सीओपी27: दुनिया के अमीर मुल्क ग़रीब देशों को किस बात के लिए मजबूर कर रहे हैं

फिलीपींस, वेमको समुद्री तूफ़ान, समुद्री तूफ़ान

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इमेज कैप्शन, फ़िलीपींस के एक इलाके में आए समुद्री तूफ़ान 'वेमको' के बाद मलबे से गुज़रता हुआ एक परिवार
    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, बीबीसी पर्यावरण संवाददाता

मिस्र में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर हो रही बैठक 'सीओपी27' में जिन दो शब्दों का बोलबाला हो सकता है, वो हैं - 'नुक़सान और क्षति'.

लेकिन इन दोनों शब्दों का अर्थ क्या है और इन पर बहस क्यों हो रही है.

जलवायु परिवर्तन पर अब तक जो भी वार्ताएं हुई हैं, वो ग्रीन हाउस गैसों को कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से बचने के तरीके तलाशने पर केंद्रित रही हैं.

लेकिन इस साल की बैठक में एक तीसरे मुद्दे पर चर्चा हो सकती है.

क्या औद्योगिकीकरण का फ़ायदा उठाने वाले देशों, जिनकी जलवायु परिवर्तन में बड़ी भूमिका रही है, उन देशों को आर्थिक भुगतान करना चाहिए जो जलवायु परिवर्तन से सीधे रूप से प्रभावित हो रहे हैं.

जलवायु परिवर्तन की वजह से बाढ़, सूखा, समुद्री तूफ़ान, भूस्खलन और जंगलों में आग जैसी आपदाओं की संख्या और उनके असर में बढ़ोतरी होती जा रही है.

और इन आपदाओं के शिकार होने वाले देश इनसे उबरने के लिए आर्थिक मदद मांग रहे हैं.

इस शब्द युग्म 'नुक़सान और क्षति' का यही मतलब है.

ये शब्द युग्म आर्थिक नुक़सान जैसे घरों, ज़मीन, खेतों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को होने वाले नुक़सान के साथ -साथ ग़ैर-आर्थिक क्षति जैसे इंसानों की मौत, सांस्कृतिक स्थानों और जैव-विविधता की क्षति को बयां करता है.

बाढ़ से निकलने की कोशिश करता एक पाकिस्तानी परिवार
EPA-EFE/REX/Shutterstock
'नुकसान और क्षति क्या है?'

  • नुकसानसे आशय रिहाइशी इलाकों, खेतों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को होने वाले आर्थिक नुकसान से है.

  • क्षतिसे आशय इंसानों की मौत, सांस्कृतिक विरासतों की हानि और जैव-विविधता की क्षति से है.

UNFCC

'नुक़सान और क्षति' पर बातचीत के लिए तैयार

छह नवंबर को सीओपी27 शुरू होने से पहले दो दिन में हुई गहन बातचीत के बाद डेलिगेट्स इसे आधिकारिक एजेंडे में शामिल करने के लिए राज़ी हुए हैं.

ग़रीब देश जिस राशि की मांग कर रहे हैं, वो क्लाइमेट फ़ाइनेंसिंग के तहत तय हुई 100 अरब डॉलर की राशि से अलग है.

समृद्ध देश ग़रीब देशों को बदलती हुई जलवायु के साथ ढलने एवं ग्रीन हाउस गैसों को कम करने के लिए हर साल 100 अरब डॉलर की राशि देने के लिए तैयार हुए हैं.

क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क इंटरनेशनल (एनजीओ) से जुड़े वैश्विक राजनीतिक रणनीतिकार हरजीत सिंह बताते हैं, "आम लोग भयानक तूफ़ानों और बाढ़ के साथ-साथ पिघलते ग्लेशियरों की वजह से होने वाला 'नुक़सान और क्षति' उठा रहे हैं.

और विकासशील देशों में रहने वाले लोगों को एक आपदा का शिकार बनने के बाद दूसरी आपदा आने से पहले उबरने के लिए पर्याप्त मदद भी नहीं मिल पाती है वो समुदाय जो इस संकट के लिए सबसे कम ज़िम्मेदार हैं, उन पर इनका सबसे ज़्यादा असर पड़ रहा है.''

हरजीत सिंह
IISD
वो समुदाय जो इस संकट के लिए सबसे कम ज़िम्मेदार हैं, उन पर इनका सबसे ज़्यादा असर पड़ रहा है.
हरजीत सिंह
वैश्विक राजनीतिक रणनीतिकार, कैन इंटरनेशनल

'नुक़सान और क्षति' के लिए कितना हर्जाना?

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जलवायु परिवर्तन से होने वाले 'नुक़सान और क्षति' के लिए हर्जाने की गणना करने के लिए दुनिया भर में सौ से ज़्यादा शोधार्थी और नीति-विशेषज्ञ काम कर रहे हैं.

इन विशेषज्ञों के समूह 'लॉस एंड डैमेज़ कॉलेबोरेशन' ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से जोख़िमपूर्ण स्थिति में बनी हुई अर्थव्यवस्थाओं में से 55 अर्थव्यवस्थाओं को साल 2000 से 2020 के बीच जलवायु परिवर्तन की वजह से एक ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक नुक़सान हुआ है.

अगले दशक में इस नुक़सान में आधा ट्रिलियन की बढ़त हो सकती है.

जानवरों के कंकाल, मृत जानवर

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इस रिपोर्ट के लेखक बताते हैं, "जलवायु के मौजूदा स्तर में अंशमात्र वृद्धि होने का भी मतलब जलवायु परिवर्तन के प्रभाव में अतिरिक्त बढ़ोतरी है. विकासशील देशों में 2030 तक जलवायु परिवर्तन से होने वाला आर्थिक नुक़सान 290 से 580 अरब डॉलर तक होने की आशंका है."

दुनिया पहले ही जलवायु में औद्योगीकरण से पहले की तुलना में औसत 1.1 डिग्री सेल्सियस की बढ़त देख चुकी है.

ग़रीब और कम औद्योगिक देश कहते हैं कि भीषण मौसमी घटनाओं की वजह से उन्होंने जो कुछ प्रगति की है, उस पर पानी फिर जाता है.

कुछ देश कहते हैं कि वे क़र्ज़ तले दब चुके हैं और उन्हें जो नुक़सान और क्षति हुई है, उसकी भरपाई के लिए क़र्ज़ लेना पड़ रहा है.

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कब से चल रही है इस मुद्दे पर बात?

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अब से सात साल पहले पेरिस में हुए ऐतिहासिक जलवायु समझौते में इस बात के महत्व को स्वीकार किया गया था कि जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले 'नुक़सान और क्षति' से बचना और नुक़सान की आशंकाओं को कम करना कितना ज़रूरी है.

लेकिन इस पर ये तय नहीं हुआ है कि ये कैसे किया जाए.

जर्मन मंत्री योहान फ़्लासबार्थ कहते हैं, "कई सालों तक 'नुक़सान और क्षति' का मुद्दा काफ़ी विवादित रहा है. और इस मुद्दे पर विकसित और विकासशील देशों के बीच काफ़ी गरमा-गरम बहसें हुई हैं.

विकसित देशों को इस बात की चिंता रही है कि ये बड़े उत्सर्जकों के लिए क़ानूनी बाध्यता बन सकती है. ऐसे में विकसित देशों के लिए ये हमेशा से लक्ष्मण रेखा जैसी रही है."

प्राकृतिक आपदा के बाद बचाव अभियान में लगे हुए राहत कर्मी

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इमेज कैप्शन, ग़रीब देश कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन ने उनके विकास की गति को धीमा कर दिया है

मिस्र में वार्ताकारों ने कहा है कि समृद्ध देश ये स्पष्ट करना चाहते थे कि वे 'नुक़सान और क्षति' के लिए किसी तरह का दायित्व या हर्जाना देने की बाध्यता स्वीकार नहीं कर रहे हैं.

विकासशील देशों ने इसका विरोध किया.

इसके बाद आख़िरकार ये तय हुआ है कि 'दायित्व या हर्जाने' पर चर्चा नहीं की जाएगी. हालांकि, सीओपी27 में 'नुक़सान और क्षति' पर चर्चा की जाएगी. इसका उद्देश्य अगले साल अबु धाबी में होने वाली बैठक में अंतरिम और 2024 में निर्णायक फ़ैसला लेना है.

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन की बैठकों में अफ़्रीका ग्रुप के मुख्य जलवायु वार्ताकार अल्फ़ा ओमर कलोगा कहते हैं, "हम लगातार नियमित, सतत और अपेक्षित फ़ंडिंग की मांग कर रहे हैं ताकि विकासशील देश उन संकटों का सामना कर सकें जिनका सामना वे आजकल रोज़ाना के स्तर पर कर रहे हैं."

वे कहते हैं कि ये क़रार इस दिशा में होती प्रगति का प्रतीक है, लेकिन हमें ये देखना होगा कि ये बातचीत कहां तक जाती है.

क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क से जुड़े हरजीत सिंह इस क़रार को एक समझौता बताते हैं.

वे कहते हैं, "अमीर देशों ने विकासशील देशों पर दबाव डालकर इस समझौते में उस भाषा को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया है जो इन ऐतिहासिक प्रदूषकों को 'हर्जाने और दायित्व' से बचाती है.

यही नहीं, अमीर देशों ने ऐसा करते हुए जोख़िम का सामना कर रहे लोगों और देशों को मदद पहुंचाने की दिशा में भी कोई माकूल समर्पण नहीं जताया है. ऐसे में ये भरोसा तोड़ने जैसा है."

हरजीत सिंह
IISD
अमीर देशों ने विकासशील देशों पर दबाव डालकर इस समझौते में उस भाषा को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया है जो इन ऐतिहासिक प्रदूषकों को 'हर्जाने और दायित्व' से बचाती है.
हरजीत सिंह
वैश्विक राजनीतिक रणनीतिकार, कैन इंटरनेशनल

'नुक़सान और क्षति' को लेकर मतभेद क्यों?

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देशों के लिए ये तय करना मुश्किल हो सकता है कि 'नुक़सान और क्षति' के लिए हर्जाना तय करने की ज़िम्मेदारी कौन सी संस्था निभाएगी.

विकसित देशों का कहना है कि इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के यूएन फ़्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज में व्यवस्थाएं हैं और वह ये ज़िम्मेदारी संभाल सकती है. इसके साथ ही अगर कुछ इंतज़ाम यूएनएफ़सीसी से परे होंगे तो संयुक्त राष्ट्र उसके लिए व्यवस्था कर सकती है.

हालांकि, विकासशील देशों का कहना है कि अभी जो संस्थाएं सक्रिय हैं, वे इसके लिए उचित नहीं हैं.

यूएन की जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बैठकों में 39 छोटे द्वीपीय देशों के गुट एओसिस के क्लाइमेट फ़ाइनेंस वार्ताकार मिचाई रॉबर्टसन कहते हैं, "ये संस्थाएं उस वक़्त कहां थी जब पाकिस्तान और नाइजीरिया में बाढ़ कहर बरपा रही थी या हाल ही में जब तूफ़ान ईयान ने कैरिबियाई क्षेत्र को अपनी चपेट में लिया था. ये 'नुक़सान और क्षति' पर काम नहीं करते."

एओसिस और अफ़्रीका गुट यूएनएफ़सीसीसी से जुड़ा एक अलग वित्तीय संस्थान बनाने की मांग उठा रहे हैं. इन गुटों का कहना है कि इस संस्था को मौजूदा क्लाइमेट फ़ाइनेंस एजेंसियों से अलग होना चाहिए.

लेकिन फ़्लासबार्थ कहते हैं कि इसके लिए अलग संस्था बनाने की मांग को शायद समर्थन नहीं मिलेगा.

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सीओपी27 से पहले इस दिशा में कोई प्रगति हुई?

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स्कॉटलैंड में 'सीओपी 26' के दौरान 'नुक़सान और क्षति' के लिए एक मिलियन डॉलर से कुछ अधिक राशि देने का संकल्प लिया गया था. पिछले महीने डेनमार्क ने कहा है कि वह इसमें 13 मिलियन डॉलर देगा .

और पिछले हफ़्ते यूरोपीय संसद ने एक प्रस्ताव पास किया है जिसके केंद्र में विकासशील देशों को फ़ंड करने के साथ-साथ क़र्ज़ की जगह अनुदान को तरजीह देना था ताकि वे 'नुक़सान और क्षति' से बच सके, उसके असर को कम करने के साथ उससे जूझ सकें.

बाढ़ के पीछे छूटे मलबे में चलती हुई एक महिला

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इमेज कैप्शन, बाढ़ के पीछे छूटे मलबे में चलती हुई एक महिला

जी-7 और जोख़िम का सामना कर रहे 55 देशों के समूह वी-20 हाल ही में 'ग्लोबल शील्ड अगेंस्ट क्लाइमेट डिज़ास्टर' नामक पहल को शुरू करने पर सहमत हुए हैं.

इस पहल के तहत 'नुकसान और क्षति' के लिए आंशिक रूप से बीमा के ज़रिए पैसा दिया जाएगा.

एओसिस कहता है कि इसे वैध नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वी20 में उतने सदस्य भी नहीं हैं जितने एओसिस में हैं.

मिचाई रॉबर्टसन कहते हैं, "जी-7 को हम सब से बात करनी चाहिए, न कि उन देशों से जिन्हें उन्होंने चुना है."

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क्या ग़रीब देशों को मिल रहा है क्लाइमेट फ़ाइनेंस फ़ंड?

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आर्थिक संस्थाओं की ओर से क्लाइमेट फ़ंड जारी होने के साथ-साथ देशों तक ये पैसा पहुंचने में पहले भी समस्याएं आती रही हैं.

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की ब्यूरोक्रेसी के चलते आर्थिक कोष जारी होने में समय लगता है. और वो देश जहां ये पैसा पहुंचना होता है, वहां ख़राब प्रशासन और भ्रष्टाचार की समस्याएं हैं.

हालांकि, ग़रीब देश इसे 'नुक़सान और क्षति' को एक तरफ़ खिसकाने के लिए सफ़ाई के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे.

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भारत इस बहस में कहां खड़ा है?

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यूएन ऑफ़िस फ़ॉर डिज़ास्टर रिस्क रिडक्शन की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि पिछले 20 सालों में दुनिया भर में प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी हुई है.

भारत ने इस अवधि के दौरान तीसरी सबसे ज़्यादा प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया.

भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के मुताबिक़, भारत ने साल 1995 से 2020 के बीच जलवायु परिवर्तन से जुड़ी 1058 आपदाओं का सामना किया है जिनमें तूफ़ान, सूखा, शीत लहर और लू आदि शामिल हैं.

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ने साल 2019 में बताया था कि भारत का लगभग 13 फ़ीसद हिस्सा जिसमें 19 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, भूस्खलन के ख़तरे का सामना कर रहे हैं.

इसकी वजह से आर्थिक नुक़सान हो रहा है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अपनी रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ़ क्लाइमेट इन एशिया' में बताया है कि भारत को साल 2020 में प्राकृतिक आपदाओं की वजह से 87 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ है.

हालांकि, इन सभी आपदाओं को सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से नहीं जोड़ा जा सकता.

इनमें से कुछ आपदाएं सीधे तौर पर और कुछ आपदाएं आंशिक रूप से जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई हैं.

सीओपी27

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लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों में सामने आया है कि भारत के ज़्यादा हिस्सों पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुक़सानों का ख़तरा मंडरा रहा है. इनमें पहाड़, तटवर्ती क्षेत्र, रेगिस्तान, जंगल और प्रायद्वीपीय क्षेत्र जैसे अलग-अलग तरह के पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं.

इसी वजह से भारत जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर ग़रीब देशों के साथ खड़ा होकर मांग कर रहा है कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन से होने वाले 'नुक़सान और क्षति' के लिए अतिरिक्त आर्थिक मदद उपलब्ध कराए.

मिस्र के शर्म अल शेख शहर में पहुंचने के बाद भारत के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने ट्वीट किया है - 'सीओपी27 में कारगर क़दम उठाए जाने चाहिए.

ऐसे नतीजे सामने आने चाहिए जिनका मक़सद जलवायु परिवर्तन रोकने पर हुए ख़र्च से लेकर बदलती जलवायु के साथ ढलने की दिशा में उठाए गए क़दमों के नतीजों और 'नुक़सान और क्षति' को परिभाषित करना हो.'

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