नासा का लूसी मिशन बृहस्पति की कक्षा में क्या तलाश करने वाला है?

इमेज स्रोत, NASA/SwRI
- Author, जोनाथन अमोस
- पदनाम, बीबीसी विज्ञान संवाददाता
हमारे सौरमंडल के जीवाश्मों की पड़ताल करने के लिए नासा ने एक नया मिशन लॉन्च किया है. इसे लूसी मिशन का नाम दिया गया है जो बृहस्पति ग्रह के लिए रवाना हो चुका है.
आगे-पीछे गैस से घिरे इस सबसे बड़े ग्रह की कक्षा में उसे एक झुंड में चल रहे ऐस्टेरॉयड के दो समूहों का अध्ययन करना है. इन झुंडों को ट्रोजन ऐस्टेरॉयड कहते हैं.
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (नासा) के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस ग्रह के निर्माण के दौरान ये चीज़ें बच गई थीं और इन ट्रोजन में सौरमंडल की उत्पत्ति के बारे में अहम जानकारियां छुपी हो सकती हैं.
नासा का कहना है कि इस पर शोध से यह भी पता चल सकता है कि हमारे सौरमंडल में ग्रहों की वर्तमान स्थिति के पीछे कारण क्या है.

इमेज स्रोत, NASA
भारतीय समयानुसार शनिवार की शाम 3.04 बजे (ईस्टर्न टाइम ज़ोन के अनुसार सुबह 05:34 बजे) फ़्लोरिडा में केप-कैनावेरल स्पेस फोर्स स्टेशन से एटलस-वी रॉकेट से लूसी मिशन ने उड़ान भर दी है.
इस मिशन पर अगले 12 सालों में 981 मिलियन डॉलर यानी लगभग 73,60 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. इस दौरान लूसी मिशन सात ट्रोजन के पास पहुंच कर उनका अध्ययन करेगा.

इमेज स्रोत, Jason Kuffer CC
लूसी का नाम कैसे पड़ा?
नासा ने इस अभियान को लूसी का नाम क्यों दिया है, इसके पीछे भी एक कारण है. 1974 में इथियोपिया के हदार नामक जगह से एक मानव कंकाल मिला था. उसके अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों ने उसे अब तक प्राप्त दुनिया का प्राचीनतम मानव कंकाल बताया था. इस कंकाल को लूसी (ऑस्ट्रैलोपिथिकस अफ़रैन्सिस) का नाम दिया गया था. कहा जाता है कि इन्हीं से होमो प्रजाति आई है जिससे आधुनिक मानव का जन्म हुआ है.
बृहस्पति ग्रह पर ट्रोजन की पड़ताल के लिए नासा ने अपने मिशन का नाम इसी लूसी नाम के कंकल पर रखा है. यह अंतरिक्षयान उन जीवाश्मों की तलाश में निकला है जो पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर, बृहस्पति के साथ सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं.
कोलोराडो के बोल्डर में साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में लूसी मिशन के प्रमुख शोधकर्ता हैल लेविसन ने बताया, "ट्रोजन ऐस्टेरॉयड अपनी कक्षा में 60 डिग्री तक बृहस्पति के साथ या उसके आगे चलते हैं."
"वो बृहस्पति और सूर्य के बीच के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव की वजह से वहां पर बने हुए हैं. सौरमंडल के इतिहास में जो चीज़ें कहीं रख दी गई हैं वो हमेशा के लिए वहां स्थिर हो गई हैं. लिहाजा, ये चीज़ें वास्तव में जीवाश्म हैं जिनसे हमारे ये ग्रह बने हैं."

इमेज स्रोत, Nasa/Glenn Benson
लूसी को एक शहर के आकार के वस्तु का अध्ययन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है जो वस्तु के आकार, संरचना, सतह की खासियत और तापमान आदि का विवरण तैयार करेगी.
अगर ट्रोजन उन्हीं चीज़ों से बना है जिनसे बृहस्पति के चंद्रमा बने हैं तो इससे ये पता चलेगा कि उनका निर्माण सूर्य से उतनी ही दूरी पर हुआ जितनी दूरी पर यह विशालकाय ग्रह बना है. लेकिन यह उम्मीद नहीं की जा रही है.
साउथ वेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ. कार्ली हॉवेट ने कहा, "उदाहरण के लिए अगर वो उन्हीं चीज़ों से बने होते हैं जिन्हें हम कुइपर बेल्ट (सौरमंडल के बाहरी क्षेत्र में पाया जाने वाला सर्कमस्टेलर डिस्क) में देखते हैं, तो यह हमें यह बताएगा कि हो सकता है कि वो वहां बने हों और फिर बाद में अंदर की ओर खींच लिए गए हों."

इमेज स्रोत, Getty Images
सौरमंडल कैसे बना, क्या है थ्योरी?
डॉ. कार्ली हॉवेट ने बीबीसी न्यूज़ से कहा कि, यह मिशन हमारे मॉडलों का परीक्षण है क्योंकि हमारी थ्योरी के मुताबिक़ जब सौरमंडल बन रहा था तब कुछ चीज़ें गुरुत्वाकर्षण की वजह से बाहर फेंक दिए गए थे और कुछ अंदर की ओर खींचे गए थे.
वैज्ञानिकों के पास जो थ्योरी है उसके मुताबिक़ जब सौरमंडल बन रहा था, तब बहुत अधिक मात्रा में धूल और गैस के कण खिंचाव के कारण एक साथ आए. इससे सूर्य, विभिन्न ग्रह, उपग्रह और अन्य छोटे बड़े पिण्डों का निर्माण हुआ. इस प्रक्रिया में कुछ मलबा या ऐस्टेरॉयड्स रह गए थे.
ये ऐस्टेरॉयड्स गुरुत्वाकर्षण शक्ति की वजह से या तो सूर्य में समा गए या कुछ सौरमंडल के बाहरी हिस्से में इकट्ठा हो गए जिसे कुइपर बेल्ट के रूप में जाना जाता है.
ये सभी सूर्य की परिक्रमा करते हैं. कुइपर बेल्ट में जमा ऐस्टेरॉयड और उसके ज़रिए सौरमंडल की उत्पत्ति को लेकर नित नई बातें सामने आती रही हैं.

इमेज स्रोत, NASA
ट्रोजन तक कब पहुंचेगा लूसी अंतरिक्षयान?
यह अंतरिक्ष यान ट्रोजन के अग्रणी समूह के पास साल 2027-28 तक पहुंचेगा जबकि इसकी पूंछ तक इसके साल 2033 में पहुंचने की संभावना है. यह पूरी यात्रा क़रीब 4 अरब मील या 6 अरब किलोमीटर (600 करोड़ किलोमीटर) की है.
ट्रोजन पर शोध करना लूसी मिशन का उद्देश्य है, लेकिन बृहस्पति ग्रह तक पहुंचने के दौरान वो अन्य ऐस्टेरॉयड्स डोनाल्ड जॉनसन के पास भी जाएगी. इसका नाम उन जीवाश्म खोजी के नाम पर रखा गया है जिन्होंने इथियोपिया में जिसे 1974 में प्राचीनतम जीवाश्व की खोज की थी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















