सांपों के लिए वरदान और डायनासोर के लिए श्राप कैसे बना एस्टेरॉयड का धरती से टकराना

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    • Author, हेलेन ब्रिग्स
    • पदनाम, विज्ञान और पर्यावरण संवाददाता

धरती पर सांपों के फलने-फूलने में कुछ हद तक एस्टेरॉयड या क्षुद्र ग्रह का भी योगदान रहा है.

एक नई स्टडी के मुताबिक़ इस एस्टेरॉयड के धरती से टकराने के कारण धरती से डायनासोर ख़त्म हो गए थे.

इस का असर ये हुआ कि धरती पर बड़े पैमाने पर बर्बादी हुई, ज़्यादातर जानवर और पेड़-पौधे ख़त्म हो गए थे.

लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इस व्यापक विनाश के बाद की दुनिया में सांपों की कुछ प्रजातियां बच गई थीं.

वे धरती के भीतर जाकर छिप गए और लंबे समय तक बिना भोजन के जीवित रहने में कामयाब रहे.

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डायनासोर ख़त्म हो गए

ये सांप इसके बाद दुनिया भर में फैल गए और आज दुनिया भर में इनकी तीन हज़ार से अधिक प्रजातियां हैं.

ये बात छह करोड़ 60 लाख साल पुरानी है, जब धरती से ये एस्टेरॉयड टकराया था. उस हमले में डायनासोर ख़त्म हो गए.

वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती से एस्टेरॉयड के टकराने की वजह से भूकंप, सूनामी, जंगल की आग जैसी प्राकृतिक आपदाएं आईं.

धरती से उठे गुबार ने उसे इस कदर ढंक लिया था कि सूरज की रोशनी यहां तक पहुंच नहीं पा रही थे और अंधेरे का साम्राज्य दशक भर बना रहा.

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि उस घटना में धरती के 76 फ़ीसदी पेड़-पौधे और जानवर लुप्त हो गए.

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वैज्ञानिकों की रिसर्च

लेकिन सांपों, कुछ स्तनपायी जीवों, पक्षियों और कुछ मछलियों ने अपने आप को बचा लिया.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ बाथ के शोधकर्ताओं टीम ने इस रिसर्च पर काम किया था.

रिसर्च टीम की लीडर डॉक्टर कैथरीन क्लीन कहती हैं, "जब धरती पर आहार-श्रृंखला का चक्र टूट गया था तो वो सांप ही थे जो फलने-फूलने में कामयाब रहे. और उन्होंने बदले हुए पर्यावरण के साथ नए सिरे से ताल-मेल बिठाने में देरी नहीं की."

"ये कुछ ऐसा है कि अगर धरती से एस्टेरॉयड नहीं टकराया होता तो वे आज जिस स्थिति में हैं, वैसे नहीं होते."

ये एस्टेरॉयड धरती पर मेक्सिको के पास टकराया था. उस वक़्त सांप लगभग वैसे ही थे, जैसे आज दिखाई देते हैं- बिना पैर के, लचीले जबड़ों के साथ जिससे वो अपने शिकार को आसानी से निगल पाते हैं.

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सांपों की प्रजातियां

सांप बिना कुछ खाए-पिए साल भर तक रह सकते हैं.

एस्टेरॉयड के धरती से टकराने के बाद जो बर्बादी हुई, उसमें ज़िंदा रहने के लिए सांपों का ये हुनर उनके काम आया.

सांपों की जो प्रजातियां जीवित रहने में कामयाब रह सकीं, वो प्रमुखतः वे प्रजातियां थीं जो धरती के अंदर या जंगलों में पेड़ों के नीचे या फिर साफ़ पानी के स्रोतों में रहती थीं.

उन्हें दूसरे जीवों से कम प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा.

फलने-फलूने के लिए उनके सामने खाली मैदान मौजूद था और वे दुनिया भर में फैल गए. उसी दौर में सांपों ने पहली बार एशिया की ज़मीन पर कदम रखा.

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नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित रिसर्च

गुजरते वक़्त के साथ-साथ सांप आकार में बड़े होने लगे और उनका दायरा फैलने लगा.

वे नए रिहाइशी इलाकों को अपनाने लगे और नए शिकारों पर धावा बोलने लगे. सांपों की नई प्रजातियां अस्तित्व में आईं.

इनमें बड़े आकार के वे समुद्री सांप भी शामिल थे जिनकी लंबाई 10 मीटर तक थी.

डॉक्टर कैथरीन क्लीन की टीम का ये रिसर्च नेचर कम्युनिकेशंस में पब्लिश हुआ है

उनके शोध में अनुमान लगाया गया है कि आज धरती पर सांपों की जितनी भी प्रजाति है, उस पर कहीं न कहीं एस्टेरॉयड के धरती से टकराने की घटना का प्रभाव पड़ा है.

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सभी जगहों पर पाए जाते हैं सांप

आज दुनिया भर में सांपों की जो प्रजातियां पाई जाती हैं, उनमें पेड़ पर रहने वाले, समुद्र में रहने वाले, ज़हरीले सांप और अजगर जैसे सांप जिनमें ज़हर नहीं होता है, पाए जाते हैं और ये करोड़ों साल पहले हुई उस घटना के बाद ही अस्तित्व में आए हैं.

धरती के इतिहास में ऐसी घटनाएं कम ही हुई हैं जब किसी जीव की लगभग आधी प्रजाति बहुत कम समय में विलुप्त हो जाए.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ बाथ के मिलनर सेंटर फ़ॉर रिवॉल्यूशन के डॉक्टर निक लॉन्गरिक का कहना है कि महाविनाश के उत्पत्ति की प्रक्रिया शुरू हुई जो अपने आप में बहुत प्रयोगधर्मी थी.

धरती पर सांप अंटार्कटिक महादेश को छोड़कर लगभग सभी जगहों पर पाए जाते हैं.

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वे मरुस्थल से लेकर समंदर तक मिलते हैं. पेड़े के ऊपरी सिरे से लेकर धरती के अंदर तक उन्होंने अपने रहने की जगह चुनी है.

इनकी लंबाई कुछ सेंटीमीटर से लेकर छह मीटर से ज़्यादा तक होती है.

पर्यावरण के स्वास्थ्य के लिए सांपों का होना ज़रूरी है. ये कीड़े मकौड़ों को नियंत्रित करके इंसानों की मदद करता है.

लेकिन इंसानों से टकराव के कारण सांपों की कई प्रजातियां ख़तरे में हैं.

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