अमरीका से लौटकर किसानों की ज़िंदग़ी सँवारने की कोशिश

- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ज़मीन से ज़्यादा से ज़्यादा उपज कैसे हासिल की जाए- इस बारे में काफ़ी काम कर चुके रिकिन गाँधी ने जवानी का लंबा समय तारों को ताकते हुए गुज़ारा था.
अमरीका में न्यूजर्सी के एक उपनगर में पले-बढ़े रिकिन के पिता एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे और माँ बैंक में थीं. जवान होते गाँधी फ़िलाडेल्फ़िया इंक्वायरर अख़बार और अंतरिक्ष के अन्य साहित्य में से अंतरिक्ष यात्रियों से जुड़े लेख काट-काटकर सहेज लेते थे.
स्कूल की पढ़ाई ख़त्म होते ही रिकिन ने अपने सपनों को साकार करने की कोशिश भी की.
उन्होंने पायलट की नौकरी के लिए अप्लाई भी किया, जिससे आगे चलकर उन्हें अंतरिक्ष यान पर जाने का मौक़ा मिल सके. मगर उनकी राह का रोड़ा बन गई उनकी आँख की एक छोटी सी दिक़्क़त जिसके लिए उन्हें लेज़र सर्जरी की ज़रूरत थी. इसके बाद वह ओरेकल के साथ एक सॉफ़्टवेयर प्रोजेक्ट पर कुछ साल काम करते रहे और अंतरिक्ष में अपने भविष्य के बारे में सोचते रहे.
गाँधी अब 31 साल के हो चुके हैं. वह कहते हैं, "मैं सोचता था कि जब अंतरिक्ष यात्री धरती पर वापस लौटते हैं तो उन्हें कैसा लगता होगा? मैंने उनकी जीवनियाँ फिर से पढ़ीं और पाया कि उनमें से कुछ दुनिया को ऊपर से देखकर सोचते थे कि दुनिया में इतने युद्ध क्यों होते हैं, इतनी ग़रीबी क्यों है? वापसी के बाद कुछ स्कूलों में टीचर बन गए या फिर असल दुनिया से जुड़ने के लिए किसान हो गए."
रिकिन गाँधी अंतरिक्ष यात्री तो नहीं बने मगर कुछ अंतरिक्ष यात्रियों की तरह किसानों के साथ काम ज़रूर करने लगे. इसके लिए वह अपने माँ-बाप की सरज़मीं पर लौटे. अब वह भारत में गाँवों के किसानों की ज़िंदग़ी बेहतर करने की कोशिश में लगे हैं.
डिजिटल ग्रीन्स
गाँधी एक स्वतंत्र ग़ैर सरकारी संगठन डिजिटल ग्रीन्स चलाते हैं, जहाँ उनके साथ 65 लोगों की टीम काम कर रही है. ये टीम जो कर रही है वो काफ़ी साधारण है: किसानों को इस बात के लिए प्रशिक्षित किया जाए कि वे अपने छोटे-छोटे वीडियो रिकॉर्ड कर सकें, जिसमें अपनी मुश्किलें रिकॉर्ड करें और उसके उपाय भी साझा करें.
वह किसानों को बैटरी से चलने वाले 10-12 हज़ार रुपए के छोटे प्रोजेक्टर भी उपलब्ध कराते हैं जिससे किसानों के छोटे-छोटे समूह बिना बिजली वाले गाँवों में भी वीडियो देख सकें.
सीधे-सीधे कहिए तो ये छोटा सा इनोवेशन काफ़ी सफल रहा है. गाँधी के मुताबिक़ शुरू होने के पाँच वर्षों के भीतर ही लगभग 1,50,000 किसान, सात राज्यों के 2000 से ज़्यादा गाँवों में, 20 अलग-अलग भाषाओं में 2,600 ऐसे वीडियो देख चुके हैं. यानी उन जगहों पर डिजिटल ग्रीन्स मौजूद है.
जिन लोगों ने ये वीडियो देखे हैं और उनसे सीखकर उन्हें अपनाया है उनमें से आधे से ज़्यादा महिलाएँ हैं.
अपने दिल्ली ऑफ़िस में लोगों से भरे एक कॉन्फ़्रेंस रूप में गाँधी ने बताया, "ये वीडियो किसानों ने, किसानों के लिए ही बनाए हैं. ये कई चीज़ों को दिखाते हुए वीडियो हैं, उनमें इंटरव्यू होते हैं और अक़सर उसमें स्थानीय संगीत भी होता है. ये किसानों को ही हीरो के तौर पर मुख्य भूमिका में दिखाते हैं, वही इसके प्रोड्यूसर होते हैं, इसके प्रदर्शक होते हैं और इस नए औज़ार से उनका सशक्तिकरण भी होता है. इससे भी ज़्यादा बड़ी बात ये है कि वे लोग खेती-किसानी की टेक्नॉलॉजी को बेहतर बनाने में मदद कर रहे हैं."
लोगों तक पहुँच

ये वीडियो आठ से 10 मिनट लंबे होते हैं और उसमें ऐसे सवालों के जवाब देने की कोशिश होती है जो किसानों के दिमाग़ को घेरे हों, जैसे- आप फ़सल का चुनाव कैसे करें? अपनी ज़मीन को कैसे तैयार करें, आप पौधे कैसे उगाएँ? बेहतर उपज के लिए उसमें से घास-फूस कैसे अलग करें? गाँधी बताते हैं कि सबसे ज़्यादा लोकप्रिय वीडियो वे होते हैं जिनमें किसान बिना आर्थिक ख़तरे वाली कुछ बातें सीख पाते हैं.
पानी में उगने वाला एक फ़र्न है अज़ोला, उसे उगाने का वीडियो काफ़ी लोकप्रिय है क्योंकि अज़ोला को जब गाय के चारे में मिलाया जाता है तो उससे गाय का दूध बढ़ जाता है. इसी तरह कीड़ों के इस्तेमाल से बनने वाली खाद का वीडियो भी किसान काफ़ी देखते हैं. साथ ही कैसे धान की खेती हो और ऑर्गेनिक खेती के वीडियो भी लोकप्रिय हैं.
गाँधी बताते हैं कि इससे कितना फ़ायदा हो रहा है ये समझने के लिए भी वे काफ़ी सघन रूप से काम करते हैं.
उनके मुताबिक़, "पिछले दो महीनों में जिन लोगों ने वीडियो देखे हैं उनमें से 40 फ़ीसदी लोगों ने उस वीडियो में दिखाए गए तरीक़ों में कम से कम एक तो अपनाया ही है."
जब आपका ध्यान इस तथ्य की ओर जाता है कि भारत के लगभग 60,000 गाँवों में रहने वाले भारतीयों में से आधे खेती कर रहे हैं और खेती अब भी भारत के सकल घरेलू उत्पाद में से 14 प्रतिशत का योगदान करता है, तब आपको गाँधी के प्रोजेक्ट की असली क्षमता का अंदाज़ा होता है.
गाँधी सबसे पहले भारत अपने एक दोस्त के साथ जठरोपा उगाने आए थे जिससे बायोडीज़ल बनता, मगर वो प्रोजेक्ट विफल हो गया.
इसके बाद उन्हें माइक्रोसॉफ़्ट रीसर्च ने नौकरी दी और फिर उन्होंने गाँवों में समय गुज़ारकर ये समझने की कोशिश की कि गाँवों में लोग प्रौद्योगिकी को कितने सहज रूप से स्वीकार करते हैं.
'अफ़सोस नहीं'
इसी बीच वह कोलंबिया विश्वविद्यालय से सतत विकास के क्षेत्र में डॉक्टरेट भी करने गए मगर 'वहाँ चीज़ें प्रायोगिक न होकर सैद्धांतिक थीं इसलिए छोड़ दिया'.
वह बताते हैं, "फिर मैंने सोचा कि अब ज़मीन से जुड़ी असली चीज़ों पर काम किया जाए."
इसलिए उनके अनुसार जब वह खेती से जुड़े वीडियो बनाने भारत के एक गाँव पहुँचे तो न तो किसी उम्मीद के साथ वहाँ गए थे, न ही पूर्वाग्रह के.
गाँधी कहते हैं, "मेरे लिए ये सब नया है. मुझे जिस बात ने भ्रम में डाला वो ये थी कि एक ही जगह पर किसान थे जो काफ़ी अच्छा कमा लेते थे जबकि पड़ोस का ही किसान परेशान था."
रिकिन गाँधी मानते हैं कि विकासशील दुनिया में डिजिटल इनोवेशन को ग़रीबों तक पहुँचना होगा जिससे उनकी ज़िंदग़ी में कुछ सार्थक बदलाव हो सकें.

उनके अनुसार, "पश्चिमी देशों में हम बहुत सी बातों को आम मान लेते हैं. फिर वो चाहे मज़बूत सरकारी तंत्र हो, वित्तीय व्यवस्था हो, बुनियादी ढाँचा हो या पूँजी. आपको भारत में हमेशा वो नहीं मिलेगा. इसलिए ज़रूरी है कि आप मौजूदा संगठनों, सरकारों, ग़ैर सरकारी संगठनों, निजी क्षेत्रों और स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर काम करें और टेक्नॉलॉजी को लोगों तक पहुँचाएँ."
डिजिटल ग्रीन्स के ज़रिए वह यही करना चाह रहे हैं. उनकी इस कोशिश को बिल और मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन से आर्थिक मदद भी मिली है और भारत सरकार भी सहायता दे रही है.
ख़ाली समय में साइंस फ़िक्शन पढ़ना पसंद करने वाले रिकिन बताते हैं कि वह ख़ुद बदलाव होते देख रहे हैं इसलिए सौभाग्यशाली हैं.
और अब तो उन्हें अंतरिक्ष यात्री न बन पाने का अफ़सोस भी नहीं है.
वह कहते हैं, "अब तो अंतरिक्ष कार्यक्रम उस तरह प्रभावी भी नहीं है", और फिर हल्के से मुस्कुरा देते हैं.
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