सूर्य ग्रहण आज, जानिए भारत में कब, कहाँ और कितना रहेगा असर

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दिवाली के अगले दिन यानी 25 अक्तूबर, मंगलवार को, भारत और दुनिया के कुछ और हिस्सों में आंशिक सूर्य ग्रहण होगा.
ये सूर्य ग्रहण यूरोप, मध्य पूर्व, अफ़्रीका के उत्तर-पूर्वी हिस्सों, पश्चिमी एशिया, उत्तर अटलांटिक महासागर और हिंद महासागर में दिखेगा.
भारत में ये सूर्य ग्रहण पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को छोड़कर अधिकतर हिस्सों में दिखेगा.
आशिंक सूर्य ग्रहण के तीन चरण होते हैं. शुरुआत, मैक्सिमम पॉइंट और अंत.
भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के मुताबिक़, "25 अक्तूबर 2022 (3 कार्तिक, शक संवत 1944) को आंशिक सूर्य ग्रहण होगा. भारत में सूर्यास्त के पहले शाम में ग्रहण शुरू होगा.
इसे अधिकांश स्थानों से देखा जा सकेगा. हांलाकि ग्रहण अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और उत्तर-पूर्व भारत के कुछ स्थानों (जिनमें से कुछ के नाम हैं आइजॉल, डिब्रूगढ़, इम्फाल, ईटानगर, कोहिमा, सिबसागर, सिलचर, तामलोंग) में दिखाई नहीं देगा.
मंत्रालय की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया है, "ग्रहण का अंत भारत में दिखाई नहीं देगा क्योंकि वह सूर्यास्त के उपरांत भी जारी रहेगा."
मंत्रालय के मुताबिक, "ग्रहण की अवधि शुरू से लेकर सूर्यास्त के समय तक दिल्ली और मुम्बई में क्रमश: एक घंटे 13 मिनट और एक घंटे 19 मिनट की होगी.
चेन्नई और कोलकाता में ग्रहण की अवधि शुरू से लेकर सूर्यास्त के समय तक क्रमश: 31 मिनट और 12 मिनट की होगी. ग्रहण यूरोप, मध्य पूर्व, अफ्रीका के उत्तर-पूर्वी हिस्सों, पश्चमी एशिया, उत्तर अटलांटिक महासागर के अलावा उत्तर हिंद महासागर के क्षेत्रों में दिखाई देगा."

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बरतें या सावधानी
सरकार ने लोगों को ख़ाली आँखों से सूर्य ग्रहण ना देखने की सलाह दी है.
सरकार की तरफ़ से कहा गया है, "सूर्य ग्रहण को थोड़ी देर के लिए भी ख़ाली आँखों से नहीं देखा जाना चाहिए. चंद्रमा सूर्य के अधिकतम हिस्सों को ढक दे तब भी इसे ख़ाली आँखों से न देखें क्योंकि यह आँखों को स्थायी नुक़सान पहुँचा सकता है, जिससे अंधापन हो सकता है.
सूर्य ग्रहण को देखने की सबसे सही तकनीक है ऐलुमिनी माइलर, काले पॉलिमर, 14 नं. शेड के झलाईदार काँच का उपयोग कर अथवा टेलिस्कोप के माध्यम से श्वेत पट पर सूर्य की छाया का प्रक्षेपण कर इसे देखना."
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के मुताबिक, "भारत में अगला सूर्य ग्रहण दो अगस्त 2027 को दिखाई देगा, जो पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा. देश के सभी हिस्सों से वह आंशिक सूर्य ग्रहण के रूप में परिलक्षित होगा. अमावस्या को सूर्य ग्रहण तब घटित होता है, जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है. वे तीनों एक सीध में आ जाते हैं. आंशिक सूर्य ग्रहण तब घटित होता है, जब चन्द्र चक्रिका सूर्य चक्रिका को आंशिक रूप से ही ढक पाती है."
ग्रहण को लेकर आज भी कायम हैं, डराने वाले विश्वास
दुनिया में ऐसे लोग भी हैं, जिनके लिए ग्रहण किसी ख़तरे का प्रतीक है- जैसे दुनिया के ख़ात्मे या भयंकर उथल-पुथल की चेतावनी.
हिंदू मिथकों में इसे अमृत मंथन और राहु-केतु नामक दैत्यों की कहानी से जोड़ा जाता है. इससे जुड़े कई अंधविश्वास प्रचलित हैं. ग्रहण हमेशा से इंसान को जितना अचंभित करता रहा है, उतना ही डराता भी रहा है.
असल में, जब तक मनुष्य को ग्रहण के वजहों की सही जानकारी नहीं थी, उसने असमय सूरज को घेरती इस अंधेरी छाया को लेकर कई कल्पनाएं कीं, कई कहानियां गढ़ीं.

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17वीं सदी के यूनानी कवि आर्कीलकस ने कहा था कि भरी दोपहर में अंधेरा छा गया और इस अनुभव के बाद अब उन्हें किसी भी बात पर अचरज नहीं होगा.
मज़े की बात यह है कि आज जब हम ग्रहण के वैज्ञानिक कारण जानते हैं, तब भी ग्रहण से जुड़ी ये कहानियां और ये अंधविश्वास बरक़रार हैं.
कैलिफोर्निया की ग्रिफिथ वेधशाला के निदेशक एडविन क्रप कहते हैं, ''17वीं सदी के अंतिम वर्षों तक भी अधिकांश लोगों को मालूम नहीं था कि ग्रहण क्यों होता है या तारे क्यों टूटते हैं. हालांकि आठवीं शताब्दी से ही खगोलशास्त्रियों को इनके वैज्ञानिक कारणों की जानकारी थी.''
क्रप के मुताबिक़, ''जानकारी के इस अभाव की वजह थी- संचार और शिक्षा की कमी. जानकारी का प्रचार-प्रसार मुश्किल था जिसके कारण अंधविश्वास पनपते रहे."
वो कहते हैं, "प्राचीन समय में मनुष्य की दिनचर्या कुदरत के नियमों के हिसाब से संचालित होती थी. इन नियमों में कोई भी फ़ेरबदल मनुष्य को बेचैन करने के लिए काफ़ी था.''
ग्रहण के बारे में विभिन्न सभ्यताओं का नज़रिया
प्रकाश और जीवन के स्रोत सूर्य का छिपना लोगों को डराता था और इसीलिए इससे जुड़ी तरह-तरह की कहानियां प्रचलित हो गई थीं. सबसे व्यापक रूपक था सूरज को खा जाने वाले दानव का.
एक ओर पश्चिमी एशिया में मान्यता थी कि ग्रहण के दौरान ड्रैगन सूरज को निगलने की कोशिश करता है और इसलिए वहाँ उस ड्रैगन को भगाने के लिए ढोल-नगाड़े बजाए जाते थे.
वहीं, चीन में मान्यता थी कि सूरज को निगलने की कोशिश करने वाला दरअसल, स्वर्ग का एक कुत्ता है. पेरुवासियों के मुताबिक़, यह एक विशाल प्यूमा था और वाइकिंग मान्यता थी कि ग्रहण के समय आसमानी भेड़ियों का जोड़ा सूरज पर हमला करता है.

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खगोलविज्ञानी और वेस्टर्न केप विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर जरीटा हॉलब्रुक कहते हैं, "ग्रहण के बारे में विभिन्न सभ्यताओं का नज़रिया इस बात पर निर्भर करता है कि वहाँ प्रकृति कितनी उदार या अनुदार है.
जहाँ जीवन मुश्किल है, वहाँ देवी-देवताओं के भी क्रूर और डरावने होने की कल्पना की गई और इसीलिए वहाँ ग्रहण से जुड़ी कहानियाँ भी डरावनी हैं. जहाँ जीवन आसान है, भरपूर खाने-पीने को है, वहाँ ईश्वर या पराशक्तियों से मानव का रिश्ता बेहद प्रेमपूर्ण होता है और उनके मिथक भी ऐसे ही होते हैं."
मध्य कालीन यूरोप में, प्लेग और युद्धों से जनता त्रस्त रहती थी, ऐसे में सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण उन्हें बाइबल में प्रलय के वर्णन की याद दिलाता था. प्रोफ़ेसर क्रिस फ्रेंच कहते हैं, "लोग ग्रहण को प्रलय से क्यों जोड़ते थे, इसे समझना बेहद आसान है."
बाइबल में उल्लेख है कि क़यामत के दिन सूरज बिल्कुल काला हो जाएगा और चाँद लाल रंग का हो जाएगा.
सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण में क्रमश: ऐसा ही होता है. फिर लोगों का जीवन भी छोटा था और उनके जीवन में ऐसी खगोलीय घटना बमुश्किल एक बार ही घट पाती थी, इसलिए यह और भी डराती थी.
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