सर्जरी जहाँ मरीज़ सब देख रहा है पर होश में नहीं..........

जनरल एनेस्थीसिया बहुत से ऑपरेशनों का एक समान्य भाग है. लेकिन अगर आँखें बंद होने के बाद भी आप होश में रहें तो क्या हो?
आप एक ऑपरेशन थिएटर में हैं. एनेस्थीसिया शुरू हो चुका है और बेहोश होने की उलटी गिनती शुरू हो गई है.
बहुत से लोगों को इसके बाद जो अगली बात याद रहती है वह होती है एक गहरी नींद से जागना. लेकिन कुछ मामले ऐसे भी होते हैं जिनमें पूरी तरह से बेहोशी कभी आती ही नहीं.
सर्जरी के दौरान होश में आ जाना और फिर कुछ भी करने में नाकाम रहना किसी भी मरीज़ का सबसे बुरा डर होगा.
लेकिन ब्रिटेन के प्रमुख एनेस्थीस्टों के अनुसार सिर्फ ऐसा ही नहीं होता कि आदमी या तो होश में हो या बेहोश. इसके बीच में भी एक अवस्था होती है.
चेतना का तीसरा स्तर
ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय अस्पताल में परामर्श एनेस्थीस्ट प्रोफ़ेसर जयदीप पंडित मानते हैं कि इनके अलावा चेतना की एक अन्य "तीसरी अवस्था" भी होती है जो सोने और जागने के बीच की होती है. हो सकता है कि मरीज़ सामान्य एनेस्थीसिया के दौरान इसी अवस्था में चला जाए.
वो कहते हैं, "मैं इसे डाइसेनेस्थीसिया कहता हूं, एक ऐसी जागृति जिसमें मरीज़ को सर्जरी के बारे में पता तो होता है लेकिन वो न तो होश में होता है और न ही बेहोश."
हालांकि दुनिया भर में इसका इस्तेमाल होता है लेकिन फिर भी कोई नहीं जानता कि जनरल एनेस्थीसिया शरीर पर काम कैसे करता है.
एनेस्थीसिया एक जटिल काम है जिसमें सालों के प्रशिक्षण और कौन सी दवा, कितनी दी जानी है इसको ठीक से समझने की ज़रूरत पड़ती है.

फिर भी अनुमानतः 15,000 में से एक सर्जरी में मरीज़ ऐसी दशा को अनुभव करते हैं जिसमें उन्हें सर्जरी के विभिन्न आयाम होश में आने के बाद याद रहते हैं. इनमें से एक तिहाई को दर्द भी महसूस होता है.
जटिल सवाल
दरअसल यह सवाल कि कौन होश में है और कौन नहीं, दिमाग को चकरा देने की हद तक जटिल है.
लेकिन प्रोफ़ेसर पंडित उस चीज़ की पड़ताल कर रहे हैं जो इससे आगे की है. अर्थात् उस धुंधली अवस्था की जो होश और बेहोशी के बीच की है. वह इसे 'आइसोलेटेड फोरआर्म टेक्निक' नाम की पद्धति के ज़रिए दिखा पाते हैं.
इसमें अगर मरीज़ सर्जरी के दौरान होश में आ जाए तो वो अपना हाथ हिलाकर सर्जन को एलर्ट कर सकता है.
प्रोफ़ेसर पंडित ने इस तकनीक का इस्तेमाल कर इंसान की जागरुकता के चमत्कारिक पहलू दर्शाए हैं.

कई बार किए गए परीक्षणों में बेहोश लग रहे मरीजों ने निर्देश दिए जाने पर प्रयोगकर्ता की उंगली को अपनी सक्रिय बांह से दबा दिया. लेकिन उनमें से किसी ने भी खुद ही अपनी बांह हिलाकर यह नहीं बताया कि वो होश में हैं या सर्जरी के दौरान उन्हें दर्द हो रहा है.
प्रोफ़ेसर पंडित कहते हैं, "देखा जाए तो ये मरीज़ बेहोश हैं. लेकिन स्पष्टतः वह एक ऐसी अवस्था में हैं जहां वह मौखिक निर्देश जैसी चीज़ों पर प्रतिक्रिया कर सकते हैं लेकिन सर्जरी जैसी चीज़ पर नहीं. शायद इसलिए कि इससे उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती."
प्रोफ़ेसर पंडित के अनुसार इससे पता चलता है कि चेतना का तीसरा स्तर भी होता है.
लेकिन इस अवधारणा का विश्लेषण करना काफ़ी मुश्किल है.
दिमाग पर असर
सामान्यतः जब डॉक्टर एनेस्थीसिया के बारे में मरीज़ को समझाते हैं तो वह इसकी तुलना सो जाने से करते हैं. लेकिन हॉवर्ड मेडिकल स्कूल में एनेस्थीसिया के प्रोफ़ेसर डॉ एमोरी ब्राउन इसे तकनीकी रूप से ग़लत बताते हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "हमें सुरक्षित तरीके से आपकी सर्जरी करने के लिए एक प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी जो यकीनन काफ़ी आक्रामक और सदमे वाली होगी- इससे आप एक ऐसी अवस्था में पहुंच जाएंगे जो कोमा होगी और जिसे हम ख़त्म कर सकते हैं."
हालांकि जब दिमाग होश से बेहोशी की ओर जाता है तो उसमें क्या हो रहा होता है यह अभी तक साफ़ नहीं है.

साल 2011 में मैन्चेस्टर विश्वविद्यालय में एक शोध दल पहली बार यह देख पाया था कि एनेस्थीसिया के दौरान इंसानी दिमाग पर क्या असर होता है.
दिमाग की तस्वीर उतारने की एक नई तकनीक का इस्तेमाल कर शोधार्थियों ने दिमाग की थ्री डी तस्वीर बनाई. इससे पहले सामान्य ब्रेन स्कैन की 2डी तस्वीर ही बन पाती थी.
वह यह देख पाए कि जैसे-जैसे मरीज़ बेहोश होता है उसके दिमाग में क्या विद्युतीय हरकतें होती हैं.
मज़ेदार बात यह है कि जैसे ही मरीज़ बेहोश हुआ उसकी दिमागी हलचलें बढ़ कईं. इससे लगता है कि एनेस्थीसिया के प्रभाव में बंद होने की बजाय दिमाग और तेजी से काम करता है ताकि होश में आ सके.
लेकिन वैज्ञानिक अब भी यह नहीं समझ पाए हैं कि जब बेहोशी आती है तो दिमाग पर क्या असर पड़ता है.
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन हॉस्पिटल्स में एनेस्थीसिया सलाहकार डॉक्टर केविन फोंग कहते हैं, "हम इस वक्त भी यह नहीं बता सकते कि इंसानी चेतना क्या है, इसलिए ऐसी तकनीक ढूंढना जो इसकी अनुपस्थिति की निगरानी करे, मुश्किल है."
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