अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर, गुजरात में कई फ़ैक्ट्रियों के बंद होने का ख़तरा

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- Author, गोपाल कटेशिया
- पदनाम, बीबीसी गुजराती
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
अमेरिका और इसराइल ने मिलकर ईरान पर हवाई हमले किए. इसके जवाब में ईरान ने भी इन दोनों देशों के ठिकानों पर हमले किए हैं. यह संघर्ष खाड़ी समेत दुनिया के कई देशों के लिए परेशानी का सबब बन गया है.
इस झगड़े की वजह से कई एयरलाइंस ने खाड़ी देशों के लिए अपनी फ्लाइट्स कैंसिल कर दी हैं, जिससे हवाई यात्रा बुरी तरह प्रभावित हुई है. समुद्र के रास्ते से भी खाड़ी देशों में सामान लाने-ले जाने या वहां से गुज़रने में भी रुकावट आई है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि खाड़ी देशों में झगड़े की वजह से समुद्र के रास्ते इंटरनेशनल ट्रेड में रुकावट का गुजरात के उद्योगों और बिज़नेस पर गंभीर असर पड़ेगा.
गुजरात के मोरबी में सिरेमिक उद्योग से जुड़े लोगों ने बीबीसी को बताया कि उन्हें डर है कि अगर झगड़ा कई और दिनों तक जारी रहा, तो मोरबी की सैकड़ों फैक्ट्रियां बंद करनी पड़ेंगी.
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खेती के सामान एक्सपोर्ट करने वाले ट्रेडर्स का कहना है कि उन्हें डर है कि अगर खाड़ी देशों का बड़ा मार्केट लंबे समय तक अस्थिर रहा, तो इसका चावल, चीनी, गेहूं और सिरेमिक टाइल्स वगैरह के एक्सपोर्ट पर बुरा असर पड़ेगा.
इस अस्थिरता का सीधा असर गुजरात समेत पूरे भारत के किसानों पर पड़ सकता है.
'सिर्फ़ तीन दिन का स्टॉक'

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मोरबी और सुरेंद्रनगर ज़िलों में सिरेमिक टाइल्स और सैनिटरी वेयर बनाने वाली 900 से ज़्यादा फैक्ट्रियां हैं.
यह भारत का सबसे बड़ा क्लस्टर है जो सिरेमिक टाइल्स और सैनिटरी वेयर आइटम बनाता है.
मोरबी सिरेमिक एसोसिएशन के पूर्व प्रेसिडेंट नीलेश जेतपरिया ने कहा, "ये फैक्ट्रियां हर साल लगभग बीस हज़ार करोड़ रुपये की टाइल्स और सैनिटरी वेयर आइटम एक्सपोर्ट करती हैं और इसका 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों को एक्सपोर्ट किया जाता है."
लेकिन मोरबी सिरेमिक एसोसिएशन में वॉल टाइल डिवीज़न के प्रेसिडेंट हरेश बोपलिया का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष से सिरेमिक इंडस्ट्री को गंभीर ख़तरा है, साथ ही इससे निर्यात में रुकावट भी आ रही है.
उन्होंने कहा, "मुख्य चिंता प्रोपेन गैस सप्लाई की है. आईओसी (इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन), बीपीसीएल (भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड) और रिलायंस वगैरह हमारे सप्लायर हैं. हमारे पास सिर्फ़ तीन दिन का स्टॉक है. अगर गैस नहीं मिली, तो कई फैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी."
नीलेश जेतपरिया ने कहा कि मोरबी की फैक्ट्रियां गुजरात गैस कंपनी से सप्लाई होने वाली प्रोपेन गैस और पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) से चलती हैं.
नीलेश जेतपरिया ने सोमवार को कहा, "प्रोपेन गैस सऊदी अरब और यूएई (यूनाइटेड अरब अमीरात) से आती है. सऊदी अरामको में ब्लास्ट के बाद वहां से प्रोपेन गैस आनी पहले ही बंद हो गई थी."
"अब अगर यूएई से भी ये सप्लाई बंद हो गई तो एक दिन में ढाई से तीन सौ फैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी, क्योंकि तेल कंपनियां आने वाले दिनों में प्रोपेन सप्लाई की गारंटी नहीं दे रही हैं और हमने 27 तारीख को ही गुजरात गैस को बताया था कि इस फैक्ट्री को पीएनजी दी जाए, लेकिन वहां से भी तुरंत कोई कन्फर्मेशन नहीं आया है."
जेटपारिया ने आगे कहा कि मोरबी में सिरेमिक फैक्ट्रियां हर दिन 45 लाख से 50 लाख क्यूबिक मीटर प्रोपेन गैस और 25 लाख क्यूबिक मीटर पीएनजी का इस्तेमाल करती हैं.
उन्होंने कहा कि मोरबी में हर सिरेमिक फैक्ट्री दस हज़ार क्यूबिक मीटर से बीस हज़ार क्यूबिक मीटर गैस का इस्तेमाल करती है.
उन्होंने आगे कहा, "एक और चिंता यह है कि अगर गैस की कमी होती है तो क्या साइन किए गए एक्सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट पूरे हो पाएंगे."
बीबीसी ने इस मामले पर गुजरात गैस से फ़ोन पर संपर्क किया, लेकिन तुरंत कोई जवाब नहीं मिला.
किसानों पर इसका क्या असर होगा?

भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने वर्ष 2024-25 में 73 लाख करोड़ रुपये मूल्य का सामान निर्यात किया.
इसमें से 14.74 लाख करोड़ रुपये यानी क़रीब 40 फ़ीसदी चावल एशियाई देशों को निर्यात किया गया.
इसमें से 4.81 लाख करोड़ रुपये का चावल खाड़ी देशों को निर्यात किया गया. यह देश के कुल एक्सपोर्ट का क़रीब 13 फ़ीसदी है.
भारत बड़े पैमाने पर खाड़ी देशों को चीनी, चावल, गेहूं, आलू, प्याज और दूसरी सब्जियां, फल और जानवरों का चारा निर्यात करता है.
राजकोट के बिजनेसमैन सागर चुग अपनी फर्म सागर इंटरनेशनल के जरिए खेती-बाड़ी के प्रोडक्ट्स के निर्यात के कारोबार में लगे हुए हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि भारत हर साल सात से आठ लाख टन चावल निर्यात करता है और इसका क़रीब एक तिहाई हिस्सा खाड़ी देशों में जाता है. फलों और सब्जियों का निर्यात ज़्यादातर हवाई रास्ते से और कुछ हद तक समुद्र के रास्ते मुंबई से रेफ्रिजरेटर जैसे कंटेनर में जाता है.
फलों और सब्जियों के अलावा दूसरी खेती की चीज़ें समुद्र के रास्ते एक्सपोर्ट की जाती हैं. ये सामान ज़्यादातर गुजरात के कच्छ ज़िले के मुंद्रा और कंडला पोर्ट से भेजा जाता है.

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मुंद्रा में आशुतोष कंटेनर फ्रेट स्टेशन के डायरेक्टर भावेन ठक्कर ने बीबीसी को बताया, "मुंद्रा पोर्ट से एक बार में तीन से चार हज़ार कंटेनर में सामान लोड करके जहाज़ से खाड़ी देशों में भेजा जाता है."
"कंडला पोर्ट से भी खाड़ी देशों में बल्क कार्गो (खुला सामान जो बंडल या बॉक्स में पैक न हो) के रूप में गेहूं, चावल, जानवरों का चारा वगैरह एक्सपोर्ट किया जाता है, लेकिन जहाज़ चलाने वाली ज़्यादातर कंपनियों ने खाड़ी देशों के लिए अपने रूट रोक दिए हैं. इस वजह से कंटेनर फंस गए हैं।"
फ्रेट स्टेशनों पर, विदेश भेजने के लिए सामान कंटेनर में लोड किया जाता है और इकट्ठा करके जहाज़ों पर लोड किया जाता है, या विदेश से ऑर्डर किए गए कंटेनर को पोर्ट पर उतरने के बाद आयातकों को सौंपने के लिए एक साथ कर दिया जाता है.
राजकोट के हरीश लखानी मुख्य रूप से चीनी और कैस्टर ऑयल के निर्यात का काम करते हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "अमेरिका-ईरान लड़ाई का भारतीय किसानों पर तुरंत कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि सपोर्ट (सब्सिडी) है. भारत में चीनी की क़ीमतें अभी भी इंटरनेशनल मार्केट से ज़्यादा हैं, लेकिन चावल के व्यापार पर असर पड़ सकता है. ईरान हर साल भारत से करीब 10 लाख टन चावल इंपोर्ट करता है."
उनका कहना है, "इसमें से तीन से चार लाख टन का पेमेंट अभी बाकी है. यह चिंता की बात है. इस अस्थिरता की वजह से 1121 वैरायटी के बासमती चावल की कीमत भी छह से आठ रुपये प्रति किलोग्राम तक गिर गई है."
मुंद्रा और कंडला में क्या स्थिति है?

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अमेरिका और इसराइल के हवाई हमलों के बाद ईरान ने जहाजों को होर्मुज़ जलडमरूमध्य से दूर रहने की चेतावनी दी है.
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी का एक व्यस्त जलमार्ग है. होर्मुज जलडमरूमध्य अरब की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है, जो अरब सागर में खुलती है.
इराक़, कुवैत, क़तर, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों की सीमाएं फारस की खाड़ी से लगती हैं.
समुद्री व्यापार के लिए फारस की खाड़ी ही उनका एकमात्र जलमार्ग है.
सऊदी अरब के कुछ बंदरगाह लाल सागर में हैं, लेकिन कुछ दूसरे बंदरगाह अरब की खाड़ी में भी हैं.
इराक़ खाड़ी के पश्चिमी किनारे पर है, जबकि बाकी सभी देश दक्षिणी किनारे पर हैं. खाड़ी का पूरा उत्तरी किनारा ईरान का है.
फेडरेशन ऑफ़ कच्छ इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के मैनेजिंग डायरेक्टर निमिष फड़के ने बीबीसी को बताया कि भारत से एक्सपोर्ट होने वाला लगभग 35 फ़ीसदी सामान गुजरात के पोर्ट से भेजा जाता है, और सबसे बड़े पोर्ट कंडला और मुंद्रा पोर्ट हैं, लेकिन खाड़ी देशों में टकराव ने एक्सपोर्ट मार्केट में बहुत अनिश्चितता पैदा कर दी है.
निमिष फड़के ने कहा, "मौजूदा युद्ध के हालात के कारण, फारस की खाड़ी और रेड सी कॉरिडोर में जहाज चलाना खतरनाक हो गया है."
"इस बात की चिंता है कि वहां जाने वाले पांच से सात कंटेनर तय पोर्ट तक पहुंच पाएंगे या नहीं."
"भारत से एक्सपोर्ट होने वाला और विदेशों से भारत में इंपोर्ट होने वाला क़रीबह 35 फ़ीसदी सामान गुजरात के पोर्ट से इंपोर्ट और एक्सपोर्ट होता है, लेकिन टकराव के कारण इस बारे में अनिश्चितता पैदा हो गई है."
शिपिंग उद्योग का क्या हाल है?

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गुजरात की ट्रांसनेशनल शिपिंग लाइन प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर हितेश बेलानी ने कहा, "गल्फ देशों में लड़ाई की वजह से एक्सपोर्ट का काम रुक गया है, क्योंकि शिपिंग कंपनियों को यह स्पष्ट नहीं है कि वे फारस की खाड़ी के पोर्ट्स तक जा पाएंगी या नहीं."
"इसके अलावा, ओमानी पोर्ट्स पर सामान उतारकर ज़मीन के रास्ते गल्फ देशों तक पहुंचाया जा सकता है, लेकिन ओमान पर भी हमले हुए हैं, इसलिए इस रास्ते को लेकर भी चिंताएं हैं."
"यह रुकावट ऐसे समय में आई है जब हर कोई मार्च के अपने ऑर्डर पूरे करने की जल्दी में है."
नरेंद्र ठाकर कंडला और मुंद्रा पोर्ट्स से इंपोर्टर्स और एक्सपोर्टर्स को कस्टम क्लीयरेंस सर्विस देने का काम करते हैं.
उनका कहना है कि उनके क्लाइंट्स के कंटेनर भी फंसे हुए हैं.
उन्होंने कहा, "आज चावल के कुछ कंटेनर की बुकिंग थी, लेकिन शिपिंग कंपनी ने खाली कंटेनर नहीं भेजे हैं. इसके अलावा, शिपिंग कंपनियों ने बताया है कि युद्ध जैसे हालात के कारण यूएई सरकार ने देश के बंदरगाहों से आने और जाने वाले कंटेनरों पर दो हज़ार अमेरिकी डॉलर प्रति कंटेनर का इमरजेंसी कॉन्फ्लिक्ट सरचार्ज लगाया है."
"इसलिए शिपिंग कॉस्ट छह गुना बढ़ गई है. मुंद्रा से दुबई तक शिपिंग कॉस्ट चार सौ अमेरिकी डॉलर है, लेकिन अब दो हज़ार डॉलर के सरचार्ज के साथ यह 2400 डॉलर हो गई है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












