मिथ्या यादें क्यों समेटता है दिमाग़?

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मानवीय याददाश्त ख़ुद को दुनिया के अनुरूप ढालने के लिए निरंतर बदलती रहती है. अब एक आर्ट प्रोजेक्ट के ज़रिए यह जानने की कोशिश की जा रही है कि हमारी याददाश्त में क्या दोष हो सकते हैं.

हममें से हर किसी के दिमाग़ में मिथ्या यादें बनती हैं और आर्टिस्ट एलेस्डेयर होपवुड उनका संकलन कर रहे हैं.

पिछले एक साल से वो लोगों से अपनी मिथ्या यादों के बारे में बताने को कहते हैं और फिर उन्हें कला का रूप देते हैं.

इस बारे में लोगों के अनुभव अलग-अलग तरह के हैं. किसी ने कहा कि उसने बचपन में चूहा खा लिया था तो कोई कह रहा है कि वह बचपन में उड़ सकता था.

एक आदमी को यह ग़लतफ़हमी थी कि उसकी गर्लफ़्रेड की बहन की मौत दांतों के डॉक्टर से इलाज कराते समय हुई थी. उसका विश्वास इतना पक्का था कि वह दांतों के डॉक्टर के पास जाने के अपने सभी कार्यकर्मों को गुप्त रखता था.

यह कोई दुर्लभ मामला नहीं है. न्यूरो वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी कई दैनिक यादें ग़लत ढंग से बुनी हुई हैं क्योंकि दुनिया के बारे में हमारा दृष्टिकोण निरंतर बदलता रहता है.

मामूली संकेतों से यादों को ग़लत दिशा में मोड़ा जा सकता है.

प्रयोग

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एलिज़ाबेथ लॉफ्टस ने 1994 में एक प्रयोग किया था जिसमें वह एक चौथाई भागीदारों को इस बात के लिए मनाने में कामयाब रहीं कि बचपन में वे एक शॉपिंग सेंटर में खो गए थे.

साल 2002 में किए गए ऐसे ही एक अन्य प्रयोग में पाया गया कि आधे भागीदारों ने छद्म तस्वीरों को देखकर इस बात को मान लिया कि बचपन में उन्होंने गर्म हवा के ग़ुब्बारे की सैर की थी.

यह प्रयोग ब्रिटेन के वॉरविक विश्वविद्यालय की किम्बर्ली वेड ने किया था. होपवुड ने मौजूदा प्रोजेक्ट के लिए उन्हें गर्म हवा के ग़ुब्बारे की वास्तविक उड़ान में हिस्सा लेने के लिए कहा. इसी यात्रा के वीडियो और तस्वीरों को प्रदर्शनी में दिखाया गया है.

किम्बर्ली ने कहा कि वह इसके लिए बेहद उत्साहित थीं. उन्होंने कहा, "मैं एक दशक से भी अधिक समय से लोगों की याददाश्त का अध्ययन कर रही हूं. मेरे लिए यह अविश्वसनीय लगता है कि हमारी कल्पना हमें ऐसा कुछ सोचने पर मजबूर कर सकती हैं जो हमने कभी किया ही नहीं."

अधिकांश मामलों में मिथ्या यादें दैनिक परिस्थितियों से जुड़ी होती हैं जिसकी कोई वास्तविक परिणति नहीं होती है.

लेकिन कभी कभार इस मिथ्या याददाश्त के गंभीर परिणाम हो सकते हैं. उदाहरण के लिए अदालत में गवाही किसी के लिए सज़ा का कारण बन सकती है.

अपराध विज्ञान तकनीक ने ऐसे कई मामलों में फ़ैसलों को पलटा है. अमरीका में द इनोसेंस प्रोजेक्ट में उन लोगों की जानकारी दी गई है जो ग़लत पहचान का शिकार हुए लेकिन बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया.

परिणाम

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इसके मुताबिक़ अमरीका में 311 सज़ायाफ़्ता लोगों को डीएनए सबूतों की जांच के बाद निर्दोष क़रार दिया गया जिनमें से 18 को मौत की सज़ा मिली थी.

लंदन के गोल्डस्मिथ विश्वविद्यालय के क्रिस्टोफ़र फ्रेंच ने कहा कि इस बारे में अब भी जागरुकता का अभाव है कि ख़ासकर क़ानूनी मामलों में मानवीय याददाश्त कितनी अविश्वसनीय हो सकती है.

प्रोफ़ेसर फ्रेंच भी होपवुड की परियोजना से जुड़े हैं. उन्होंने कहा कि इससे मानवीय याददाश्त की अविश्वसनीयता के बारे में जागरुकता फैलाने में मदद मिलेगी.

होपवुड ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि लोग पूरी तरह से कल्पनीय घटना पर विश्वास कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, "दिलचस्प बात है कि लोग उन घटनाओं पर विश्वास करने लगते हैं जो उनके साथ कभी घटित ही नहीं हुई. यहां मुझे एक ख़ूबसूरत विरोधाभास दिखता है और ज़ाहिर है कि एक कलाकार होने के नाते इसमें मेरी दिलचस्पी है."

उपयोगिता

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एक अन्य शोधकर्ता के मुताबिक़ मानवीय मस्तिष्क की ग़लतियां कभी कभार उपयोगी भी हो सकती हैं.

ब्रिटेन के एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में न्यूरोसाइंटिस्ट सर्जियो डेला साला इसे एक उदाहरण देकर समझाते हैं. कल्पना कीजिए कि आप एक जंगल में हैं और आप देखते हैं कि घास हिल रही है. इससे आप यह सोचकर वहां से भाग जाएंगे कि वहां बाघ छिपा हो सकता है.

उन्होंने कहा कि एक कम्प्यूटर की नज़र से देखें तो 99 प्रतिशत संभावना यह है कि घास हवा के कारण हिल रही थी. लेकिन हम कम्प्यूटर की तरह सोचें तो बाघ हमें खा जाएगा.

प्रोफ़ेसर डेला साला ने कहा, "बाघ से हमें बचाने के लिए दिमाग़ 99 ग़लतियां करने को तैयार है. ऐसा इसलिए क्योंकि दिमाग़ कम्प्यूटर नहीं है. यह बेतुके अनुमानों पर काम करता है. इसमें ग़लतियां करने की प्रवृत्ति होती है और यह जल्दबाज़ी में रहता है."

उन्होंने कहा कि मिथ्या याददाश्त स्वस्थ मस्तिष्क की निशानी है. उन्होंने कहा, "वे याददाश्त प्रणाली के सहउत्पाद हैं जो अच्छी तरह काम करती है. इससे आप तेज़ी से अनुमान लगा सकते हैं."

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