चींटी की तरह के रोबोट, लेकिन दिखने में नहीं!

अमरीका में वैज्ञानिकों ने ऐसे रोबोट तैयार किए गए हैं जो उसी तरह व्यवहार करते हैं जैसे चींटियाँ अपनी बस्तियों में करती हैं.
लेकिन ये देखने में किसी भी तरह असली चींटियों जैसे नहीं हैं.
यह छोटे-छोटे क्यूब या घन हैं जिनके पहियों को चलाने के लिए हाथघड़ी की दो मोटरों का इस्तेमाल किया गया है।
इन रोबोटों की प्रोग्रामिंग बेहद सरल है, जिसका मकसद बाधाओं को पार करते हुए लक्ष्य की ओर बढ़ने में एक-दूसरे की मदद करना है.
इसकी म़दद से रोबोट चीटियों की बस्ती रूपी भूलभुलैया में तेज़ी से रास्ता खोज़ सकते हैं.
प्लौस कम्प्यूटेशनल बायोलॉज़ी नामक जर्नल में प्रकाशित इस शोध में बताया गया है कि झुंड में एक-दूसरे का आभास कर लेने की काबिलियत के कारण ये रोबोट आसानी से अपना रास्ता खोज़ लेते हैं.
भोला-भाला
इस अध्ययन के शीर्ष शोधकर्ता न्यू जर्सी इन्स्टीच्यूट के सीमन गर्नियर ने बताया कि प्रत्येक रोबोट अपने आप में खूबसूरत और भोलाभाला है.
उनका कहना है कि उनकी याददाश्त और प्रोसेसिंग क्षमता सीमित है. अगर उनको उनके हाल पर छोड़ दिया जाए तो वे यूं ही घूमते रह जाएंगे और खो जाएंगे.
लेकिन वे एक-दूसरे के साथ मिलकर काम कर सकते हैं और संवाद कायम कर सकते हैं.
ऐसा इसलिए है क्योंकि चीटियों की तरह रोबोट भी एक निशान छोड़ते हैं, जिसका अनुसरण दूसरे रोबोट करते हैं.
इसके लिए शोधकर्ताओं ने प्रत्येक रोबोट के मार्ग की निगरानी करने के लिए कैमरा लगाया. इसके बाद कैमरे से जुड़े एक प्रोजेक्टर द्वारा नियमित अंतराल पर रोबोट के रास्ते पर प्रकाश-बिन्दु डाला गया.
रोशनी से सुराग
दूसरे रोबोट के उसी रास्ते पर आने की स्थिति में यह प्रकाश अधिक चमकदार हो जाता है.
डॉक्टर गार्नियर बताते हैं कि प्रत्येक रोबोट के शीर्ष पर दो एन्टीना हैं, जो प्रकाश को लेकर संवेदनशील हैं.
यदि उनके बायें सेंसर पर अघिक रोशनी गिरती है तो वे बाएं मुड़ जाते हैं, और यदि उनके दायें सेंसर पर अघिक रोशनी गिरती है तो वे दाएं मुड़ जाते हैं.
चीटियाँ भी ठीक ऐसा ही करती हैं.
ससेक्स विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी डॉ. पॉल ग्राहम ने बताया कि समस्याओं को सुलझाने या रोबोट डिजाइन करने की ऐसी कई अन्य शोध और इंजीनियरिंग परियोजनाएं हैं, जिनके लिए प्रकृति से प्रेरणा ली जा सकती है.












