बिजली के झटके ने बनाया पैरों को काम का

    • Author, जेम्स गालाघेर
    • पदनाम, स्वास्थ्य एवं विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

रीढ़ में बिजली के झटके के बाद सालों से लकवे के शिकार चार मरीज़ पहली बार अपने पैरों को चलाने में सक्षम हुए हैं.

अमरीकी चिकित्सकों ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि ये मरीज़ अपने पंजों, एड़ी और घुटने को घुमाने में समर्थ हो गए, हालांकि वे अकेले चलने में फिर भी असमर्थ थे.

ब्रेन नामक जर्नल में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बिजली के झटके ने मेरु रज्जु को मस्तिष्क से मिलने वाले संदेशों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाता है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि रीढ़ के चोट में यह इलाज का एक तरीक़ा हो सकता है.

मेरु रज्जु एक हाई स्पीड रेल लाइन की तरह काम करती है जो इलेक्ट्रिक संदेशों को मस्तिष्क से शरीर के अन्य हिस्से में लाता और ले जाता है.

लेकिन इस रास्ते में कोई भी बाधा पैदा होती है तो संदेश नहीं पहुंच पाता है.

कारगर इलाज

रीढ़ की चोट वाले लोगों में चोट से नीचे के हिस्से में हचलच और संवेदना ख़त्म हो जाती है.

लुईसविले विश्वविद्यालय और कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय की एक टीम चोट के नीचे के हिस्से वाले मेरु रज्जु में विद्युत उद्दीपन से होने वाले इलाज पर शोध में संलग्न रही है.

तीन वर्ष पहले टीम ने पाया कि रोब समर्स ट्रेडमिल के सहारे अपने पैरों को चला फिरा पाने में सक्षम हो गए थे.

समर्स बेसबॉल खिलाड़ी थे और एक कार दुर्घटना होने के कारण छाती के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था.

इसके अलावा दो साल से लकवाग्रस्त तीन अन्य मरीज़ों के साथ उसी प्रक्रिया को दोहराया गया तो उनके हिलने-डुलने में उसी तरह सुधार हुआ.

वे अपने पैरों को कुछ खास भंगिमाओं में नियंत्रित करने में सक्षम हो गए, लेकिन उनमें से एक मरीज़ गति के दबाव को नियंत्रित करने में सक्षम हो गया.

इससे स्पष्ट होता है कि लकवे के बाद भी शरीर की हरकत को पुनः प्राप्त किया जा सकता है और समर्स का मामला कोई अपवाद नहीं है.

उम्मीद

लुईसविले विवि से जुड़ीं शोधार्थी डॉ. क्लाउडिया एंजेली ने कहा, ''मांसपेशियों महत्वपूर्ण वृद्धि होती और उनकी गतिविधि में भी बदलाव दिखता है.''

अभी यह तय नहीं है कि यह उद्दीपन कैसे मदद करता है लेकिन शोधकर्ताओं को लगता है कि कुछ संदेश क्षति को भी पार करने में सक्षम होते हैं.

हालांकि वे इतने मज़बूत नहीं होते कि गतिविधि को शुरू कर सकें.

इन चार मरीज़ों में से आधे के पैरों में संवेदन था, लेकिन वे इन्हें चला फिरा नहीं सकते थे. जबकि अन्य दो के पैरों में कोई संवेदन नहीं था.

स्पाइनल रिसर्च संस्था के शोध निदेशक डॉ. मार्क बेकन का कहना है कि कुछ हद तक संवेदन रखने वाले लकवाग्रस्त मरीज़ों में विद्युत उद्दीपन से सुधार वाकई आश्चर्यजनक है.

उन्होंने कहा कि यह दिखाता है कि इन मरीज़ों में कुछ ऐसी नसें रह जाती हैं जो चोट की जगह को भी पार कर जाती हैं.

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