कोरोना वायरस कोविड-19 की पूरी एनाटॉमी: अब तक जो पता चला है

- Author, क्लेयर प्रेस/ बुजयांग जोंग
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
किसी महामारी के फैलने की जांच जासूसी पड़ताल जैसी ही होती है.
किसी जासूसी जांच में सबूतों के ग़ायब होने से पहले अपराध की जगह पर पहुंचना होता है, प्रत्यक्षदर्शियों से बात करनी होती है.
इसके बाद जांच की शुरुआत होती है. सबूतों की कड़ियों को जोड़ते हुए अगले वारदात से पहले हत्यारे को पकड़ लिया जाता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर की तमाम कोशिशों के बावजूद कोरोना महामारी का प्रकोप लगातार फैल रहा है और यह महामारी हर दिन हज़ारों लोगों की जान ले रहा है.
महामारी का आतंक छह महीने पहले शुरू हुआ था, अब तक वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के बारे में कितना कुछ पता लगाया है?

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पहली चेतावनी
किसी वायरस का हमारे स्वास्थ्य पर क्या असर होगा और यह कितनी तेजी से फैलेगा, इसे समझने के लिए वायरस की शुरुआत के बारे में जानना ज़रूरी होता है. लेकिन कोरोना वायरस शुरुआत से ही लोगों को अचरज में डालता रहा है.
जब दुनिया 2020 के आगमन पर जश्न की तैयारी में जुटी थी तब चीन के वुहान सेंट्रल हॉस्पीटल के आपातकालीन विभाग के डॉ. ली वेनलियांग को सात मरीज़ मिले. ये सबके सब फेफड़े की बीमारी न्यूमोनिया से पीड़ित थे. इन सबको क्वारंटीन किया गया.
30 दिसंबर को अपने सहकर्मियों के साथ प्राइवेट वीचैट मैसेजिंग ऐप पर डॉक्टर ली वेनलियांग ने आशंका जताई कि क्या सार्स (सीवर एक्यूट रिस्पेरटरी सिंड्रोम) का नया दौर आ चुका है?

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सार्स भी कोरोना वायरस का एक रूप है. पहली बार यह चीन में ही 2003 में सामने आया था. इसके बाद यह 26 देशों में फैला और इसकी चपेट में आठ हज़ार से ज़्यादा लोग आए थे.
हालांकि डॉ. ली ने जिस बीमारी की पहचान की थी, वह सार्स का दूसरा चरण नहीं था बल्कि कोविड-19 वायरस (सार्स-कोव-2) का पहला चरण था.
चीनी मीडिया के मुताबिक अपने सहकर्मियों के बीच इस बीमारी के फैलने की चेतावानी देने के तीन दिन बाद डॉ. ली को पुलिस ने आठ अन्य लोगों के साथ अफ़वाह फैलाने के आरोप में हिरासत में ले लिया.
काम पर लौटने के बाद डॉ. ली कोविड-19 से संक्रमित हो गए. महज 34 साल के डॉ. ली की मौत सात फरवरी को हो गई. परिवार में उनकी गर्भवती पत्नी और एक बेटा है.
कैसे हुई संक्रमण की शुरुआत
वुहान शहर के नए हिस्से में स्थित है हुआनान सीफूड मार्केट. छोटे छोटे दुकानदारों से भरा यह बाज़ार हर तरह के मांस, मछलियों के लिए एक तरह से हब है.
दिसंबर, 2019 के अंतिम सप्ताह में डॉक्टरों और नर्सों ने जब इस बीमारी के फैलने की चेतावनी देनी शुरू की तब स्वास्थ्यकर्मियों ने सबसे पहले कोरोना महामारी का इस बाज़ार से कनेक्शन देखा, ज़्यादातर संक्रमित मरीज़ हुआनान सीफूड मार्केट में काम करने वाले लोग थे. 31 दिसंबर को वुहान के स्वास्थ्य आयोग ने अपनी पहली रिपोर्ट बीजिंग प्रशासन को सौंपी. अगले दिन बाज़ार को क्वारंटीन कर दिया गया.

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आज, वैज्ञानिक एकमत होकर यह मान रहे हैं कि सीफूड मार्केट में कोरोना संक्रमण तेजी फैला. लेकिन कोरोना का पहला मामला इस बाज़ार से निकला, यह नहीं कहा जा सकता. हालांकि बाज़ार में जब लोगों और जीवित जानवरों के सैंपल लिए गए थे तब वे सब कोविड-19 संक्रमित थे.
वुहान में ही हुए मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, इंसानों में कोरोना वायरस का पहला मामला, सीफूड मार्केट में संक्रमण फैलने से चार सप्ताह पहले ही सामने आ चुका था. वुहान के एक बुज़ुर्ग आदमी में एक दिसंबर, 2019 को कोरोना वायरस के लक्षण मिला था और इस बुज़ुर्ग का सीफूड मार्केट से कोई लिंक भी नहीं निकला था.
जनवरी में वुहान के स्वास्थ्यकर्मियों ने देखा कि शहर के अस्पतालों में लगातार कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं. किसी ने भी इस वायरस के इतनी तेजी से फैलने का अनुमान नहीं जताया था. लेकिन यह महामारी चीन ही नहीं, बल्कि एशियाई महाद्वीप में तेजी से फैलने लगा था.
वुहान में कोविड-19 से मौत का पहला मामला 11 जनवरी, 2020 को सामने आया. इसके महज नौ दिन बाद कोरोना वायरस चीन से निकलकर जापान, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड तक पहुंच गया था. दुनिया भर के चिकित्सीय और तकनीकी विकास को कोरोना वायरस ने पीछे छोड़ दिया था.
क्या है कोरोना वायरस
इम्यूनोलॉजी के प्रोफेसर क्रिस्टियान एंडरसन कहते हैं, "हमारा पहला सवाल हमेशा यही होता है, क्या है यह?" एंडरसन की लेबोरेटरी को संक्रामक रोगों के जीनोमिक्स अध्ययन का विशेषज्ञ माना जाता है. वायरस जानवरों से इंसानों तक कैसे पहुंचा और उसके बाद इतने बड़े पैमाने पर कैसे फैल गया, इसका पता लगाने की कोशिश यह लोग कर रहे हैं.
वहीं दिसंबर में, अस्पताल में कोरोना वायरस के पहले मरीज़ के दाख़िल होने के कुछ ही घंटों के अंदर मरीज के स्वाब का विश्लेषण वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के वैज्ञानिकों ने शुरू कर दिया था.

जीनोम को अगर अक्षरों से बना तार माने लें, तो इंसानों का जीनोम करीब तीन अरब जेनेटिक अक्षरों से मिलकर बना है. एक सामान्य फ्लू वायरस 15000 जेनेटिक अक्षरों से बने होते हैं. इस चेन में वो सब निर्देश भी शामिल होते हैं कि किसी वायरस को खुद को कितनी बार दोहराने की ज़रूरत होती है तब जाकर बीमारी और संक्रमण फैलता है.
एक वायरस के जीनोम को तय करने में कई बार महीनों लगते हैं वहीं कई बार सालों का समय लगता है. हालांकि बेहद कम समय में 10 जनवरी, 2020 को प्रोफेसर यंग जेन जैंग के नेतृत्व में वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के वैज्ञानिकों ने कोविड-19 का पहला जीनोमिक सीक्वेंस प्रकाशित कर दिया. यह कोरोना वायरस की पहेली को समझने के लिए पहला बेहद महत्वपूर्ण प्रयास था.
प्रोफेसर एंडरसन ने बताया, "जब हमने पहला सीक्वेंस देखा तभी हमें मालूम हो गया कि यह कोरोना वायरस का ही एक रूप है और सार्स से 80 प्रतिशत मिलता जुलता भी था."
दरअसल, कोरोना वायरस, वायरसों का एक बड़ा परिवार है. इनमें सैकड़ों की पहचान हो चुकी है और यह सुअर, ऊंट, चमगादड़ और बिल्लियों में पाए जाते हैं. कोविड-19 कोरोना वायरस परिवार का सातवां प्रारूप है जो जानवरों से इंसानों तक पहुंचा है.
प्रोफेसर एंडरसन बताते हैं, "हमारा दूसरा सवाल यही है कि हम इसका इलाज कैसे कर सकते हैं- इसके लिए टेस्ट कराना और वायरस संक्रमण के फैलने के तरीकों को समझना ज़रूरी है."
एंडरसन के मुताबिक, "हमारा तीसरा सवाल यह है कि हम इसके लिए वैक्सीन कैसे विकसित कर सकते हैं? इन सबका जवाब वायरस के जेनेटिक्स के ब्लू प्रिंट से ही मिलता है."
प्रोफेसर एंडरसन बताते हैं कि काफी प्रमाण हैं जिसके मुताबिक कहा जा सकता है कि कोरोना वायरस की उत्पति चमगादड़ों से हुई है. उन्होंने कहा, "इसकी शुरुआत चमगादड़ों से हुई. हम यह भी जानते हैं कि यह पूरी तरह से नेचुरल वायरस है क्योंकि ऐसे कई वायरस चमगादड़ों में पाए जाते हैं. लेकिन हम यह नहीं जानते हैं कि यह इंसानें तक कैसे पहुंचा?"
एंडरसन की टीम ने चमगादड़ों में पाए जाने वाले दूसरे कोरोना वायरस का अध्ययन भी किया है जो कोविड-19 से 96 प्रतिशत मिलता जुलता है. इन वैज्ञानिकों को कोविड-19 जैसी समानताएं पैंगोलिन में पाए जाने वाले कोरोना वायरस में भी मिली हैं. पैंगोलिन की एशिया में सबसे ज़्यादा तस्करी होती है.
तो क्या कोविड-19 चमगादड़ से पैंगोलिन तक पहुंचा? वहां कुछ अतिरिक्त प्रोटीन हासिल करने के बाद यह इंसानों तक पहुंचा? वैज्ञानिक इन सब संभावनाओं की पड़ताल कर रहे हैं.

दुनिया भर के साथ कोविड-19 का पहला जेनेटिक सीक्वेंस साझा करने के दो दिनों के भीतर स्थानीय अधिकारियों ने प्रोफेसर जैंग की लेबोरेटरी को बंद कर दिया और उनके रिसर्च लाइसेंस को रद्द कर दिया गया. चीनी मीडिया के मुताबिक इसकी कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई गई लेकिन प्रोफेसर जैंग की टीम के अध्ययन ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को रास्ता दिखा दिया था.
प्रोफेसर एंडरसन ने बताया, "कोविड-19 के पहले जीनोम सीक्वेंस के बिना हम कोई अध्ययन शुरू नहीं कर पाते. इसके लिए उन वैज्ञानिकों को धन्यवाद है जिन्होंने अविश्वसनीय तेजी से इतनी महत्वपूर्ण जानकारी दुनिया को मुहैया कराई."
संपर्क में आए लोगों का पता लगाना
कोविड-19 की रोकथाम के लिहाज से दुनिया का सबसे कामयाब देश 5.1 करोड़ की आबादी वाला दक्षिण कोरिया साबित हुआ है. दक्षिण कोरिया ने अपने यहां संक्रमितों के संपर्क में आने वाले लोगों का पता लगाने के लिए एक छोटी सी सेना तैयार कर ली और यही उसकी कामयाबी की सबसे बड़ी वजह रही.
कांटैक्ट ट्रेसर की इस सेना में शामिल लोग कोविड-19 संक्रमित और हाल फ़िलहाल उनके संपर्क में आए लोगों का पता लगाते थे. इसका पता लगाने के बाद वे लोगों को सेल्फ़ आइसोलेशन में भेजते या फिर यह तय करते कि क्या पूरी इमारत या फिर संस्था को क्वारंटीन किए जाने की ज़रूरत है. यह सब अस्पतालों, केयर होम और दफ्तरों के साथ किया गया.
जनवरी और फरवरी में दक्षिण कोरिया में कोरोना संक्रमण के कुछ ही मामले सामने आए और संक्रमण फैलने के ख़तरे को यह देश टालने में कामयाब रहा. लेकिन फरवरी के अंत में महज कुछ ही दिनों के अंदर दक्षिण कोरिया के एक शहर में कोरोना संक्रमण के हज़ारों मामले सामने आ गए.
डायेगो शहर में कोरोना संक्रमण महज एक मरीज़ के मूवमेंटस से फैला. मरीज़ नंबर 31 के नाम से कुख्यात इस मरीज़ को दक्षिण कोरिया का सुपर स्प्रेडर कहा जाता है.
मरीज 31, 17 फरवरी को कोरोना से संक्रमित हुईं. लेकिन कांटैक्ट ट्रेसरों की टीम ने उनके संपर्क में आए सभी लोगों का पता लगा लिया. 10 दिनों के भीतर में वह एक हज़ार से ज़्यादा लोगों के संपर्क में आई थीं. लेकिन हर शख़्स का पता लगाकर उन्हें सेल्फ़ आइसोलेशन में रखा गया. इससे ख़तरा ज़्यादा नहीं बढ़ा.

डायेगो शहर की महामारी रोग टीम के डिप्टी प्रोफे़सर किम जोंग यून शहर में कांटैक्ट ट्रेस करने वाली सेना के सर्वेसर्वा हैं. उनके मुताबिक इस काम के लिए ज़्यादातर पूर्व सरकारी कर्मचारियों और जूनियर डॉक्टरों की तैनाती होती है. वे बताते हैं कि मरीज़ 31 की तरह ही टाल मटोल करने वालों से सामना होने पर कठोर तौर तरीके अपनाने होते हैं जिनमें क्रेडिट कार्ड के लेन देने की जांच, फोन और जीपीएस हिस्ट्री की जांच इत्यादि शामिल है.
प्रोफेसर किम बताते हैं, "मरीज़ 31 ने हमें पहले नहीं बताया था कि वह शिनचेओनजी चर्च की सदस्य हैं. यह हमारी टीम ने बाद में पता लगाया."
शिनचेओनजी चर्च के दस्तावेज़ के मुताबिक देश भर में उनके तीन लाख के करीब सदस्य हैं. दावा किया जाता है कि इस चर्च के संस्थापक ली मैन ही, जीसस क्राइस्ट के दूसरे अवतार थे. दक्षिण कोरिया की मुख्यधारा के कई चर्च, इस समूह को एक पंथ मानते हैं और युवा लोगों को भर्ती किए जाने के चलते उसकी लंबे समय से आलोचना भी करते रहे हैं.
वैसे मरीज़ 31 केवल शिनचेओनजी चर्च से अपने संबंधों को छुपाने के चलते कुख्यात नहीं हुईं. एक कांटैक्ट ट्रेसर ने पता लगाया कि कोविड-19 का टेस्ट कराने से दस दिन पहले तक, कोरोना के लक्षण होने के बाद भी वह डायेगो शहर में घूमती रहीं और इस दौरान एक हज़ार से ज़्यादा लोग उनके संपर्क में आए.

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छह फरवरी को कार एक्सीडेंट होने के बाद, मरीज़ 31 को सात फरवरी को अस्पताल में दाख़िल कराया गया. जहां वह कम से कम 128 लोगों के संपर्क में आईं. इस दौरान उन्होंने घर से अपना सामान लाने के लिए थोड़ी देर की छुट्टी ली. ढाई घंटे की यात्रा करके वह अस्पताल वापस लौटीं.
इसके बाद वह थोड़े थोड़े समय के लिए अस्पताल से कई बार बाहर निकलीं. एक बार अपने एक दोस्त के साथ लंच के लिए गईं, दो बार चर्च गईं जहां दो घंटे के आयोजन के लिए एक हज़ार से ज़्यादा लोग एकत्रित हुए थे.
प्रोफेसर किम के मुताबिक शिनचेओनजी चर्च की गुप्त नीति के चलते उस सप्ताह वहां आए लोगों के बारे में पता लगाना बेहद मुश्किल था. प्रोफेसर किम ने बताया, "आख़िरकार हम चर्च के नौ हज़ार सदस्यों की सूची लेने में सफल रहे. पहले हमने उन सबको फ़ोन किया और पूछा कि क्या उनमें कोरोना के कोई लक्षण हैं. करीब 1200 लोगों ने कहा कि उनमें कोरोना के लक्षण हैं. लेकिन कुछ लोगों ने टेस्ट कराने और सेल्फ क्वारंटीन में जाने से इनकार कर दिया."

सैकड़ों लोग चर्च के साथ अपने संबंधों को ज़ाहिर नहीं करना चाहते थे, ऐसे में प्रोफेसर किम के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था. प्रोफेसर किम ने बताया, "हमें जल्द से जल्द इन लोगों को डायेगो के आम नागरिकों से अलग करना था. ऐसे में सरकार ने एक कार्यकारी आदेश पारित किया कि चर्च के सभी सदस्यों को सेल्फ़-आइसोलेशन में रहना होगा."
कोरोना संक्रमण के हर नए मामले की सघन जांच और बड़े पैमाने पर टेस्टिंग के चलते शहर ने वायरस संक्रमण पर अंकुश लगा लिया. अप्रैल के अंत तक डायेगो शहर में कोविड-19 के नए मामलों की संख्या शून्य तक पहुंच गई.
हालांकि दुनिया के दूसरे हिस्सों में वायरस का संक्रमण लगातार बढ़ रहा था. वैज्ञानिक समुदाय वायरस को देश के स्तर पर ही नहीं बल्कि महाद्वीपीय स्तर पर ट्रैक कर रहे थे. इस वायरस की समस्या का जवाब इसके जीनोम में ही छिपा है, लेकिन इसके जेनेटिक कोड से कोविड-19 वायरस के खुद को दोहराने और संक्रमण फैलने के स्तर तक पहुंचने के बारे में अब तक पता नहीं लग पाया है.

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सबूत के निशान
नीचे की तस्वीर में वुहान को बैगनी रंग के एक डॉट से दिखाया गया है. यह दर्शाता है कि पहली बार कोविड-19 संक्रमित के नाक से स्वाब का विश्लेषण यहां हुआ था, जिसमें वैज्ञानिकों ने वायरस के जीनोम का अध्ययन किया था. इसमें कोविड-19 के वायरस में 30 हज़ार जेनेटिक अक्षरों की श्रृंखला थी और संक्रमण फैलने के लिए सभी वायरस खुद को दोहराने की जरूरत थी.

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प्रोफेसर योंग जेन जांग की टीम ने जनवरी महीने में जीनोम की खोज कर ली थी, इसके बाद दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने कोविड-19 के दस हज़ार से ज्यादा संक्रमितों के स्वाब का विश्लेषण किया और उसके नतीजे को जीआईएसएआईडी पर अपलोड किया. जीआईएसएआईडी एक तरह का ओपन डाटाबेस स्रोत है.
हजारों बार कोविड-19 जीनोम का सीक्वेंसिंग करने के चलते वैज्ञानिक इसके जेनेटिक कोड में होने वाले बदलावों को पकड़ने में कामयाब हुए, इन बदलावों को आप अक्षरों में टाइपो एरर जैसा मान सकते हैं. वायरस के छोड़े सबूतों की तरह ही उसमें होने वाले बदलावों के क्रमिक अध्ययन से इसके विभिन्न देशों में फैलने की वजह को समझा जा सकता है.
उदाहरण के लिए, न्यूयार्क के संक्रमित के लिए गए नमूने से पता चलता है कि उस सैंपल के वायरस में तीन बार बदलाव हुए हैं और वुहान में लिए अधिकांश सैंपल में वायरस के जीनोम में उन्हीं तीन बदलावों का पता चलता है तो बहुत संभव है कि इन सब संक्रमण का स्रोत एक ही रहा हो. इस तरह घटनाओं की टाइमलाइन तैयार करने के बाद विशेषज्ञ यह समझने में कामयाब रहे कि वायरस कब और कैसे वुहान से न्यूयार्क तक पहुंचा.
दुनिया भर में जून के पहले सप्ताह तक 37 हज़ार सैंपलों का जीनोम सीक्वेंस किया जा चुका है और इसके बाद ही कोविड-19 की ख़तरनाक और तबाह कर देने वाली प्रवृति का पूरी तरह पता चला है.

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महामारी रोग विशेषज्ञ डॉ. एमा हुडक्रॉफ्ट नेक्स्टस्ट्रेन के साथ काम करती हैं. नेक्स्टस्ट्रेन वैज्ञानिकों और जीनोम डिकोड करने वाले एक्सपर्टों का समूह है जो जीआईएसएआईडी पर अपलोड दसियों हज़ार जीनोम सीक्वेंस से अहम जानकारियों को एकत्रित करके एक ओपन सोर्स मैप तैयार किया है. यह मैप एक तरह से दुनिया भर में फैले कोविड-19 वायरस के बदलते जीनोम का रीयल टाइम स्नैपशॉट है.
डॉ. हुडक्रॉफ्ट बताती हैं, "लोगों से बात करने से बेहतर विकल्प वायरस के जीनोम को ट्रैक करना है. लोग शायद यह नहीं बता पाएं कि वे कब संक्रमित हुए और उन्हें संक्रमण कहां से मिला. ऐसे में जीनोम डेटा कहीं ज़्यादा विश्वसनीय है. ख़ासकर ईरान जैसे देशों के मामले में जहां से कम जानकारी मिल रही है."
रहस्यमयी कड़ियां
जनवरी के अंत में डॉ. हुडक्रॉफ्ट और नेक्स्टस्ट्रेन की टीम का ध्यान उन सैंपलों की ओर गया, जिनके जीनोम काफ़ी हद तक मिलते जुलते थे, इन जीनोम में होने वाले बदलाव भी एकसमान थे. लेकिन ये सैंपल दुनिया के आठ अलग अलग देशों- आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जर्मनी, ब्रिटेन, अमरीका, चीन और नीदरलैंड्स से लिए गए थे. पहली नजर में इन सैंपलों की पड़ताल करने पर टीम को पता नहीं चला कि ये लाल रंग वाले सैंपल कहां से आए हैं.
हुडक्राफ्ट बताती हैं, "ये सैंपल एक तरह से एक ही पेड़ की शाखा लग रहे थे. यह अचरज में डालने वाला था क्योंकि जिन लोगों के सैंपल लिए गए थे, उनमें कोई समानता नहीं थी. तब हमें पता चला कि जिन ऑस्ट्रेलियाई लोगों के सैंपल लिए गए हैं, वे ईरान की यात्रा पर थे."

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"यह काफ़ी महत्वपूर्ण क्लू था क्योंकि अब तक हमारे पास ईरान से कोई सैंपल नहीं थे. लेकिन इसका पता लगने के बाद हम भरोसे से कहने की स्थिति में थे कि ये सारे सैंपल या तो ईरान में संक्रमित हुए हैं या हाल फ़िलहाल ईरान की यात्रा से लौटे लोगों के संपर्क में आने से संक्रमित हुए हैं."
कोविड-19 के अध्ययन के लिहाज से जीनोम पर नजर रखना एक शक्तिशाली उपकरण साबित हुआ क्योंकि वायरस अपेक्षाकृत तेजी से बदल रहे थे. जीनोम के ट्रैक किए जाने से ही वैज्ञानिकों के लिए कुछ सैंपल के जरिए पूरे इलाके में संक्रमण फैलने की वजहों को समझना संभव हो पाया.

ईरान के सैंपल, एक ही परिवार की शाखाएं लग रही थीं. इन सैंपलों के जरिए नेक्स्टस्ट्रेन की टीम ने ना केवल यह पता लगा लिया है कि इन संक्रमणों का इकलौता स्रोत ईरान है बल्कि ईरान में भी यह किसी एक ही स्रोत से फैला है, इसका पता भी चल गया.
ईरान में ज़मीनी स्तर पर कांटैक्ट ट्रेस करने वालों ने पाया कि वहां संक्रमण पवित्र शहर क्यूम से फैला है. क्यूम में हर दिन हज़ारों धार्मिक पर्यटक पहुंच रहे थे और दो सप्ताह के भीतर कोरोना वायरस संक्रमण क्यूम से ईरान के प्रत्येक प्रांत तक पहुंच गया.
कांटैक्ट ट्रेसिंग और जीनोम की रिमोट ट्रैकिंग के जरिए वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में कोविड-19 संक्रमण फैलने की तेजी और उसके तरीकों के बारे में पता लगा लिया. लेकिन छह महीने की तमाम खोजों के बावजूद हर वक्त विशेषज्ञ एक कदम पीछे ही रहे- वे अब तक इसका पता नहीं लगा पाए हैं कि कोरोना वायरस का अगला हमला कब और कहां होगा.
कोविड-19 वायरस को लेकर एक बड़ी समस्या अभी तक बनी हुई है- लोगों के एक दूसरे के संपर्क में आने से फैलने वाला यह संक्रमण देखते देखते घातक बीमारी के तौर पर तब्दील हो जाता है लेकिन कई बार संक्रमित लोगों में मामूली या नहीं के बराबर लक्षण होते हैं.
बिना किसी लक्षण वाले संक्रमितों से कोविड-19 संक्रमण फैलने की जांच बेहद मुश्किल है. हालांकि उत्तरी इटली के एक छोटे से गांव से इस पहेली को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हुई है.
कितना बड़ा है अदृश्य ख़तरा

इटली में कोविड-19 से पहली मौत किसी हलचल भरे शहर में नहीं हुई थी, बल्कि यह वेनेटो क्षेत्र के दूर दराज वाले छोटे से गांव 'वो' में हुई थी. करीब तीन हजार की आबादी वाला गांव 'वो' राष्ट्रीय पार्क इयूगेनियन हिल्स के तल में स्थित है और वेनिस से महज एक घंटे की दूरी पर स्थित है.
21 फरवरी को इस गांव में कोविड-19 से पहली मौत हुई और उसके बाद स्थानीय अधिकारियों ने पूरे गांव को सीमा बंद कर दिया. इसके बाद गांव के सभी नागरिकों के स्वाब की कई बार जांच की गई, भले उनमें कोरोना संक्रमण के कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे. वैज्ञानिक तौर पर यह अवसर जैसा ही था क्योंकि लॉकडाउन में रह रहे हजारों लोगों का कई बार टेस्ट किया गया.
इन टेस्टों के ज़रिए ही स्थानीय माइक्रोबायोलॉजिस्ट एसोसिएट प्रोफेसर एनरिको लावेज्जो महत्वपूर्ण नतीजे तक पहुंचे. वे अपने अध्ययन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को कोविड-19 का 'साइलेंट स्प्रेड' कहते हैं जिसके मुताबिक टेस्ट में कोरोना संक्रमित पाए गए लोगों में बहुत लोग ऐसे थे जिनमें मामूली लक्षण या कोई लक्षण नहीं था.
उन्होंने बताया, "संक्रमित लोगों में से 40 प्रतिशत लोगों को इस बात का ध्यान नहीं था कि वे दूसरों को संक्रमित कर सकते हैं. संक्रमित बीमारी को लेकर यह गंभीर समस्या बनी रहती है."
लावेज्जो ने बताया, "लक्षण वाले लोग तो अपने घरों में आइसोलेशन में रह सकते हैं लेकिन बिना लक्षण वाले लोग तो सामान्य व्यवहार ही करेंगे. वे बाहर निकलेंगे, लोगों से मिलेंगे और दूसरों के निकट संपर्क में आएंगे- उन्हें मालूम ही नहीं होगा कि वे दूसरों को संक्रमित कर सकते हैं."

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लावेज्जो के समूह ने सबसे पहले बिना लक्षण वाले मामलों की बड़ी समस्या को स्थापित किया. इसके बाद दूसरे अध्ययनों में भी करीब 70 प्रतिशत तक संक्रमितों में किसी तरह के लक्षण नहीं होने की बात स्थापित हुई.
3000 की आबादी वाले गांव के लोगों के टेस्ट से दूसरी अहम जानकारी भी हासिल हुई, वहां 10 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा कोविड-19 संक्रमित नहीं पाया गया था.
प्रोफेसर लावेज्जो ने बताया, "हम यह नहीं कह रहे हैं कि बच्चे संक्रमित नहीं हो सकते. दूसरे अध्ययनों में उनके संक्रमित होने की बात आई है. लेकिन तथ्य यह है कि उस गांव में कम से कम दर्जन भर बच्चे संक्रमित लोगों के साथ रह रहे थे लेकिन उनमें से कोई भी संक्रमित नहीं हुआ. यह विचित्र बात है और इसको लेकर अधिक जांच किए जाने की जरूरत है."

दूसरे कोरोना वायरस की तुलना में कोविड-19 कहीं ज्यादा लोगों को एकसाथ अपनी चपेट में लेता है और इसके तेजी से फैलने की वजह भी यही है.
लेकिन कोविड-19 इतना भिन्न कैसे है? इसके लक्षणों में भी इतना अंतर कैसे है- सामान्य खांसी से लेकर सांस लेने में जानलेवा तकलीफ़ तक? प्रोफेसर लावेज्जो के नतीजों के मुताबिक इससे बच्चे कम प्रभावित कैसे हैं?

वैज्ञानिकों के मुताबिक कोविड-19 वायरस केवल एक तरीके से ही मानव शरीर में प्रवेश करता है. यह मानव कोशिकाओं की सतह पर पाए जाने वाले विशेष रिसेप्टर्स एसीई-2 के संपर्क में आकर गठजोड़ बना लेता है. प्रोफेसर माइक फ़रज़ान की लैबोरेटरी ने सार्स संक्रमण के दौरान 2003 में सबसे पहले एसीई-2 रिसेप्टर का पता लगया था.
माइक बताते हैं कि मुश्किल यह है कि एसीई-2 का अस्तित्व पूरे शरीर में होता है, आपके नाक, फेफड़े, आंत, हृदय, किडनी और दिमाग़ सब जगह एसीई-2 मौजूद है. एसीई-2 की इतनी जगह मौजूदगी के चलते ही कोविड-19 संक्रमण के लक्षणों में इतनी भिन्नताएं हैं. अगर संक्रमण नाक में हुआ तो आपके गंध पहचाने की क्षमता पर असर होगा और अगर संक्रमण फेफड़ों में हुआ तो खांसी होगी.
आम तौर पर वायरस या तो तेजी से फैलते हैं या फिर गंभीर बीमारियों का सबब बनते हैं. कोविड-19 वायरस दोनों गुणों में अच्छा होने की वजह से ज़्यादा ख़तरनाक है.

श्वसन के ऊपरी हिस्से यानी नाक और ऊपरी फेफड़ों में संक्रमण होने से खांसी जुकाम होता है, जबकि लगातार छींकने की वजह से संक्रमण तेजी से फैलता है. वहीं फेफड़े के निचले हिस्से में संक्रमण होने से सांस लेने की जानलेवा समस्या उत्पन्न हो सकती है. व्यस्कों की तुलना में बच्चों के कम या ज़्यादा संक्रमित होने की आशंका को लेकर अभी तक स्पष्टता से कुछ मालूम नहीं है.
ब्रिटिश सरकार की आपतकालीन साइंटिफिक एडवाइजरी समूह (एसएजेई) के मुताबिक कुछ सबूत हैं जिससे यह साबित होता है कि बच्चों के संक्रमित होने की आशंका कम होती है और अगर वे संक्रमित हो जाएं तो उनसे संक्रमण फैलने का खतरा भी कम होता है. हालांकि इस समूह के मुताबिक अभी इन सबूतों से किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा जा सकता है.
प्रोफेसर फ़रज़ान बताते हैं कि बच्चों में व्यस्कों की तुलना में फेफड़े के निचले हिस्से में एसीई-2 रिसेप्टर्स कम होते हैं, इस बात के सबूत वैज्ञानिकों को अब मिल चुके हैं.
प्रोफेसर फ़रज़ान ने बताया, "इससे जाहिर है कि बच्चों के इसकी चपेट में आने के आशंका कम होती है. कम से कम व्यस्कों में होने वाले गंभीर न्यूमोनिया से वे बचे रह सकते हैं."
लेकिन फ़रज़ान के मुताबिक बच्चों के फेफड़ों के ऊपरी हिस्से में रिसेप्टर्स की संख्या बहुत होती है. उनके मुताबिक इससे बच्चों से कोविड-19 संक्रमण दूसरे शख़्स तक पहुंच सकता है क्योंकि संक्रमण के प्रसार में फेफड़े के ऊपरी हिस्से की भूमिका अहम होती है.
बहरहाल, कोविड-19 वायरस जिस रफ्तार से अपनी संख्या बढ़ाते हुए फैलता है उससे उसकी मारक क्षमता बढ़ जाती है. छह महीने से चले आ रही जांच और वैज्ञानिक खोजबीन के बाद भी वैज्ञानिकों की राय में इस महामारी को ख़त्म करने के लिए महज एक तरीका है- भविष्य में इसको रोकने के लिए रोगनिरोधक टीके का विकास.

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वैक्सीन तैयार करने की होड़
फ़िलहाल कोविड-19 वायरस की वैक्सीन विकसित करने के लिए 124 अलग अलग समूहों में होड़ लगी हुई है.
ब्राजील में हो रही ऐसी कोशिशों का नेतृत्व साओ पाओलो यूनिवर्सिटी के मेडिकल डायरेक्टर प्रोफेसर जॉर्ज कलिल कर रहे हैं. ब्राजील कोरोना वायरस की चपेट में पस्त है. इसके बाद भी वहां के राष्ट्रपति जैर बोलसोनारो लॉकडाउन का विरोध करने वाली रैलियों में शामिल हो रहे हैं. हालांकि क्षेत्रीय प्रशासन ने देश के प्रमुख शहरों में स्थानीय तौर पर लॉकडाउन घोषित किया हुआ है.
ब्राजील के कुछ समूहों का दावा है कि सितंबर की शुरुआत तक वैक्सीन तैयार हो सकता है. इसके उत्पादन और वितरण में 12 से 18 महीनों का वक्त और लगेगा. लेकिन कलिल का संशय बना हुआ है. उनके मुताबिक यह होड़ सर्वप्रथम आने की नहीं, बल्कि लक्ष्य के प्रति दृढ़ बने रहने की है.

कलिल ने कहा, "हम जितनी जल्दी कर सकते हैं, उतनी तेजी दिखानी होगी. मुझे नहीं लगता है कि सबसे पहले वैक्सीन विकसित करने वाला विनर होगा. क्योंकि यह कार रेस नहीं है. सबसे बेहतर वैक्सीन विनर होगी, जो अधिकांश लोगों को- आदर्श स्थिति में 90 प्रतिशत लोगों को कोविड-19 के लक्षण और संक्रमण की चपेट में आने से बचाएगी."
कलिल के मुताबिक वास्तविक तौर पर महामारी ख़त्म करने के लिए बुज़ुर्गों और कमतर स्वस्थ्य लोगों के लिए कारगर वैक्सीन विकसित करने की ज़रूरत है. उनके मुताबिक इन लोगों के शरीर में एंटीबॉडी विकसित होने में मुश्किल होती है. ऐसे में जब तक संक्रमण में चपेट में आने वाले लोगों के साथ साथ सबसे कमजोर लोगों के लिए वैक्सीन कारगर नहीं होगा तबतक कोविड-19 का संक्रमण फैलता रहेगा.
उनके मुताबिक कोविड-19 संक्रमण के अगले हमले को रोकने के लिए सभी देशों में एक साथ ही वैक्सीन की उपलब्धता को सुनिश्चित करना होगा.

कलिल कहते हैं, "पैसे और राजनीति की समस्या है. साओ पाओलो में आपको अमीर आदमी अपने खूबसूरत घरों में आइसोलेशन में मिलेंगे लेकिन ऐसे भी परिवार हैं जिसमें एक कमरे में आठ, नौ या दस लोग रहते हैं. वे खुद को कैसे आइसोलेशन में रखें?"
कलिल के मुताबिक, "हर किसी के लिए समस्या को ख़त्म करने के लिए हमें बहुत अच्छे वैक्सीन की ज़रूरत है. कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है."



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