवलप कर डाला. इसका नाम है 'इमोशनल लेबर'. ये आपकी मेल चेक करता है.
इसके बाद ये आपकी मेल को अपने तरीक़े से हेर-फेर करके, बेहतर बनाने की कोशिश करता है. जैसे पूर्ण विराम की जगह, ढेर सारे एक्सक्लेमेशन मार्क लगा देगा. बातचीत को ज़्यादा अनौपचारिक बनाने के लिए इमोजी का इस्तेमाल करेगा, वग़ैरह.
मैक्नील कहती हैं कि ये कुछ ज़्यादा ही हो गया. वो बातचीत में इतनी भी मिठास घोलने के हक़ में नहीं हैं. वो दिल और सितारों के इमोजी इस्तेमाल करने के हक़ में तो हैं. मगर इतना भी नहीं कि बात बनावटी लगने लगे.
मैक्नील एक ऐसा मुस्तक़बिल देख रही थीं, जिसमें कोई ऐप आपकी मेल लिखने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह अपने सिर पर ले लेगा. लेकिन 'इमोशनल लेबर' तो कुछ ज़्यादा ही इमोशनल हो गया.

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मैक्नील ने जब 'इमोशनल लेबर' ऑनलाइन बाज़ार में पेश किया, तो लोगों ने इसमें ज़बरदस्त दिलचस्पी दिखाई. वो कहती हैं कि उन्हें ख़ुद के बारे में ही लगता था कि दोस्तों को और दफ़्तर के साथियों को मेल लिखने का काम उन्हें नहीं आता.
लेकिन जिस तरह लोगों ने 'इमोशनल लेबर' को हाथो-हाथ लिया, उससे पता चला कि दुनिया में बहुत से लोगों को ऐसे ऐप की ज़रूरत है, जो उन्हें ई-ख़त लिखना सिखाए. जैसे कि किसी बीमार साथी को ई-मेल लिखा जाए तो उसमें हमदर्दी का भाव साफ़ झलके.
मैक्नील कहती हैं कि हमदर्दी जताने के लिए गिने चुने लफ़्ज़ ही हैं. ऐसे में 'इमोशनल लेबर' में लोगों की ज़बरदस्त दिलचस्पी थी. हालांकि वो मानती हैं कि अब लोग ऐसे ऐप के लिए तैयार हैं जो उनकी निजी बातचीत में दखल दे, उनकी मदद करे. ताकि वो सामने वाले से बेहतर ढंग से पेश आएं. अपनी बात सही तरीक़े से कह सकें.
वैसे भी कई बार लोग, मुश्किल ई-मेल लिखने के लिए दोस्तों की सलाह लेते ही हैं. कई बार बॉस के तगड़े मेल का जवाब लिखने में साथी काम आते हैं. और कई बार गर्लफ्रैंड के ई-मेल का जवाब देने के लिए भी दोस्तों की मदद ली जाती है. तो, इसके लिए एक ऐप ही क्यों न हो?

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कई बार मेल लिखते समय ज़ेहन में सवाल उठते हैं कि ऐसा कोई शब्द या वाक्य लिखें, जिससे मेरी दिलचस्पी तो ज़ाहिर हो, मगर ये न लगे कि कुछ ज़्यादा ही बेक़रारी है. कई बार कुछ बातों के सटीक जवाब नहीं सूझते तो, ऐप मददगार हो जाए तो क्या कहने!
कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर लॉरेन मैकार्थी भी जोआन मैक्नील की ही तरह ऐसे ऐप को डेवलप कर रही हैं. उन्होंने स्मार्टफ़ोन के लिए 'क्राउडपायलट' नाम से एक ऐप बनाया है, जो सिर्फ़ तजुर्बा करने के इरादे से बाज़ार में उतारा गया था.
'क्राउडपायलट' ऐप आपको किसी डेट पर जाने में मदद कर सकता है. डेट के दौरान क्या बात कहनी है और क्या नहीं कहनी, ये भी इस ऐप की मदद से जाना जा सकता है. असल में जब आप डेट पर गए होते हैं तो इस ऐप के ज़रिए कुछ लोग आपकी और आपके साथी की बातें सुन रहे होते हैं.
फिर वो इसी ऐप के ज़रिए आपको बताते हैं कि आपका बर्ताव कैसा है और आपको आगे क्या कहना और करना चाहिए. इस ऐप से आपके दोस्त भी जुड़े होते हैं और साथ ही कुछ ऐसे लोग भी जो आप से पूरी तरह अनजान होते हैं.

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इस ऐप के बारे में बताने के लिए मैकार्थी ने एक वीडियो भी बनाया है. इस ऐप को ऐप स्टोर से डाउनलोड भी किया जा सकता है. इसमें लोगों ने ज़बरदस्त दिलचस्पी दिखाई है. मैकार्थी कहती हैं कि उनका ऐप आपकी कई मुश्किलें दूर कर देता है.
मैकार्थी कहती हैं कि तकनीक ने इंसान की ज़िंदगी को कई मायनों में बेहतर बनाया है. तो संवाद के मोर्चे पर ही उसका इस्तेमाल क्यों न किया जाए.
मैकार्थी ने अपनी दोस्त काइल मैक्डोनाल्ड के साथ मिलकर ''यूएस प्लस'' नाम का ऐप भी बनाया है. ये वीडियो चैटिंग के दौरान आपकी मदद करता है. वो सामने वाले का चेहरा पढ़कर बताता है कि जिससे आप बात कर रहे हैं वो ख़ुश है या दुखी.
ये ऐप आपकी बातचीत सुनकर आपको बताता है कि आप सही तरीक़े से बात कर रहे हैं या उसमें सुधार की ज़रूरत है. कहीं आप कुछ ज़्यादा जोश में तो नहीं हैं. या फिर, कहीं आपकी बातों से बोरियत तो नहीं झलक रही है. अगर सामने वाला मुसीबत में है तो आप उससे सही तरीक़े से हमदर्दी जता पा रहे हैं या नहीं.
मैकार्थी और मैक्डोनाल्ड ने एक वीडियो के ज़रिए इस ऐप के इस्तेमाल का तरीक़ा बताया है. वो बताती हैं कि उनके ऐप को लेकर लोगों ने ज़बरदस्त दिलचस्पी दिखाई है. उन दोनों का इरादा तो ऐप को लेकर लोगों से सवाल करना था. मगर, लोगों ने तो उसे हाथो-हाथ लिया है.

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मैकार्थी और मैक्डोनाल्ड ने मिलकर महज़ तजुर्बा करने के लिए एक और ऐप तैयार किया है. इसका नाम ''पीपलकेपीआर'' है. ये आपके स्मार्टफ़ोन के जीपीएस डेटा और आपकी कलाई में बंधे वियरेबल, जैसे एपल वाच की मदद से आपके ताल्लुक़ात बेहतर करने में मदद करता है.
ये आपके दोस्तों के बारे में सलाह देता है. ये ऐप बताता है कि किस दोस्त से आपको अपने संबंध और बेहतर बनाने चाहिए और किससे दूर ही रहें तो अच्छा. ऐसे लोगों के नंबर और ई-मेल आईडी भी ये ऐप आपके फ़ोन से हटा देगा, जो आपको बोर करते हैं या ग़ुस्सा दिलाते हैं.
जब मैकार्थी और मैक्डोनाल्ड ने ये ऐप ऑनलाइन उतारा तो ज़बरदस्त बहस छिड़ गई. कई लोगों ने इसे तकनीक का इंसान की ज़िंदगी में कुछ ज़्यादा ही दखल बताया. तो कई लोगों को ये ऐप बहुत पसंद आया.
कई कंपनियों ने इस ऐप को और बेहतर बनाने और बाज़ार में उतारने के लिए पैसा लगाने की बात भी कही. तो कई डॉक्टरों ने इसे अपने मरीज़ों पर इस्तेमाल करने की इजाज़त भी मांगी. ऐसे इरादे से काम कर रही स्टार्ट अप कंपनियों ने मैकार्थी और मैक्डोनाल्ड को अपने साथ जुड़ने का ऑफर भी दिया.

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बहरहाल, मैकार्थी और मैक्डोनाल्ड इस बात पर ख़ुश हैं कि उनके ऐप से ये बहस आगे बढ़ी है कि तकनीक की मदद से हम बातचीत को बेहतर बना सकते हैं कि नहीं.
हालांकि हम तकनीक पर ज़्यादा निर्भर होते हैं तो बहुत से काम बढ़ भी जाते हैं. जैसे नए-नए ऐप्स की तलाश. लगातार फ़ोन का इस्तेमाल भी बढ़ जाता है. कुछ लोग कहते हैं कि दिमाग़ी मेहनत से तो आप बच जाते हैं, मगर ये डिजिटल काम तो बढ़ जाता है न.
हालांकि उम्रदराज़ लोग, तकनीक के इस्तेमाल को लेकर कुछ शंका में दिखे. उन्हें हिचक इस बात की थी कि कहीं तकनीक उन पर हावी न हो जाए. वहीं युवा पीढ़ी को नई तकनीक, नए ऐप्स आज़माने में कोई हिचक नहीं आई. वो ऐसे ऐप्स इस्तेमाल करने को तैयार हैं जो ई-मेल लिखने में, डेट पर बतियाने में, दोस्तों से रिश्ते सुधारने में मदद कर सकें.
इस तरह के कुछ ऐप बाज़ार में आ चुके हैं. जैसे 'क्रिस्टलनो़ज़'. ये ऐप आपके लिंक्डइन अकाउंट को बेहतर बनाने के नुस्खे बताता है. और कारोबारी साथियों से रिश्ते बेहतर करने के तरीक़े भी बताता है. लेकिन मैक्नील कहती हैं कि उन्होंने किसी को भी नियमित रूप से 'क्रिस्टलनो़ज़' ऐप इस्तेमाल करते नहीं देखा.

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हालांकि मैक्नील, इस तरह के ऐप के ख़िलाफ़ नहीं हैं. वो इनकी तुलना ज्योतिष से करती हैं. ज़्यादातर लोगों को पता होता है कि ज्योतिषीय भविष्यवाणी में कुछ भी सही नहीं है. फिर भी लोग अपनी कुंडली बांचते हैं, अपना भाग्यफल पढ़ते हैं. क्योंकि उन्हें इससे राहत मिलती है.
इसी तरह, आपसी संबंध बेहतर बनाने में मदद का दावा करने वाले ये ऐप भी आपकी कितनी मदद करेंगे, इसका आपको बख़ूबी एहसास होता है. मगर, इनमें आपको एक उम्मीद दिखती है.
कई बार आप जान-बूझकर इन पर भरोसा करना चाहते हैं. ये सोचकर कि मुश्किल कामों के लिए आपके पास कोई मददगार तो है. भले ही ई-मेल में शब्द आप ही लिखें, मगर ऐसा ऐप होने पर आपका हौसला बढ़ता है.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां <link type="page"><caption> क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160617-would-you-let-an-algorithm-manage-your-relationships" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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